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‘जान है तो जहान है’

कोरोना वायरस का मुकाबला करने के लिए देश अब लगभग ‘इमरजेंसी मोड’  में चला गया है। अतः प्रत्येक नागरिक को एक ‘स्वयंसेवी कार्यकर्ता’ की तरह कार्रवाई करते हुए इसे रोकने और समाप्त करने में ‘संयम’ बरतने का ‘प्रदर्शन’ स्वयं को घर में बन्द करके करना चाहिए। 

मानव जाति के दुश्मन कोरोना वायरस को फैलने से रोकने की सामाजिक गतिविधियों को घर-परिवार तक सीमित रखना  शर्त बन चुकी है और इसी का सख्ती से पालन प्रत्येक नागरिक को करना है। यही वजह है कि संसद का बजट सत्र भी आज समय से पहले ही स्थगित करने का फैसला किया गया और लोकसभा बिना बहस के ही वित्त विधेयक पारित करके अनिश्चितकाल के लिए उठ गई। 

इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना उचित नहीं है क्योंकि उसने यह फैसला लोकहित में किया है। हकीकत तो यह है कि संसद के सत्र को स्थगित करने की मांग स्वयं विपक्ष के सांसदों द्वारा ही की जा रही थी। राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता श्री आनन्द शर्मा और लोकसभा में इसी पार्टी के युवा सांसद कार्ति चिदम्बरम यह मांग पुरजोर तरीके से कर चुके थे। उनकी यह मांग जायज थी क्योंकि आम जनता को संसद से ‘अलहदगी’  की दिन चर्या निभाने का सन्देश मिलता है। ऐसा भी नहीं है कि लोकसभा में वार्षिक बजट पहली बार बिना बहस के पारित हुआ हो। 

सामान्य परिस्थितियों में केवल राजनैतिक लाग-डांट के चलते यह काम करने का फख्र हमारे सांसदों ने पहले भी हासिल किया है। 2004 में केन्द्र में डा. मनमोहन सिंह की सरकार काबिज होने के बाद उस साल का बजट भी बिना बहस के केवल इस वजह से पारित हुआ था कि डा. साहब के मन्त्रिमंडल में लालू जी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के कुछ कथित दागदार चेहरे शामिल थे।  

तब विपक्ष के नेता माननीय लाल कृष्ण अडवानी ने  डा. मनमोहन सिंह को इन मन्त्रियों का सदन में परिचय तक कराने की मोहलत नहीं दी थी और कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया था परन्तु जाहिर तौर पर यह विशुद्ध ‘राजनीति’ थी जबकि आज के हालात में यह विशुद्ध ‘लोकनीति’ है। इतना जरूर हो सकता था कि वित्त विधेयक पारित कराते समय सरकार कोरोना वायरस से लड़ने के लिए आर्थिक उपचारों को भी पारित करा लेती परन्तु आज की वरीयता सबसे पहले कोरोना वायरस को पूरी तरह ‘जाम’ करके इसकी रफ्तार को रोक देने की है और इसी नजरिये से प्रधानमन्त्री ने ‘जनता कर्फ्यू’ का आह्वान किया था। 

इसके समझने में हमें जरा भी गफलत में नहीं रहना है। कर्फ्यू केवल एक दिन का रियाज था जो आने वाले समय में हमें लगातार तब तक करना पड़ सकता है जब तक कि कोरोना की रफ्तार को जीरो न कर दिया जाये। इसी वजह से देश भर के 18 राज्यों में लाॅकडाऊन (हरकत बन्दी) लागू किया गया है। इसका सीधा मतलब होता है कि हर आदमी अपनी जरूरतों को इस तरह पूरा करे कि उसे घर से बाहर नहीं निकलना पड़े। 

जिन्दगी जीने के लिए उसे जिन चीजों की जरूरत है केवल उनके लिए ही वह अपने कदमों को तकलीफ दे और हर तरीके का मिलना-जुलना तथा धार्मिक जलसों तक में जाना बन्द कर दे। अपने भगवान या खुदा की इबादत घर में रह कर ही करे। हिन्दू सम्प्रदाय के लोगों के ​लिए चैत्र नवरात्र का पर्व जल्दी शुरू हो रहा है। अतः उनका दायित्व बनता है कि वह मां दुर्गा की आराधना अपने घरों में रह कर ही करें। इसी प्रकार मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग हर शुक्रवार को सामूहिक नमाज अदा करने की रस्म को घर में अता फरमाएं। 

दरअसल ये सभी मजहबी रस्में आपसी भाईचारा बढ़ाने की गर्ज से ही शुरू हुई हैं मगर कोरोना ने तो आदमी को ही चैलेंज कर दिया है कि ‘तुझमें हिम्मत है तो दूसरे से मिल फिर मैं दिखाता हूं कि आगे तू कैसे मिलेगा।’ यही चैलेंज हमें खत्म करना है और बताना है कि हम ‘आदम जात’ हैं जो छिपे हुए दुश्मन को भी पहचान लेते हैं। यही वजह है कि सरकार ने पहले रेलगाडि़यां व बसें बन्द कीं और अब हवाई सेवा भी बन्द करने का ऐलान कर दिया है। यह सब इसीलिए किया जा रहा है जिससे लोग कम से कम घर से बाहर निकलें और कोरोना को मात दें मगर कुछ लोगों ने समझा कि एक दिन का अलहदगी का रियाज करने से उनका काम पूरा हो गया और वे सामान्य दिनचर्या निभा सकते हैं। 

उनका सोचना पूरी तरह गलत है और ऐसा करके वे खुद को और दूसरों को खतरे में डाल रहे हैं। इटली जैसे विकसित देश के लोगों ने संभवतः यही गलती की थी और लाकडाऊन के नियमों को हल्के में लिया था। इसका नतीजा यह निकल रहा है कि वहां एक दिन में एक-एक हजार लोग मौत के मुंह में जा रहे हैं।

 हमें ऐसी घटनाओं से नसीहत लेनी चाहिए। भारत बहुत बड़ा देश है और इसमें दुनिया की कुल आबादी का पांचवां हिस्सा रहता है। इस आबादी की सुरक्षा सरकार की पहली जिम्मेदारी है मगर हकीकत यह है कि इसकी जिम्मेदारी खुद शहरियों पर ही है कि किस तरह वे अपनी जीवन शैली को थोड़े दिनों के लिए बदलते हैं। यह काम मुश्किल नहीं है  बस ‘संकल्प’ की जरूरत है और ‘संयम’ से काम लेना है। 

संयम या सब्र का फल मीठा ही होता है। हमारे आलिमों ने हमें यही बताया है कि थोड़ा सन्तोष करने से हम कोरोना को फतेह कर सकते हैं, पहले जान है तो जहान है। इतनी गूढ़ और ज्ञान भरी बात भारत के गांवों में कहावतों के तौर पर आज भी लोगों की जुबां पर तैरती रहती है। बस इतना सा ही काम तो करना है और ज्यादा दार्शनिक तर्ज पर कहा जाये तो ‘खुद’ को जीत कर ही ‘जग’ को जीतना है।