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संपादकीय

गठबन्धन : हवाई तारों का टूटता जाल

उत्तर प्रदेश में बसपा नेता सुश्री मायावती और समाजवादी नेता अखिलेश यादव के साथ ही लोकदल नेता अजित सिंह ने जिस तरह अपनी-अपनी पार्टियों क्रमशः सपा, बसपा व रालोद का गठबन्धन लोकसभा चुनावों से पूर्व बनाया था उसका टिके रहना संभव इसलिए नहीं था क्योंकि यह ‘रासायनिक मिश्रण’ न होकर ‘भौतिकीय युग्म’ था जिसके किसी भी झटके से बिखर जाने का हमेशा अन्देशा बना रहता है। लोकसभा चुनावों के दौरान यह गठबन्धन केवल प. उत्तर प्रदेश के आंशिक इलाकों में ही इस तरह नजर आया कि इन दलों के समर्थक मतदाताओं में जमीन पर सीमित एकता होती दिखाई पड़ी। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश मायावती का गढ़ उनके समर्थक ‘जाटव’ मतदाताओं की भारी संख्या की वजह से माना जाता है जहां रालोद के ‘जाट’ मतदाताओं की संख्या भी प्रभावी है। इस इलाके में मुस्लिम मतदाता भी प्रभावी संख्या में हैं। इस क्षेत्र की कुल 22 लोकसभा सीटों में से गठबन्धन को पांच सीटों पर ही सफलता मिल पाई- ये नगीना, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल व अमरोहा हैं। इन पांचों सीटों पर अखिलेश यादव के समर्थक माने जाने वाले यादव मतदाताओं की संख्या ज्यादा नहीं है जबकि अन्य पिछड़ा समुदाय के लोगों के मतादाता खासी संख्या में हैं। अतः नगीना, बिजनौर व अमरोहा सीटों से बसपा प्रत्याशियों की विजय का सेहरा इन क्षेत्रों में मुस्लिम-जाटव वोट बैंक के एकजुट हो जाने को दिया जा सकता है जबकि मुरादाबाद व संभल सीट पर खड़े सपा प्रत्याशियों की विजय के लिए भी यही वोट गणित सफल रहा है।

इन पांचों सीटों पर रालोद के जाट मतदाताओं ने गठबन्धन की जगह भाजपा के साथ जाना बेहतर समझा और उनके साथ ही यादवों के अलावा अन्य पिछड़े वर्ग के समुदाय के लोगों ने भी भाजपा को मत देना उचित समझा। जहां तक समाजवादी पार्टी के मजबूत समझे जाने वाले दुर्ग मध्य उत्तर प्रदेश के इलाके ‘एटा, इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, फर्रुखाबाद, कन्नौज’ का सवाल है वहां यादव वोट बैंक ने ही इस गठबन्धन का साथ छोड़कर भाजपा का दामन पकड़ना उचित समझा। असल में ‘‘बबूल का पेड़ बोने से उस पर आम किसी सूरत में नहीं आ सकते।’’ इन तीनों दलों ने ही अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए जिस तरह अपने-अपने जातिगत समूहों के बीच ‘रंजिश’ के बीज बोये हैं वे इनके नेताओं के एक मंच पर आने से ‘मिठास’ में नहीं बदल सकते थे। 

मगर यह भी हकीकत है कि सुश्री मायावती के समर्थक जाटव समुदाय के लोगों ने आंख बन्द करके गठबन्धन के प्रत्याशियों को मत डाले। इसकी असली वजह यह थी कि इस वर्ग के लोगों में उनके प्रधानमन्त्री पद का दावेदार होने की सुगबुगाहट बहुत तेजी के साथ फैल गई थी। इससे यही सिद्ध होता है कि मायावती का रुतबा उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी भी कम नहीं हुआ है। अतः मायावती का यह कहना कि समाजवादी पार्टी अपने परिवार की फिरोजाबाद, कन्नौज और बदायूं सीट तक नहीं बचा पाई, राज्य की भविष्य की राजनीति की पर्तें खोलता है। समाजवादी पार्टी ने कुल पांच सीटें जीती हैं जिनमें दो सीटें ‘पिता-पुत्र’ मुलायम सिंह व अखिलेश यादव की हैं। 

शेष तीन सीटें रामपुर, संभल व मुरादाबाद सपा बिना मायावती के समर्थन के किसी हालत में नहीं जीत सकती थी। रामपुर में आजम खां की विजय के पीछे भी उनके साथ जाटव मतदाताओं का गोलबन्द होना रहा है। इससे यही नतीजा निकलता है कि समाजवादी पार्टी के दिन लदने में अब ज्यादा समय शेष नहीं है जबकि मायावती की राजनीति पूरी तरह जमीन पकड़ कर खड़ी हुई है लेकिन रालोद के अजित सिंह की हालत सबसे ज्यादा खराब है जो गठबन्धन में सीना ठोक कर शामिल हुए थे और समझ रहे थे कि जाट मतदाता अब भी उनके पीछे आंखे मूंद कर चलता रहेगा। इस दल के सर्वेसर्वा चौ.​​ अजित सिंह स्वयं मुजफ्फरनगर से चुनाव हार गए। इस सीट पर उन्हें जाट समुदाय के लोगों का ही पचास प्रतिशत वोट बामुश्किल हासिल हुआ जबकि उनके पुत्र जयन्त चौधरी बागपत सीट से बहुत कम अन्तर से पराजित हुए। ये दोनों सीटें ही जाट बहुल सीटें हैं जो स्व. चौधरी चरण सिंह की विरासत को आज भी अपना गौरव मानती हैं। 

इसका मतलब यही निकलेगा कि जाटों ने ही अजित सिंह को चौधरी साहब की विरासत से अलग-थलग कर दिया है। 2014 में अिजत सिंह बागपत से भी पराजित हो चुके हैं। अतः पूरे राज्य में जातिगत गणित की दुकान सजा कर मतदाताओं को आकर्षित करने का खेल समाप्त हो चुका है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी बहुजन समाज पार्टी को जो विजय प्राप्त हुई है, वह दलित-मुस्लिम गठबन्धन की वजह से ही प्राप्त हुई है। यही वजह है कि मायावती ने घोषणा कर दी है कि राज्य के 11 विधानसभा उपचुनावों पर वह अपनी पार्टी के स्वतन्त्र उम्मीदवार उतारेंगी। यह सब उन्होंने जमीनी हकीकत देखकर ही किया है और गठबन्धन के जारी रखने पर अकारण ही प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है लेकिन गठबन्धन का असफल होना चिन्ता की बात इसलिए है कि उत्तर प्रदेश ‘जातिवाद के जहर’ के असर से बाहर निकलने का नाम नहीं ले रहा है। 

जातिवाद इस राज्य में आज भी सभी प्रमुख राजनीतिक मुद्दों पर छाया हुआ है। समाज के सबसे दबे-कुचले समुदाय ‘जाटव’ की संकेतात्मक प्रभुता भी इसे स्वीकार नहीं है। 21वीं सदी की यह बहुत बड़ी विसंगति है। अब केवल देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या नया रंग बिखरता है। इसका पता भी हमें आने वाले विधानसभा उपचुनावों के बाद लग जायेगा जो सुश्री मायावती पहली बार लड़ेंगी। राजनीति में अपना स्थान जमाने के बाद यह पहला मौका होगा कि उनकी पार्टी उपचुनाव अपने बूते पर लड़ेगी क्योंकि नीतिगत रूप से बहुजन समाज पार्टी उपचुनाव नहीं लड़ा करती थी। खतरा केवल इतना है कि मायावती कहीं पुनः उस विमर्श को न पकड़ लें जो उनकी पार्टी की शुरूआत में ‘तिलक, तराजू...’ का नारा देकर उछाला गया था। दूसरे विकल्प क्या होंगे उनके बारे में कहना बहुत जल्दबाजी होगी क्योंकि राज्य में भाजपा के बाद वही दूसरे नम्बर पर फिलहाल मानी जायेंगी।