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संपादकीय

‘सबका विश्वास’ है ‘संसदीय मन्त्र’

आज से नई चुनी हुई लोकसभा का सत्र शुरू हो रहा है, हालांकि पहले दो दिन नये सांसदों को शपथ दिलाने की कार्रवाई पूरी होने के बाद 20 जून को ही राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र सम्बोधित करके देशवासियों के समक्ष स्पष्ट कर देंगे कि नई चुनी हुई सरकार का राष्ट्रीय लक्ष्य क्या होगा। संसदीय लोकतन्त्र में बेशक बहुमत की महत्ता होती है क्योंकि आम जनता उसे सरकार बनाने का जनादेश देती है,मगर यही जनता विपक्ष को भी चुनती है। अतः सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आम जनता की नुमाइन्दगी करते हैं।

 दुर्भाग्य यह है कि इस बार भी लोकसभा में विपक्ष बहुत बिखरा हुआ और कमजोर नजर आयेगा। प्रमुख कही जाने वाली कांग्रेस पार्टी के कुल 52 सांसदों के ही चुनकर आने की वजह से इसके किसी सांसद को विपक्षी दल के नेता का दर्जा नहीं मिल सकेगा परन्तु चुनावी राजनीति का समय पूरा हो जाने के बाद अब संसदीय राजनीति की शुरूआत होगी और संसद में जो राजनीति की जाती है वह केवल तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही होती है। इसलिए जनता को आश्चर्य हो सकता है कि लोकसभा चुनावों के दौरान जो विषय या मुद्दे पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर तलवार की तरह चला रहे थे वे संसद से पूरी तरह गायब रहेंगे। 

विपक्षी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने पूरे लोकसभा चुनावों में जिस तरह राफेल लड़ाकू विमान के मुद्दे पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी और सत्तारूढ़ दल भाजपा को घेरने की कोशिश की थी उसे आम जनता ने इस तरह नकारा कि श्री मोदी के नाम पर ही इस बार 2014 के चुनावों से भी ज्यादा भाजपा सांसदों को लोकसभा में पहुंचाया। इससे यह तय हो गया कि भारत की जनता को सिर्फ आरोपों के आधार पर बहकाया नहीं जा सकता है। इसी प्रकार लोकसभा चुनावों के दौरान ही 1984 के सिख दंगों का मामला भी उछला मगर पंजाब में कांग्रेस पार्टी को जबर्दस्त सफलता मिली। इस राज्य की कुल 13 लोकसभा सीटों में से आठ पर कांग्रेसी उम्मीदवार विजयी रहे। 

इसका मतलब भी यही निकलता है कि सिर्फ आरोपों के आधार पर राजनीतिक लाभांश एक सीमा तक ही पाया जा सकता है, सड़क पर किसी मुद्दे को खड़ा करके उसकी तसदीक जब अदालत या संविधान के दायरे में की जाती है तो ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो जाता है और उसके बाद उस विषय पर राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं रहती। राफेल मामले में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया था इसके बावजूद श्री राहुल गांधी इसे जबर्दस्ती खींचते रहे और चुनावी मैदान में मुद्दा बनाते रहे। इसी प्रकार सिख दंगों के मामले में अकाली दल के कुछ नेताओं का रवैया है। वे इस विषय को किसी न किसी बहाने सर्वदा के लिए सुलगाये नहीं रख सकते। भारत में राजनैतिक दलों की सरकारें बेशक काबिज होती हों मगर राज ‘कानून और संविधान’ का ही चलता है।

 संविधान की शपथ लेकर जब सरकारों का गठन होता है तो साफ हो जाता है कि एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए राजनैतिक दल चाहे जो भी रास्ते अपनायें और आरोप लगायें मगर अन्तिम सत्य कानून के रास्ते से ही तय होगा। सिख दंगों को लेकर कई जांच आयोगों का गठन हो चुका है और उनके निष्कर्ष के आधार पर कांग्रेस के ही कई नेताओं के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है। अतः किसी भी अन्य नेता पर आरोप लगाने से पहले अब अकालियों को जांच आयोगों की रिपोर्टों को पढ़ना चाहिए और फिर अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि 1984 से पहले पूरे पंजाब में जिस तरह का आतंक चला कर चुनीन्दा तौर पर दूसरे समुदाय के लोगों की बहनों को विधवा बनाया गया था उनकी आवाज कौन उठायेगा? यह बहुत संजीदा और मानवीय प्रश्न है जो हर पक्ष पर एक समान से लागू होता है। 

21वीं सदी का भारत पुरानी कब्रों को उखाड़ कर उनकी जांच-परख करने के ‘अकीदों’ के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता है बल्कि आगे का नया रास्ता खोज कर बढ़ सकता है। 65 प्रतिशत युवाओं की जनसंख्या वाले देश में हमें अपनी राजनीति के तेवर भी बदलने होंगे और तय करना होगा कि इसकी सांझा संस्कृति में हर वर्ग और समुदाय की बराबर की हिस्सेदारी हो। यह बेवजह नहीं है कि श्री नरेन्द्र मोदी ने पुनः प्रधानमन्त्री बनने के बाद सबसे पहले यह कहना जरूरी समझा कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए केवल सबका साथ, सबका विकास ही जरूरी नहीं है बल्कि ‘सबका विश्वास’ भी जरूरी है।

 उनके इस बयान को लेकर खूब समीक्षाएं हो रही हैं मगर इतना तो निश्चित है कि श्री मोदी सबसे पहले अपनी पार्टी के लोगों को ही यह सन्देश दे रहे हैं कि हिन्दोस्तान को नये मुकाम पर तभी पहुंचाया जा सकता है कि जबकि सभी हिन्दू-मुसलमान व अन्य समुदायों के लोग इकट्ठा होकर एक साथ प्रयास करें। वस्तुतः 2019 में हुए चुनावी ‘समुद्रमंथन’ से जो भाजपा विजयी होकर निकली है उसका मन्त्र ‘हम हिन्द के लोग ’ है। यह तथ्य इसके विरोधियों को यदि फिलहाल नहीं पच पा रहा है तो इसकी वजह यह है कि उनके दिमाग से पुराने दाग नहीं मिट पा रहे हैं। 

हकीकत यह है कि आजादी की लड़ाई के दौरान मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना भी कांग्रेस पार्टी को ‘हिन्दू पार्टी’ बताया करते थे। इसके साथ ही जमीनी हकीकत को हमें समझना चाहिए कि सत्ता में ‘आने’ की राजनीति और होती है और सत्ता ‘करने’ की राजनीति और होती है। अतः संसद में जो राजनीति होती है वह सत्ता ‘करने’ की राजनीति होती है और संसद में जनता के वोट से बनी सरकार हर मतदाता की सरकार होती है जिसके नुमाइन्दें पक्ष और विपक्ष में बैठे होते हैं मगर जो लोग हुकूमत में बैठाये जाते हैं वे सभी मतदाताओं के हकों की हिफाजत के लिए बैठाये जाते हैं और यह हिफाजत सत्ता पक्ष-विपक्ष की मदद लेकर ही करता है। अतः ‘सबका विश्वास’ हमारी संसदीय प्रणाली की व्यवस्था का ही अभिन्न हिस्सा है।