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संपादकीय

एक राष्ट्र-एक चुनाव की पहेली!

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लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का विचार नया नहीं है। इस बारे में 2014 में विजयी होने पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रस्ताव किया था जिसे बहुत अधिक समर्थन नहीं मिला था। इस बार श्री मोदी ने पुनः अपनी पार्टी की जीत के बाद इस बारे में विचार करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें देश के प्रमुख विपक्षी राजनैतिक दलों ने हिस्सा नहीं लिया। विशेषकर कांग्रेस पार्टी और उत्तर प्रदेश के समाजवादी व बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने इस प्रस्ताव को व्यावहारिक नहीं माना मगर मूल प्रश्न यह है कि विभिन्न राज्यों और लोकसभा के चुनाव एक साथ क्यों कराये जायें? भाजपा का तर्क है कि बार-बार चुनाव होने से विकास योजनाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और अत्यधिक धन खर्च होता है। 

इसके साथ ही संसद से लेकर विधानसभाओं में मौजूद विभिन्न राजनैतिक दल लगातार चुनावी मुद्रा में रहते हैं। चुनावी दृष्टि से विभिन्न फैसलों का समर्थन और विरोध होता है। किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहने से लागू होने वाली चुनाव आचार संहिता की वजह से नागरिकों के हित में बनाई जाने वाली परियोजनाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या केवल चुनाव आचार संहिता लागू होने के डर से हम राज्यों की राजनैतिक व स्वतन्त्रता को सीमित इस प्रकार कर सकते हैं कि उनके लिए पांच वर्ष तक हर हाल में अपने सदन को चलाना और किसी भी रूप में बनी सरकार को काबिज रखना जरूरी हो ? क्या ऐसी व्यवस्था हमारे संविधान में है कि एक बार कोई भी सदन चुने जाने के बाद पांच वर्ष से पहले भंग अथवा बर्खास्त नहीं हो सकता। 

भारत का संविधान सरकार, सदन और चुनाव आयोग के अधिकारों व कर्त्तव्यों में स्पष्ट बंटवारा करता है। किसी चुने हुए सदन के भीतर की व्यवस्था इसके अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आती है और सरकार की पुरी अख्तियारी इसके मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री (केन्द्र के सम्बन्ध में) पर निर्भर करती है। सदन के भीतर की दलगत व्यवस्था का फैसला अध्यक्ष करते हैं जिसके अनुरूप बहुमत व अल्पमत का फैसला होता है। इस नियम के अनुसार कोई भी सरकार केवल बहुमत की सरकार ही हो सकती है। अतः किसी भी सरकार के अल्पमत में आने पर उसका वजूद कायम नहीं रह सकता और राज्यों के सन्दर्भ में तब जिम्मेदारी राज्यपाल पर आ जाती है कि वह चुनी हुई सरकार को काबिज करने के लिए प्रत्येक संवैधानिक विकल्प खोजें और इसमें सफलता न मिलने पर विधानसभा को भंग करके नये चुनाव कराने के आदेश दें। 

ऐसे मामलों में अल्पमत में आये मुख्यमन्त्री भी कानूनन इस्तीफा देने के लिए बाध्य होकर राज्यपाल से विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं लेकिन यदि कोई और नेता सरकार बनाने का दावा पेश कर देता है तो राज्यपाल पर इस विकल्प की व्यावहारिकता खोजने का दायित्व भी आ जाता है। इन दोनों ही परिस्थितियों में तकनीकी संवैधानिक पेंच खड़े हो जाते हैं जिसमें राज्यपाल की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनका काम सिर्फ अपने राज्य में संविधान का शासन देखना होता है। वह मुख्यमन्त्री की सलाह मानने से भी बन्धे होते हैं और अपने विवेक से लोकप्रिय सरकार का गठन करने के दायित्व से भी। हाल ही में अापने जम्मू-कश्मीर का नजारा देखा था कि किस प्रकार इस राज्य में राजनैतिक घटनाक्रम में नाटकीय परिवर्तन आया और राज्यपाल ने अन्ततः विधानसभा भंग करने की अनुशंसा कर डाली। 

इसके साथ ही संविधान में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था भी है परन्तु इसका दुरुपयोग केन्द्र किसी प्रकार से नहीं कर सकता। इस बारे में सरकारिया आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश हैं। बहुत साफ है कि विधानसभा का कार्यकाल बेशक पांच वर्ष के लिए होता है परन्तु राजनैतिक परिस्थितियों पर स्वयं राजनीतिज्ञों का भी नियन्त्रण नहीं हो सकता जिसके चलते सदन के भीतर के समीकरण बदलने से नहीं रोका जा सकता और उसके तहत सदन की आयु की गारंटी नहीं दी जा सकती। हर चुना हुआ सदन जनता का सदन होता है। अतः जनता से ही निर्देश लेना संवैधानिक उपबन्ध होता है। सबसे ऊपर भारत किसी अन्य देश जैसे अमेरिका की भांति निरपेक्ष संघीय ढांचे वाला देश नहीं है बल्कि यह राज्यों का संघ (यूनियन आफ इंडिया) है जिसमें राज्यों के अधिकारों की स्पष्टता के साथ व्याख्या की गई है। 

राज्यों को संविधान से ही शक्ति मिलती है और वे इसी शक्ति के बूते पर अपनी राजव्यवस्था चलाते हैं। इनमें सबसे बड़ी शक्ति राज्यों की अपनी चुनी हुई प्रादेशिक सरकार होती है जिसकी बागडोर राज्य के लोगों के हाथ में होती है। राज्यों में कार्यरत राजनैतिक दल चुने हुए सदन की संरचना करते हैं और प्रदेश के लोगों की अपेक्षाओं व आकांक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करते हैं। इसमें गड़बड़ पाये जाने पर लोगों को संविधान अधिकार देता है कि वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से सदन के भीतर के समीकरणों को बदल डालें। यह बेवजह नहीं था कि प्रख्यात समाजवादी नेता स्व. डा. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि ‘जिन्दा कौमें कभी पांच साल तक इन्तजार नहीं करतीं’। लोकतन्त्र लगातार जवाबदेही से चलता है और जीवन्तता पाता है और हमेशा मतदाताओं को मालिक मानकर अपना काम करता है। अतः मध्यावधि चुनाव कराने की संवैधानिक व्यवस्था संसदीय प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है। 

भारत की संसदीय प्रणाली को हमें टुकड़ों में पढ़ने की बल्कि समग्रता में पढ़ने की आवश्यकता है जिसमें सदन में पहुंचे हुए सदस्यों के विशेषाधिकार सम्मिलित हैं। इनमें सबसे बड़ा अधिकार जनता की आवाज को बिना किसी खौफ या डर के प्रकट करने का है। अतः विधानसभा व लोकसभा चुनाव एक साथ कराने के विचार को हमें संवैधानिक तराजू पर तोलते हुए लोकतन्त्र के विभिन्न पहलुओं से परखना होगा जिसमें भारत की विविधता का पक्ष केन्द्र में रखकर देखना होगा। चुनाव राजनैतिक दलों को लोकोन्मुखी होने का अवसर भी प्रदान करते हैं और आम जनता की राजनैतिक समझदारी बढ़ाने का काम भी करते हैं।