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अफगानिस्तान : आग से खेलता पाकिस्तान

अफगानिस्तान ने पाकिस्तान में अपने राजदूत की बेटी के अपहरण और उत्पीड़न के बाद इस्लामाबाद से अपने राजदूत और अन्य वरिष्ठ राजनयिकों को वापिस बुलाने के बाद दोनों देशों में टकराव काफी बढ़ गया है। यद्यपि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान सरकार से अपने फैसले पर पुन​िर्वचार की अपील करते हुए उसे राजनयिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने तक का भरोसा दिया है। पहले तो पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख रसीद ने कहा था कि पाकिस्तान में अफगानिस्तान के राजदूत की बेटी के साथ हुई घटना ‘अपहरण’ ​बिल्कुल नहीं थी। बाद में जब दबाव बढ़ा तो इमरान खान ने 48 घंटे के भीतर मामले की तह तक पहुंचने के निर्देश दिए। अपनी कमियों को छिपाने के लिए पाकिस्तान ने इस पूरे घटनाक्रम को अन्तर्राष्ट्रीय साजिश बताया और कहा कि यह भारतीय खुफिया एजैंसी ‘रा’ का एक एजैंडा है। भारत पर पाकिस्तान को बदनाम करने जैसे अनर्गल आरोप लगाने शुरू कर दिए।

पाकिस्तान ने बस हमले में मारे गए 9 चीनी इंजीनियरों की मौत के मामले में भी झूठ बोला था। पहले उसने इसे एक हादसा बताया था। जब ड्रेगन पाकिस्तान पर भड़का तो पाकिस्तान ने बस हमले की बात स्वीकारी, ब्लूचिस्तान लिबरेशन आर्मी चीन-पाक आर्थिक कोरीडोर का विरोध कर रही है। कोहिस्तान में चीन पनबिजली निर्माण कर रहा है, जिसे हमले के बाद रोक ​दिया गया है। ड्रैगन के गुस्से को शांत करने के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री अब गिड़गिड़ा रहे हैं। 

इसी बीच खबर यह है कि पाकिस्तान ने ता​लिबान की मदद के लिए दस हजार से अधिक जिहादी लड़ाके अफगानिस्तान में भेजे हैं। तालिबान की मदद को लेकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने इमरान की मौजूदगी में यह आरोप लगाया था। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क को भारत के ठिकानों पर हमला करने के निर्देश भी दिए हैं।

इमरान खान के नेतृत्व में पा​किस्तान ऐसे जाल में उलझ चुका है, जहां अंततः उसके ही नागरिकों का खून बहेगा। इमरान कैसे प्रधानमंत्री हैं जो अपने ही युवाओं को जिहादी बनाकर मरने के लिए भेज रहे हैं। अफगानिस्तान में अशांति से सबसे ज्यादा पाकिस्तान ही प्रभावित हुआ है। पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान में 70 हजार लोगों की जान गई है। इमरान भारत के अंध विरोध में इतने डूूबे हुए हैं कि वह अपने देश को ही विनाश की आग में झोंक रहे हैं। कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान का जितना प्रभाव तालिबान पर हुआ करता था, अब उतना नहीं रहा।  तालिबान ने अपनी रणनीति भी बदली है। तालिबान क्रूरता के साथ-साथ कूटनीतिक तरीके से भी आगे बढ़ना चाहता है, तभी तो उसने कई देशों से सम्पर्क किया और कतर में तो उसने अपना एक राजनीतिक कार्यालय खोल रखा है। तालिबान में भी कई गुट हैं जो अफगानिस्तान के लोगों की सम्पत्ति लूटने में लगे हुए हैं। तालिबान शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को तो स्वीकार कर रहा है लेकिन उस पर भरोसा नहीं करता। अगर अफगानिस्तान में गृह युद्ध छिड़ गया तो फिर सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान की होगी। पाकिस्तान को एक बार फिर शरणार्थी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। जिस देश में लोगों को खुद के खाने के लाले पड़े हुए हैं, वह देश शरणार्थियों का पेट कैसे भरेगा।

अफगानिस्तान में चल रहे संघर्ष के बीच एक नया मोड़ तब आया जब अमेरिका, ताजिकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज्बेकिस्तान ने प्रण लिया है कि वे तालिबान काे हिंसा के बल पर अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं करने देंगे। अगर ताकत के बल पर आने वाली किसी भी अफगान सरकार को समर्थन नहीं देंगे। मध्य एशिया के इन 5 देशों का कहना है कि अफगान युद्ध की वजह से दक्षिण और मध्य एशियाई देशों का आर्थिक विकास बाधित हो गया है। तहरीक-ए-तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने दो टूक कहा है कि पाकिस्तान से हम भाईचारे का रिश्ता चाहते हैं, वे शांति प्रक्रिया में हमारी मदद कर सकते हैं लेकिन हम पर तानाशाही नहीं चला सकते और न ही विचार थोप सकते हैं। इन परिस्थितियों में यह कहना मुश्किल है कि तालिबान पाकिस्तान के नियंत्रण में रहेगा। इमरान खान को याद रखना होगा कि पाकिस्तान आतंकवादियों ने लाल घाटी में क्या किया। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि तीन लाख अफगान सुरक्षा बलों के सामने 75 हजार तालिबान लड़ाके लड़ नहीं सकेंगे लेकिन पाकिस्तान तालिबान की मदद कर रहा है। लेकिन उसे अहसास नहीं हो रहा कि एक दिन तालिबान पाकिस्तान की भूमि पर भी कब्जा कर लेगा तो फिर उसका वजूद खतरे में पड़ जाएगा। इमरान पाकिस्तान को आग की भट्ठी में झोंक रहे हैं। अगर पाकिस्तान नहीं सुधरा तो फिर अफगानिस्तान से उसका टकराव खतरनाक होगा। वैश्विक शक्तियां पा​किस्तान को भी अपने निशाने पर ले सकती हैं।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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