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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

कोरोना की पुष्टि

इलाज चल रहा है

ठीक हो चुके

मृत लोग

वैक्सीन पर ‘बेहूदा’ विवाद

कोरोना संक्रमण के सन्दर्भ में सबसे पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि भारत में इस बीमारी से भला-चंगा होने की दर पूरी दुनिया में सर्वाधिक 96 प्रतिशत क्यों है ? इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि भारत की चिकित्सा पद्धति में इस बीमारी से बाहर आने का तोड़ हमारे चिकित्सकों ने अपने  चिकित्सीय ज्ञान व अनुभव के आधार पर इस प्रकार ढूंढा है कि लोग इसकी चपेट में आने के बाद इससे मुक्ति पा सकें। जाहिर तौर पर भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए इस कार्य में देशी अर्थात आयुर्वेदिक प्रणाली व अंग्रेजी एलोपैथिक प्रणाली दोनों का ही योगदान है क्योंकि बीते वर्ष में कोरोना को भगाने के प्रयासों में भारतीयों का सर्वाधिक लोकप्रिय ‘पेय पदार्थ’ गिलोय व तुलसा दल का ‘काढ़ा’ ही रहा। इसके साथ ही अंग्रेजी पद्धति से इलाज करने वाले डाक्टरों ने भी संक्रमण को समाप्त करने के लिए दवाओं का प्रयोग किया जिससे भला-चंगा होने वाले लोगों की दर (रिकवरी रेट) 96 प्रतिशत तक पहुंची।

 भारतीय चिकित्सकों की इस सफलता का हमें जश्न मनाना चाहिए। यह सब कार्य कोरोना की वैक्सीन आये बिना ही हुआ। सौभाग्य से भारत में कोरोना की दो वैक्सीनें भी  तैयार कर ली गई हैं। इनमें से एक वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ का उत्पादन ब्रिटेन की आक्सफोर्ड तकनीक के लाइसेंस के अन्तर्गत पुणे के सीरम संस्थान द्वारा ​किया गया है और दूसरी विशुद्ध भारतीय कम्पनी भारत बायोटेक ने अपने द्वारा विकसित तकनीक के आधार पर ‘कोवैक्सीन’ तैयार की है  मगर भारत के कुछ अंग्रेजीदां ‘दास मानसिकता’ के कथित विशेषज्ञों ने इस भारतीय वैक्सीन की दक्षता पर सवाल उठाने सिर्फ इसलिए शुरू कर दिये क्योंकि इसने अपनी वैक्सीन के तीसरे चरण के प्रायोगिक परिणामों का खुलासा नहीं किया जबकि चिकित्सीय परीक्षणों के दो चरणों में इस वैक्सीन को दुनिया के ‘चिकित्सीय ग्राह्यता तन्त्र’ ने पूर्ण रूप से स्वीकृत किया। इस वैक्सीन का 25 हजार आठ सौ लोगों पर दुनिया के 12 देशों के नागरिकों पर परीक्षण किया गया। यह सब कार्य भारत बायोटेक ने अपने बूते पर किया।

 दरअसल भारत बायोटेक पहले से ही विभिन्न बीमारियों के टीके का उत्पादन करती आ रही है। अपनी वैक्सीन बनाने के लिए इसने जिस तकनीक का इश्तेमाल किया है उससे कोरोना संक्रमण के फिलहाल फैल रहे सह-वायरस जिसे वैरियंट या स्ट्रेन कहा जा रहा है उसका इलाज भी हो सकता है। इस कम्पनी के प्रमुख चिकित्सा वैज्ञानिक डा. कृष्णा इल्ला ने साफ तौर पर कहा कि एक सप्ताह के भीतर वैरियंट के विरुद्ध कोवैक्सीन के सफल प्रयोग पर वह पूरे आंकड़े रख देंगे मगर उन्हें पूरा यकीन है कि यह वैक्सीन ‘कोरोना म्यूटेशन’ को नियन्त्रित करने में भी कामयाब होगी। 

दुनिया के तीस देशों में कोरोना म्यूटेशन से पैदा होने वाले स्ट्रेन का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में एक भारतीय कम्पनी द्वारा इसका तोड़ ढूंढने पर देश को गर्व होना चाहिए मगर कुछ दास मानसिकता के लोग उल्टे इसकी कामयाबी पर सवाल खड़े कर रहे हैं? इसी मानसिकता के लोगों ने तब भी ऊल-जुलूल सवालों की झड़ी लगाई थी जब योग गुरु बाबा रामदेव ने कोरोना से बचाव के लिए आयुर्वेदिक औषधि ‘कोरोनिल’ का उत्पादन शुरू किया था। बेशक यह औषधि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इस हद तक बढ़ाने की थी जिससे संक्रमण का आक्रमण न हो सके परन्तु थी तो कोरोना जीवाणु से मुक्त रहने की औषधि ही। चिकित्सीय भाषा में इसे ‘इम्युनिटी बूस्टर’ कहने पर किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता था। इसका काम तो संक्रमण को रोकना ही था। बाबा रामदेव इसका निर्यात भी कर रहे हैं जिसकी अनुमति भारत के चिकित्सा नियन्त्रक ने ही दी है। अतः जब कोवैक्सीन को भी भारत के चिकित्सा तन्त्र की नियामक व नियन्त्रण प्रणाली अनुमति दे चुकी है तो इसकी प्रमाणिकता और दक्षता व सक्रियता पर सवाल खड़े करना देश के चिकित्सा नियामक तन्त्र पर ही सन्देह करने के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।

 भारत के कथिक बुद्धिजीवी वर्ग को दास मानसिकता से छुटकारा पाना होगा और स्वतन्त्र भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का सम्मान करना होगा। यह बीसवीं सदी का अंग्रेजों का राज नहीं है जबकि बंगाल के वैज्ञानिक डा. जगदीश चन्द्र बसु को नोबेल पुरस्कार में केवल इसलिए टांग अड़ा दी गई हो कि वह भारतीय थे और उन्होंने खोज कर दी थी कि पेड़-पौधों में भी मनुष्यों व जीवों के समान जान होती है और वे भी रोते-हंसते-गाते हैं। इस मानसिकता के लोगों से क्या यह पूछा जा सकता है कि जिस महात्मा गांधी ने आधुनिक दुनिया में ‘अहिंसा’ के जरिये सभी गुलाम देशों को क्रान्ति करने का मन्त्र दिया उसे अंग्रेजों ने नोबेल शान्ति पुरस्कार क्यों नहीं दिया जबकि उनका नाम दो बार इसके लिए प्रस्तावित किया गया? अतः भारतीय विचार से लेकर वैज्ञानिक शोध को हिकारत से देखने का नजरिया 21वीं सदी में किसी सूरत में नहीं चलेगा। इसी भारत की प्रबुद्ध युवा पीढ़ी है जो कम्प्यूटर-साफ्टवेयर उद्योग में विश्व शक्ति बनी हुई है। यह सब उसके ज्ञान के बूते पर ही हुआ है।

प्रसन्नता की बात है कि भारत बायोटेक व सीरम संस्थान ने एक संयुक्त बयान जारी करके अपने प्रयासों से वैक्सीन उत्पादन को मानवता की सेवा कहा है और किसी भी विवाद को जन्म न देने की अपील की है। चिकित्सा विज्ञान की खूबी यह होती है कि इसे खुद पर यकीन होता है तभी तो नित नई बीमारियों से जूझने की दवाइयां यह विकसित करता है। अतः कोविशील्ड और कोवैक्सीन का निरर्थक विवाद पूरी तरह समाप्त होना चाहिए