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संपादकीय

अमर्त्य सेन : जड़ों से कटे लोग

खलील जिब्रान ने एक बड़ी प्यारी सी कथा लिखी है- ‘‘एक बार शाम के समय एक दरिया के किनारे ‘अच्छाई की देवी’ शिला पर बैठी हुई थी। थोड़ी देर बाद ‘बुराई की देवी’ भी आकर बैठ गई। थोड़ी देर शांति रही, फिर अच्छाई की देवी ने उससे कहा-बहन तुम मेरे पास क्यों? तुम तो जानती हो कि अच्छाई के साथ बुराई नहीं रह सकती। बुराई की देवी व्यथित हो गई और बोली-‘‘हम दोनों तो जुड़वां बहनें हैं, हम अकेले कैसे रह सकती हैं? मैं जब पीठ फेर लेती हूं तो लोग तुम्हारा अनुभव करते हैं और तुम जब पीठ फेर लेती हो तो लोग मुझे देखने लग जाते हैं। हम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।’’ तब से ये कहावत अस्तित्व में आ गई कि व्यक्ति के जीवन में अच्छाई-बुराई साथ-साथ चलती हैं।

लोग शायद ही कभी समझ पाते हों कि कई बार अशुभता में भी शुभता छिपी होती है। इतिहास में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जो कालजयी हैं, वे किन्हीं जाति-वर्ग और धर्म विशेष के लिए नहीं हैं, वे सारी मानवता काे दिए गए उपदेश हैं। उनका विस्तार दिल से दिल तक है। हमारा सनातन वांग्मय अद्भुत है। श्रीराम के चरित्र की सुगन्ध विश्व के हर हिस्से को प्रभावित करती है। साकेत नामक काव्य में मैथिलीशरण गुप्त को पढ़ें-
‘‘राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है,
कोई कवि हो जाए, सहज संभाव्य है।’’

श्रीरामचरित मानस ही क्यों, अनेकानेक ग्रंथ ऐसे हैं जो श्रीराम के पावन चरित्र को समर्पित हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर गोविन्द रामायण तक, महर्षि वाल्मीकि से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी तक रामकथा को अपनाकर कौन ऐसा है जो धन्य नहीं हुआ? उस प्रातः स्मरणीय, मर्यादा पुरुषोत्तम के उद्घोष ‘जय श्रीराम’ का विरोध भारत में कौन करना चाहेगा। श्रीराम हमारे रोम-रोम में हैं तो फिर श्रीराम का उद्घोष बोलने वालाें की हत्याएं क्यों? ये शब्द तो ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल हम लोग एक-दूसरे के अभिवादन के समय भी करते हैं। अब यह शब्द बोलना भी पश्चिम बंगाल में गुनाह हो चुका है। हैरानी हुई जब नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने बड़ा अजीबोगरीब बयान दिया। 

उनका कहना है कि जय श्रीराम का बंगाली संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। अब इसका इस्तेमाल लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। यह उनके व्यक्तिगत विचार हो सकते हैं। श्रीराम भी मां दुर्गा के उपासक रहे हैं। मां दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है जिसने दुष्ट राक्षसों का अन्त करने के लिए ही जन्म लिया था। भगवान राम ने भी कई राक्षसों का अन्त किया और अन्ततः रावण को मारकर ​श्रीलंका पर विजय पाई। जिन्हें हम ईश्वर के तौर पर स्वीकार करते हैं उन सबका अपना-अपना महत्व है।

ऐसा लगता है कि अमर्त्य सेन ने वामपंथी विचारधारा के दबाव में वक्तव्य दिया है। जय श्रीराम तो पश्चिम बंगाल के गांवों में भी बोला जाता है। अर्थशास्त्री के तौर पर अमर्त्य सेन बहुत बड़ा नाम है लेकिन वह विदेश में रहते हैं। उनका भारत के लोगों से कितना जुड़ाव है यह तो वही जानते होंगे लेकिन उनके वक्तव्य से स्पष्ट है कि वह भारतीय सांस्कृतिक लोकाचार से कट चुके हैं। जय श्रीराम का नारा तो अच्छे शासन का प्रतीक है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी राम राज्य की कल्पना की थी। गांधी जी आज जीवित होते तो जय श्रीराम के नारे का विरोध देखकर आंसू जरूर बहाते। वह इस बात से भी द्रवित होते कि किसी विशेष समुदाय के लोगों को जय श्रीराम बुलवाया जा रहा है और उनसे मारपीट की जाती है। 

जय श्रीराम बोलना भारतीयों की परम्परा रही है लेकिन बड़े लोग अब अपनी परम्पराओं से कट चुके हैं। किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति तभी जीवित रहती है जब संस्कारों और परम्पराओं का निर्वाह किया जाए। जिस दिन यह देश श्रीराम से विमुख होगा उसी दिन इसकी सभ्यता और संस्कृति नहीं बचेगी। यह भी जरूरी है कि श्रीराम को सियासत की तिजारत न बनाया जाए। हो सकता है आपको मेरी बातों में भावना का पुट ज्यादा दिखाई दे परन्तु श्रीराम का चरित्र ही ऐसा है जो जीवन को शांति प्रदान करता है। हमें जय श्रीराम के नाम की पावन शक्ति को पहचानना होगा। आज देश को भावनात्मक एकता की जरूरत है, जो जय श्रीराम से ही सम्भव है।