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‘हम भारत के किसान’

प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज अपनी वाराणसी यात्रा के दौरान यह साफ किया कि नये कानून किसानों के हित में ही लाये गये हैं। सरकार पुरानी खरीद प्रणाली को समाप्त नहीं कर रही है बल्कि इसके साथ एक नई प्रणाली विकसित कर रही है जिससे किसानों को अपनी उपज अपने भावों पर बेचने का विकल्प मिल सके और उन पर अपना माल केवल मंडियों में ही बेचने की प्रतिबद्धता न हो।

इस सन्दर्भ में यह भी विचार करना होगा कि किसानों की आमदनी बढ़ाने के उपाय इस प्रकार किये जायें जिससे भारत के 70 प्रतिशत अल्प आय लोगों की जेब की पहुंच में कृषि उत्पादन रहें। साथ ही कार्पोरेट क्षेत्र पर यह शर्त लागू रहे कि वह सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों पर उपज का भाव तय नहीं कर सकता है क्योंकि नये कृषि कानूनों के अनुसार वह कृषि उत्पादन का कितनी भी सीमा में किसी भी समय तक भंडारण कर सकता है और अपनी फसल बेचने के बाद स्वयं किसान एक उपभोक्ता बन जाता है परन्तु प्रधानमन्त्री का यह कथन महत्वपूर्ण है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर देश के केवल छह प्रतिशत किसान ही अपना उत्पादन बेच पाते हैं और शेष को खुले बाजार की शरण ही लेनी पड़ती है। अब सरकार ने 15 फीसदी से ज्यादा सरकारी खरीद की है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि किसान सम्मान निधि के तहत लगातार राशि किसानों के खातों में पहुंच रही है। किसानों को प्रधानमंत्री पर भरोसा करना चाहिए। हमें सिर्फ करना यह होगा कि निजी क्षेत्र के किसानी में आने के बाद स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल बने और किसान की उपज समर्थन मूल्य से नीचे के भाव पर न बिक पाये। इसके लिए हमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का जाल बिछाना होगा।

किसानों को आन्दोलन लम्बा न खींच कर सरकार से बातचीत करनी होगी और बातचीत से अपनी शंकाओं का निवारण करना होगा। भारत में चौधरी चरण सिंह से बड़ा अभी तक कोई दूसरा किसान नेता नहीं हुआ है और उन्होंने पचास के दशक में कांग्रेस पार्टी में रहते हुए तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू की कृषि नीतियों को कांग्रेस पार्टी के महाधिवेशन के खुले मंच पर ही चुनौती देते हुए कहा था कि नेहरू जी को भारत के किसानों की सच्चाई के बारे में अधूरा ज्ञान है।

इस देश में खेती कभी भी सोवियत संघ की तर्ज पर सहकारिता के आधार पर नहीं की जा सकती क्योंकि किसान एक तरफ जमीन को अपनी मां मानता है और दूसरी तरफ इसकी मिल्कियत के साये में अपने सभी दुख-दर्दों का इलाज करता है। यह जमीन ही उसकी हर मुसीबत में रक्षा करती है और उसके परिवार का भरण-पोषण करती है। उस दौर में नेहरू जी के सामने उनकी मर्जी और नीतियों के खिलाफ मुंह खोलना किसी क्रान्ति से कम नहीं था।

चौधरी चरण सिंह के विचारों को जानने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी के उत्तर प्रदेश के कई प्रतिष्ठित नेताओं से उन्हें कहलवाया कि वह सहकारिता खेती के बारे में अपने विचार बदलें क्योंकि भारत में यदि इस तर्ज पर खेती की जाती है तो सरकार कृषि उत्पादन बढ़ाने में सभी आर्थिक मदद करेगी जिससे किसान की आमदनी भी बढे़गी और उसे सुरक्षा भी मिलेगी तथा देश भी अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होगा।

तब चौधरी चरण सिंह ने जवाब दिया था कि मैं अपनी बात पर अडिग हूं क्योंकि भारत में जमीन की मिल्कियत किसान के अलावा किसी अन्य संस्था को नहीं दी जा सकती मगर यह भी हकीकत है कि देश में सबसे पहले जमींदारी प्रथा उत्तर प्रदेश में ही 1936 के प्रान्तीय एसेम्बलियों के चुनावों के बाद कांग्रेस की सरकार बनने पर समाप्त की गई थी। हालांकि तब अंग्रेजों का ही शासन था।

जमींदारी प्रथा समाप्त करने का बहुत कड़ा विरोध तब पूर्व राजे-रजवाड़ों की ओर से किया गया था मगर आम जनता में जमींदारी प्रथा उन्मूलन कानून के प्रति इतना उत्साह था कि राजे-रजवाड़ों को मुंह की खानी पड़ी थी। उस समय उत्तर प्रदेश को सेंट्रल प्राविंस और अवध कहा जाता था।

गौर से देखा जाये तो किसानों में जमीन की मिल्कियत और इसे अपनी मां समझ कर इसकी हिफाजत करने का भाव जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद ही जगा क्योंकि जमींदार के अनाज के गोदाम अपनी कड़ी मेहनत से भरने वाले छोटे-छोटे किसानों को तब जमीन का बाजाब्ता मालिक उनके नाम कागजात लिख कर बनाया गया था। नेहरू जी ने इस प्रणाली के विरोध में सहकारिता खेती का विचार प्रस्तुत किया था जिसका पुरजोर विरोध चौधरी चरण सिंह ने किया और अन्ततः नेहरू जी को अपनी नीति बदलनी पड़ी और चौधरी चरण सिंह के विचारों से सहमत होना पड़ा क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अधिसंख्य जमीनी कार्यकर्ता चौधरी चरण सिंह को इस मुद्दे पर सही मानते थे।

राजधानी की सरहदों पर पिछले पांच दिन से आन्दोलनकारी किसानों को देखते हुए समझा जा सकता है कि आज कृषि क्षेत्र को लेकर किस प्रकार का  माहौल बना हुआ है। सरकार ने किसान संगठनों से वार्ता का प्रस्ताव किया है मगर उसे उन्होंने ठुकरा दिया है क्योंकि वे चाहते हैं कि उन पर किसी विशेष स्थान में ही एकत्र होने की शर्त न लगाई जाये।

वे चाहते हैं कि संसद के पिछले अधिवेशन में सरकार जो तीन कृषि कानून लाई है वे रद्द किये जाने चाहिएं क्योंकि उनके लागू होने से उनकी आर्थिक सुरक्षा और सरकारी संरक्षण समाप्त हो जायेगा। यह सरकारी संरक्षण उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिये प्राप्त है।

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि वह कृषि क्षेत्र को बाजारमूलक अर्थव्यवस्था का अंग बना कर उन्हें अपनी उपज का मूल्य स्वयं निर्धारित करने का अधिकारी बनाना चाहती है और निजी कम्पनियों व व्यापारियों को सीधे उनसे व्यापार करने का हक देकर उनके कृषि उत्पादों का मूल्य बाजार की शक्तियों पर छोड़ना चाहती है और साथ ही पुरानी मंडी प्रणाली व समर्थन मूल्य को भी जारी रखना चाहती है।

यह समानान्तर व्यवस्था आने से किसानों को डर है कि उनकी स्थिति कालान्तर में कार्पोरेट कम्पनियों या निजी व्यापारियों के दास अथवा चाकर जैसी हो जायेगी और पूंजी के प्रभाव से ये शक्तियां पूरे कृषि क्षेत्र को कब्जा लेंगी। आज के दौर में बहुत कुछ बदला है हमें सभी परिस्थितियों को देखकर आगे बढ़ना है। उम्मीद है कि केन्द्र सरकार और किसान दो-दो कदम आगे बढ़कर समाधान निकाल ही लेंगे।