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गुरु के घर में बहा खून

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के शोर बाजार इलाके में स्थित सिख गुरुद्वारे पर हुए चरमपंथी हमले में 27 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अशांत देश अफगानिस्तान में यह अल्पसंख्यकों पर सबसे घातक हमला है। इस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट  यानी आईएस ने ली। दो वर्ष पहले भी अफगानिस्तान में सिखों पर आईएस के आतंकवादियों ने हमला किया था जिसमें 19 लोग मारे गए थे। एक तरफ पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है, ऐसे समय में आतंकवादियों ने उस गुरुद्वारे पर हमला किया जहां पूरी दुनिया की भलाई चाहने वाली बाणी का पाठ होता है, वहां पर निर्दोषों का खून बहाना मानवता पर धब्बा है।  ऐसा करके आतंकवादियों ने फिर अपनी शैतानी मानसिकता का परिचय दिया है।

अफगानिस्तान में शांति के लिए अमेरिका और तालिबान ने 29 फरवरी को एक समझौते पर दस्तखत किए थे। कतर में हुए समझौते में विदेशी सैनिकों की सुरक्षा, अलकायदा जैसे आतंकी संगठन को अफगानिस्तान से दूर रखने की बातें कही गई थीं। इस समझौते का मकसद अमेरिकी सैनिकों की वापसी कराकर डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपना चुनावी वादा पूरा करना ही था। इस समझौते से देश में शांति आने की उम्मीद पहले से ही कम थी।

समझौते में इस बात की कोई रूपरेखा ही नहीं थी कि तालिबान और अफगान सरकार में किन मुद्दों पर बातचीत होगी, तालिबान द्वारा हथियार सौंपने, कैदियों की रिहाई आदि पर कोई चर्चा ही नहीं हुई। इस समझौते के बाद तीन बड़ी घटनाएं इस बात का संकेत दे चुकी हैं कि अफगानिस्तान बड़े खतरे की ओर बढ़ रहा है। तालिबान ने अफगानिस्तान के 16 प्रांतों में एक के बाद एक 33 हमले किए, ​िजसमें 40 से अधिक लोग मारे गए। इसके जवाब में देश में मौजूद अमेरिकी सैनिकों ने तालिबान क्षेत्रों पर हवाई बमबारी की। 

अफगानिस्तान सरकार ने 5 हजार तालिबानी कैदियों को ​िरहा करने से इंकार कर दिया। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने शर्त रखी कि तालिबानी कैदियों की रिहाई उसी हालत में हो सकती है जब तालिबान पाकिस्तान से अपने रिश्ते खत्म कर ले। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों के बीच हुए इस समझौते में भारत के हितों का कुछ खास ध्यान नहीं रखा गया। भारत की चिंता यही है कि तालिबान पाकिस्तान के काफी करीब है और पाकिस्तान की सेना का भी तालिबान के प्रति साफ्ट कार्नर है। राजनीतिक स्तर पर भी पाकिस्तान में तालिबान का कोई विरोध नहीं है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ चुनाव से पहले ही तालिबान का गुणगान करती रही है। तालिबान आैर पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए खतरा है। अफगािनस्तान में भारत पुनर्निर्माण एवं विकास पर लाखों डालर खर्च कर चुका है। अफगानिस्तान भारत के विदेशी सहायता कार्यक्रम का सबसे बड़ा भागीदार है। ऐसे में भारत की चिंताओं को आसानी से समझा जा सकता है। तालिबान हमेशा भारतीय हितों के खिलाफ काम करता रहा है। इसके पीछे पाकिस्तान का दिमाग माना जाता है। वहां पहले भी काम करने वाले भारतीयों पर तालिबान हमले करता रहा है। 

पाकिस्तान का हक्कानी नेटवर्क से गहरा रिश्ता है। हक्कानी नेटवर्क का सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी वास्तव में पाकिस्तान का ही खास माना जाता है और पाकिस्तान से ही बड़े पैमाने पर हक्कानी और तालिबान की फंडिंग होती रही है लेकिन पाकिस्तानी तालिबान के दो सीनियर सदस्यों की काबुल में रहस्यमयी तरीके से हुई हत्याओं ने स्थिति को उलझा कर रख दिया है।

दूसरी ओर सीरिया और इराक में अपना नियंत्रण खो चुके इस्लामिक स्टेट (आईएस) अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्वी पहाड़ी इलाके में अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है। उसके निशाने पर पश्चिमी देशों के साथ-साथ भारत भी है। इस आतंकी समूह का तालिबान से भी बड़ा खतरा माना जा रहा है। उसने अफगानिस्तान तथा विदेशी नागरिकों को निशाना बनाने का काम किया है। पिछले वर्ष अगस्त में उसने काबुल में एक शादी समारोह में हमला किया था जिसमें 63 लोगों की मौत हो गई थी। यह शादी हजारा शिया समुदाय के लोगों की थी। इस समुदाय के लोग सुन्नी बहुल अफगानिस्तान आैर पाकिस्तान में अक्सर कट्टर सुन्नियों के निशाने पर रहते हैं। आईएस और तालिबान दोनों ही अफगानिस्तान सरकार के विरुद्ध हैं लेकिन दोनों की विचारधारा और नेतृत्व में मतभेद है और दोनाें में ही हिंसक झड़पें होती रहती हैं। अफगान सरकार आईएस से टक्कर ले रही है।

यद्यपि गुरुद्वारे पर हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली है मगर भारतीय एजैंसियों को शक पा​िकस्तान के समर्थन से चलने वाले आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क पर ही है। इस संबंध में इनपुट पहले से ही था कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास से जुड़े कार्यालयों पर हमले हो सकते हैं। फिलहाल अफगानिस्तान में भारत की राह आसान नहीं है। अफगानिस्तान सरकार को आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पाकिस्तान को आतंकियों को मदद देने से रोकना होगा। अफगानिस्तान में विकास के काम करने वाले भारतीय तभी सुरक्षित रहेंगे जब वहां शांति होगी।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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