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‘महान भारत का इतिहास’

भारत केवल अपने धन-धान्य और भौतिक सम्पदा को लेकर ही इतिहास में महान नहीं रहा है बल्कि यह मानवीय विकास के संसाधनों की प्रचुरता को लेकर भी महान बना रहा है। यह अपनी बहुआयामी विविधीकृत संस्कृति की जीवन्तता की वजह से भी महान रहा है जिसमें विभिन्न धर्मावलम्बी व मतावलम्बी परस्पर सौहार्द पूर्वक रहते आये हैं। इसका लिखित इतिहास इसी बात की गवाही देता है कि भारत कभी भी मतान्ध लोगों की कर्मभूमि नहीं रहा और प्रत्येक धर्म के लोगों का इस धरती पर स्वागत हुआ। इसका प्रमाण यह है कि ईसाई धर्म यूरोप में पहुंचने से भी पहले केरल राज्य की धरती पर आया। यह स्वयं में बहुत सरल गुत्थी है क्योंकि सातवीं शताब्दी तक भारत दुनिया भर में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखता था और यहां के नालन्दा व तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय विश्व भर के शिक्षा प्रेमियों को आकर्षित करते थे। शिक्षा विज्ञान की रोशनी फैलाती है अतः भारत इस क्षेत्र में भी अग्रणी रहा। परन्तु आजकल हमें विभिन्न राजनीतिज्ञों द्वारा जिस प्रकार इतिहास का पाठ पढ़ाया जा रहा है उसे वैज्ञानिक कसौटी पर कसने की जरूरत है क्योंकि इतिहास कोई कहानियों का पुलिन्दा नहीं होता है बल्कि एक विज्ञान होता है जिसके हर कथन की तसदीक तथ्यों पर की जाती है। इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस प्रकार ‘विश्वसनीयता’ पत्रकारिता की मुद्रा (करेंसी) होती है उसी प्रकार यह राजनीतिज्ञों की भी मुद्रा होती है। अतः राजनीतिज्ञों को इतिहास के बारे में तभी टीका टिप्पणी करनी चाहिए जब उन्हें पुख्ता इतिहास की जानकारी हो क्योंकि इतिहास किसी के भी कुछ भी कह देने से बदला नहीं जा सकता और न ही इसे किसी भी विचार के आवरण में ढांपा जा सकता है।  हाल ही में जिस प्रकार रड़क में  एक राजनीतिज्ञ ने यह कह दिया कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिकन्दर को परास्त कर दिया था, वह इतिहास के विपरीत है।

 वास्तविकता यह है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिकन्दर के सेनापति रहे सिल्यूकस को तब पराजित किया था जब वह सिकन्दर की मृत्यु के बाद भारत पर पुनः चन्द्रगुप्त के शासन के दौरान ही चढ़ आया था। इस बारे में ज्यादा खोजबीन की जरूरत भी नहीं है क्योंकि सिकन्दर तो पंजाब के सीमान्त राजा पुरू को ही परास्त कर पाया था और सिन्धू नदी को वह पार भी नहीं कर पाया था और बीमार होने पर वापस लौट गया था। इस सन्दर्भ में स्व. राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त के छोटे भाई कवि सियाराम शरण गुप्त की लिखी काव्य पुस्तिका ‘मौर्य विजय’ पढ़ने से ही विस्तृत जानकारी मिल जाती है। सियाराम शरण जी ने अपनी इस काव्य पुस्तिका में साफ लिखा कि 

 ‘‘जिसके समक्ष न एक भी विजयी सिकन्दर की चली 

  वह चन्द्रगुप्त महीप था कैसा अपूर्व महाबली 

  जिससे सिल्यूकस समार में हारा था तो ले गया

  कान्धार आदिक देश देकर निज सुता को दे गया।’’

इसी काव्य पुस्तिका में सियाराम शरण गुप्त आगे लिखते हैं कि ,

‘‘यूनानी सम्राट वह वीर सिल्यूकस था, अर्ध एशिया खंड हो चुका उसके वश था

बड़े गर्व से भरत भूमि पर वह चढ़ आया, युद्ध क्षेत्र में सदा विजय गौरव था उसने पाया।’’

कहने का मतलब यह है कि इतिहास स्वयं अपने तथ्यों से बोलता है। इसी प्रकार आजकल बाबर और मुगलों को लेकर तरह-तरह की बयानबाजी की जा रही है। सत्य तो यही रहेगा कि प्रथम मुगल सम्राट बाबर को भारत आने का न्यौता मेवाड़ के ‘राणा सांगा’ ने ही दिया था क्योंकि उन्हें दिल्ली की गद्दी पर बैठे सुल्तान इब्राहीम लोदी से आक्रमण का खतरा था। यह भी सच है कि बाबर को पहली बार बादशाह कह कर गुरु नानक देव जी महाराज ने ही पुकारा था और उसे सदाशयी होकर राज करने की नसीहत दी थी। मुगलों ने भारत की सम्पत्ति किसी विदेश में नहीं भेजी और इस देश को ही अपना मुल्क बनाया। उनकी लड़ाई रही तो दक्षिण के मुस्लिम शासकों से ही रही जिन्होंने इस क्षेत्र के हिन्दू राजाओं को परास्त कर अपना साम्राज्य फैलाया था। 

हम जिस अकबर महान की बात करते हैं उसका प्रधान सेनापति हिन्दू राजा मान सिंह था और जिन वीर रणबांकुरे महाराणा प्रताप की बात करते हैं उनका मुख्य सेनापति मुसलमान योद्धा हकीम खां सूर था। इन दोनों सेनापतियों के नेतृत्व में ही हल्दी घाटी का एेतिहासिक युद्ध हुआ था। हम क्यों भूल जाते हैं मुगल सल्तनत के दौरान शाहजहां के शासनकाल में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 50 प्रतिशत से भी ज्यादा था जिसका असर 1756 तक मुगल सल्तनत के तहस-नहस होने के बावजूद पलाशी के युद्ध तक रहा। उस समय तक विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 25 प्रतिशत तक आ गया था। मगर अंग्रेजों ने 1947 तक इसे एक प्रतिशत से भी कम कर दिया। अतः यह बेवजह नहीं है कि जब 1857 में अन्तिम मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में भारतीय राजाओं ने अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया तो लन्दन में बैठे मार्क्सवादी चिन्तक कार्ल मार्क्स ने इसे सबसे पहले स्वतन्त्रता संग्राम की संज्ञा दी। इसके बाद ही वीर सावरकर ने इस कथित गदर पर जेलों में बैठ कर इस घटना पर पुस्तक लिखी और इसे भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नाम दिया। मार्क्स द्वारा लिखे गये ‘लैटर्स फ्राम लन्दन’ की शृंखला को कोई कैसे निरस्त कर सकता है। उसके लिए किसी का कम्युनिस्ट होना जरूरी नहीं है बल्कि भारतीय इतिहास का अध्येता होना आवश्यक है। इसलिए जरूरी है कि हम अपने इतिहास को वस्तु परक होकर देखें और जानें कि दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित भगवान गौरी शंकर का मन्दिर बनाने के लिए औरंगजेब ने अपने मराठा सैनिक ‘आपा गंगाधर’ को लालकिले के सामने जमीन क्यों दी थी। आपा गंगाधर ने ही दक्षिण भारत में मुगल साम्राज्य का परचम फहराया था और बदले में अपनी विजय के उपहार स्वरूप गौरी शंकर मन्दिर का निर्माण कराया था। मगर औरंगजेब वही था जो हिन्दू जनता से जजिया कर वसूल करता था इसीलिए उसे खलनायकों में गिना जाता है जिसकी मृत्यु के बाद मुगल सल्तनत ढहनी शुरू हो गई थी। हमारी मिली-जुली संस्कृति के नायक भी हैं और खलनायक भी। जरूरी है कि इनसे सबक लेते हुए हम आगे बढे़ं और भारत के विकास में सबसे पहले हिन्दोस्तानी बन योगदान दें। हम हिन्दू-मुसलमान घर में हैं मगर देश में केवल हिन्दोस्तानी।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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