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संपादकीय

फिर चली तीन तलाक की बात!

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लोकसभा में तीन तलाक विधेयक कई बार अध्यादेशों की शक्ल में लागू रहते हुए पुनः आया है। नई लोकसभा का यह प्रथम विधेयक है जिसका विरोध प्रस्तुति के समय ही विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने पुरजोर तरीके से किया। निश्चित रूप से मुस्लिम सम्प्रदाय में चालू एक साथ तीन तलाक कह देने पर पत्नी से तलाक पाने की प्रथा गैर इस्लामी और शरीयत के खिलाफ है। अतः इसका जारी रहना किसी भी तौर पर जायज नहीं कहा जा सकता और ऐसा करने वाले मुसलमान खाविन्द इस्लाम की नसीहतों के खिलाफ ही अमल करते हैं। 

इस प्रथा को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में अहम फैसला देते हुए गैर कानूनी करार दिया और कहा कि इस तरीके से दिया गया तलाक न तो समाज और न कानून की निगाह में अमली समझा जाना चाहिए लेकिन हकीकत यह भी है कि मुस्लिम समाज में इस प्रथा को पूरी तरह बन्द करने के लिए किसी ऐसे कानूनी नुक्ते की जरूरत है जिससे इसे घर की चारदीवारी में लागू करने से डर पैदा हो। सरकार ने इसके लिए फौजदारी जाब्ते का रास्ता चुना है जिसके तहत ‘शादी’ नागरिक (सिविल) कानून के दायरे से निकल कर फौजदारी कानून के दायरे में पहुंच जाती है। इस्लाम में निकाह सात जन्मों का बन्धन नहीं बल्कि एक पवित्र इकरारनामा होता है जिसे ‘अनबन’ होने पर पति-पत्नी इस इकरारनामें की शर्तों को पूरा करके तोड़ सकते हैं।  

इसके लिए ‘कुरान-ए-मजीद’ में तलाक लेने की पूरी चरणबद्ध धार्मिक प्रणाली है। मगर यह व्यवस्था इकतरफा नहीं है बल्कि पत्नी को भी हक है कि वह अपने पति से तलाक ले सके जो ‘खुला’ का पालन करके किया जाता है। यह इस्लाम में महिला को बराबरी का दर्जा देने का सबूत भी है मगर 1400 साल पहले की गई इस व्यवस्था में कालान्तर में पुरुष प्रधान सामन्ती समाज ने अपनी सहूलियतों के हिसाब से मजहबी रवायतों को इस तरह मोड़ने में सफलता हासिल की कि शरीयत के अनुसार महीनों की बताई गई ‘तीन तलाक’ की प्रक्रिया को ‘मिनटों-सैकेंडों’ का कर दिया। इसमें सबसे बड़ा दोष ‘उलेमाओं’ का ही था जिन्होंने इस प्रक्रिया में ‘निकाह हलाला’ का भी नया संस्करण जोड़ दिया। 

दरअसल इस्लाम के ‘वैज्ञानिक’ स्वरूप के साथ यह क्रूर मजाक स्वयं मजहब के रहनुमाओं ने ही सिर्फ अपनी रसूखदारी बरकरार रखने के लिए ही किया जिसके नतीजे में पूरे मुस्लिम महिला समाज में असन्तोष पैदा होना ही था कि उनके साथ की गई बदसलूकी उनके ‘दीन’ के उसूलों के खिलाफ थी इसलिए तीन तलाक का मामला मजहब के दायरे से बाहर ऐसा मसला बना जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए यह ध्यान रखा कि वह इस्लाम के समाजी कानून ‘शरीयत’ के दायरे में न जाये और इसी सिद्धान्त के तहत विद्वान न्यायाधीशों ने अपना फैसला 2017 में सुनाया और ‘तात्कालिक’ तीन तलाक को गैर कानूनी घोषित कर दिया। 

अब असल मसला यह है कि मोदी सरकार संविधान द्वारा घोषित इस प्रथा को ‘असंवैधानिक’ करार दिये जाने के बाद इसका चलन पूरी तरह रोकना चाहती है और इस बाबत ऐसा कानून बनाना चाहती है जिससे इसे अमल में लाने वाले खाविन्द जेल की हवा खाने के डर से थर-थर कांपने लगें लेकिन सवाल यह पेचीदा है कि जब कोई खाविन्द अवैधानिक काम करने के जुर्म में तीन साल की सजा काट कर आयेगा तो क्या वह अपनी ‘अहलिया’ के साथ जिन्दगी आराम से काट सकेगा और इन तीन सालों में उसके परिवार की परवरिश किस तरह होगी? उसे उस जुर्म की सजा मिली जो कानून की नजर में वजूद में आया ही नहीं और जब नये तीन तलाक कानून के तहत वह सजा का खतावार हुआ तो उसे फिर से वापस उसी माहौल में आने को मजबूर किया गया। 

सबसे बड़ा अन्तर्विरोध यही है जिसका कोई कारगर तोड़ निकालना चाहिए। यह तोड़ तीन तलाक का जुर्म करने वाले खाविन्द को सिविल दायरे में ही जुर्माने की तजवीज का इस तरह हो सकता है कि अहलिया के ‘मायके वालों’ को उन कानूनी अख्तियारों से लैस किया जाये जिनके डर से खाविन्द अपने बीवी-बच्चों की परवरिश और देखभाल और ज्यादा शिद्दत से करने को मजबूर हो। इसके लिए खाविन्द पर तीन तलाक एक झटके में कहने पर मायकों वालाें की जमानत में वह रकम जमा कराने की बाजाब्ता ताईद हो सकती है जो उसकी हैसियत से थोड़ी ऊंची हो। आर्थिक दंड का डर किसी भी इंसान के लिए शारीरिक दंड से कम नहीं होता। इस बारे में कानूनी 

जानकार और कोई ऐसा नुक्ता ढूंढ सकते हैं जिससे तीन तलाक का मामला फौजदारी बनने से भी रुके और ऐसा करने वाले को ताजिन्दगी डर भी रहे। इस मामले में सवाल हिन्दू-मुसलमान का बिल्कुल नहीं है बल्कि शरीयत के पाबन्द मुस्लिम समाज को अपने भीतर ही वह सुधार करने की जरूरत है जिससे इसकी औरतों को वह रुतबा हासिल हो जो ‘कुरान-ए-मजीद’ का हुक्म है। इस्लाम को मजलूमों का मजहब इसीलिए कहा गया क्योंकि यह समाजी एतबार से गैर बराबरी को जड़ से मिटाने वाला धर्म है। हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हिन्दू कोड बिल में महिलाओं को सम्पत्ति में जो अधिकार देने की व्यवस्था की गई वह ‘कुरान-ए- मजीद’ से ही ली गई है। 

इतना ही नहीं तलाक की जो बाजाब्ता व्यवस्था इस पवित्र पुस्तक में है उसी का संशोधित स्वरूप हमने इस बिल में शामिल किया है वरना हिन्दू समाज में तलाक की तो कोई अवधारणा ही नहीं है हिन्दुओं में एक बार विवाहित स्त्री के ससुराल आने के बाद उसकी अन्तिम यात्रा वहीं से होने का विचार है जबकि स्त्रियों को बराबर के अधिकार देने का विचार बाबा साहेब अम्बेडकर ने इस्लाम से ही लिया था और उन्हें पारिवारिक सम्पत्ति का हकदार बनाया था। मनुस्मृति में शूद्रों और स्त्रियों का कार्य केवल सेवा करना बताया गया है, बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल में इस अवधारणा को उलट दिया था। इस्लाम में स्त्रियों का सम्पत्ति अधिकार और तलाक का हक शुरू से ही है। 

अतः भारत विभिन्न संस्कृतियों का संगम केवल भौतिक रूप से ही नहीं बल्कि आन्तरिक रूप से भी है परन्तु हिन्दू संस्कृति में भी महिला प्रधान समाज की परिकल्पना अमूर्त नहीं रही है जिसका प्रमाण भारत का एक नाम ‘इलावर्त’ होना भी है। कालान्तर में समाज संरचना में स्त्री को ‘धन’ और ‘उपभोग्या’ का दर्जा साम्राज्य विस्तार की लालसा से मिलता चला गया और वह स्थिति आ गई कि उसे केवल ‘सेवा’ का निमित्त मान लिया गया। अतः तीन तलाक कानून को सभी दायरों से ऊपर उठ कर देखने की जरूरत है और परिवार को बान्धे रखने की तजवीजों के साथ इस कानून को यथारूप बनाने की जरूरत है जिससे यह संविधान के सभी अनुबन्धों पर खरा उतर सके।