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‘लव जेहाद’ का ‘प्रेम रोग’

लव जेहाद को लेकर जो प्रलाप हो रहा है उसे समग्र भारतीय सन्दर्भों में देखने की जरूरत है। इसी से जुड़ा हुआ विषय अन्तरजातीय विवाह का भी है जिसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध हिन्दू समुदाय की समग्रता से जाकर जुड़ता है। हम इसे इस प्रकार भी देख सकते हैं कि अन्तरधार्मिक विवाह भारतीय ताने-बाने से जुड़ा हुआ है जबकि अन्तरजातीय विवाह हिन्दू समाज की सामूहिक पहचान से बावस्ता है। परन्तु दोनों में ही एक समानता है कि ये समाज को संकुचित दायरे में बांधने की हिमायत नहीं करते हैं। भारतीय संस्कृति का मूल भी यही है कि आदिकाल से ही यह विभिन्न मत मतान्तरों को समाहित करते हुए मतिमूलक (ज्ञानमार्ग) मार्ग को अंगीकार करके समाज को एकल स्वरूप में परिभाषित करती रही है। हैरान होने की बात जरा भी नहीं है कि 19वीं सदी तक जम्मू-कश्मीर राज्य में अन्तरधार्मिक विवाह सामान्य प्रक्रिया हुआ करती थी जिसमें दूल्हा-दुल्हन का धर्म मायने न रख कर उनका कश्मीरी होना मायने रखता था। 

इसके साथ यह भी सत्य है कि  इस्लाम धर्म में दीक्षित हो जाने के बावजूद लोग अपनी जाति छोड़ना कबूल नहीं करते थे। इसी वजह से भारत के लोगों के बारे में समाजवादी चिन्तन धारा से जुड़े प्रख्यात नेताओं ने सन्त कबीर और रैदास व नामदेव की वाणी को ज्यादा तरजीह देते हुए यहां तक कहा कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा अजीम मुल्क है जिसमें हर हिन्दू में एक मुसलमान रहता है और हर मुसलमान में एक हिन्दू रहता है परन्तु जाति के मुद्दे पर इन नेताओं ने भी हथियार डाल दिये थे और साठ के दशक में समाजवादी नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने राष्ट्रव्यापी मुहि​म ‘जाति तोड़ो-दाम बान्धो’ की चलाई थी। वास्तव में यह मुहिम सामाजिक परिस्थितियों के अर्थगत बदलाव की थी जिससे पूरा भारतीय समाज आर्थिक सम्बन्धों के निदेशक सिद्धान्तों का पालन करते हुए अपना विकास करे। समाज विज्ञानी यह सिद्ध कर चुके हैं कि आर्थिक सम्बन्ध ही अन्ततः सामाजिक सम्बन्धों का निर्धारण करते हैं परन्तु भारत में जातिगत व्यवस्था इस नियम को नकारने की अपूर्व क्षमता रखती है। यही वजह थी कि डा. लोहिया ने ‘जाति तोड़ो-दाम बान्धो’ की मुहिम चलाई थी।

स्वतन्त्र भारत में जिस संविधान को हमने स्वीकार किया उसमें भी जाति का विनाश करने के सभी प्रावधान किये गये और इसके अनुच्छेद 20 व 21 में जीवन जीने का अधिकार से लेकर धार्मिक स्वतन्त्रता व निजी स्वतन्त्रता को हर सूरत में अक्षुण्य रखने की व्यवस्था की गई। इसमें किन्ही दो वयस्कों द्वारा अपनी मनमर्जी का जीवन साथी चुनने का अधिकार भी शामिल है। जीवन भर साथ रहने या विवाह बन्धन में बंधने वाले इन दो वयस्कों के बीच धर्म कोई मायने नहीं रखता है। यहां तक कि इनमें से कोई भी नास्तिक तक हो सकता है। इसमें  विवाह के लिए धर्म परिवर्तन की कोई शर्त नहीं आती है। अतः विवाह के समय या इसके बाद धर्म परिवर्तन एेसे सन्देहों को जन्म देता है जिनका लेना-देना व्यक्तिगत जीवन प्रणाली से न होकर सामाजिक बुनावट से हो जाता है। आश्चर्यजनक रूप से इस सामाजिक बुनावट की ठेकेदारी वे लोग स्वतः लेने लगते हैं जिनका दाम्पत्य जीवन में बंधे दो व्यक्तियों की निजी जीवन की इच्छा से कोई लेना-देना नहीं होता।  लेकिन यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान निजी स्तर पर धार्मिक स्वतन्त्रता की गारंटी देता है अर्थात कोई भी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर ही बिना किसी भय या लालच अथवा दबाव के अपना धर्म बदल सकता है। इसमें समाज की कोई भूमिका नहीं है, परन्तु जब से लव जेहाद की चर्चा छिड़ी है तब से एक मुद्दा मुखर हो रहा है कि मुस्लिम समाज के युवक अपना नाम बदल कर या धोखा देकर हिन्दू युवतियों को विवाह के लिए उकसाते हैं और उनका धर्म परिवर्तन करा देते हैं। एेसा करना इसलिए गलत है क्योंकि इसमें दूसरे पक्ष के साथ धोखाधड़ी की नीयत से कार्य को अंजाम दिया गया है।  इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला दीवार पर लिखी हुई इबारत है जिसमे कहा गया है कि विवाह के लिए धर्म परिवर्तन करना जरूरी नहीं है।

 भारत का ‘स्पेशल मैरिज एक्ट’ किन्ही भी दो धर्मों के लोगों को बाकायदा विवाह करने की इजाजत देता है। इसके समानान्तर ही यह कानून किन्ही भी दो जातियों के युवक-युवती को भी विवाह करने की इजाजत देता है। इसके बावजूद हर राज्य में ऊंची-नीची जाति के आधार पर विवाहों के खिलाफ बर्बर ‘आनर किलिंग’  की घटनाएं होती हैं। ये घटनाएं हमारी समूची संस्कृति के माथे पर कलंक या काले दाग के समान होती हैं। दूसरी तरफ अन्तरधार्मिक विवाह सामाजिक धार्मिक दायरे को तोड़ता है मगर एक नया धोखेबाजी का सन्देहास्पद वातावरण भी बनाता है।  प्रगतिशील समाज में धर्म की अहमियत केवल घर की चारदीवारी में होती है और प्रगति आर्थिक स्थिति में सुधार होने से आती है।  अब सवाल पैदा होता है कि क्या अन्तरधार्मिक विवाहों के मामले में सन्देहास्पद स्थिति को समाप्त करने के लिए हमें किसी नये कानून की जरूरत है ? जिसकी तरफ हरियाणा, मध्यप्रदेश, कर्नाटक व उत्तर प्रदेश की सरकारें इशारा कर रही हैं और ऐसे मामलों को ‘लव जेहाद’ की संज्ञा से नवाज रही हैं। बहुत से ऐसे केस सामने आए हैं जिनमें मुस्लिम युवाओं ने अपनी पहचान छिपा कर प्रेम किया और बाद में खुलासा होने पर संबंध टूट गए। अगर यह साजिश है तो इसे रोका जाना चाहिए। दर असल यह विषय नारी-सशक्तीकरण से लाल्लुक रखता है। अंतरधार्मिक विवाहों के मामले में युवती या दुल्हन को ही यह अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य न किया जाये। जो भी कानून बने वह इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बने इसके साथ ही स्पेशल मैरिज एक्ट में विवाह करने की इच्छा की एक महीने पहले की जाने वाली सार्वजनिक  घोषणा की शर्त समाप्त की जाये जिससे ऐसा विवाह अनावश्यक रूप से साम्प्रदायिक सद्भावना बिगाड़ने का कारण न बनें। अन्तरजातीय विवाहों के मामलों मे भी यह घोषणा आनर किलिंग का कारण बनती है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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