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संशोधित नागरिकता कानून

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत का असम में यह कहना कि नये संशोधित नागरिकता कानून से किसी मुस्लिम को डरने की जरूरत नहीं है और इसका हिन्दू-मुस्लिम विभाजन से कोई लेना-देना नहीं है, इस वजह से ठीक है क्योंकि इस कानून से भारत के मुस्लिम नागरिकों का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह कानून भारत में शरण मांगने वाले विदेशी नागरिकों के लिए बना है। खासकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश के अल्पसंख्यक नागरिकों के लिए। तर्क यह है कि ये तीनों देश ही मुस्लिम राष्ट्र हैं अतः इनमें मुस्लिम नागरिकों की प्रताड़ना की संभावना बहुत कम या ना के बराबर है। भारत बेशक एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है मगर यह इन देशों के हिन्दू या अन्य अल्पसंख्यक नागरिकों को धर्म के आधार पर उनके देश में सताये जाने की उपेक्षा नहीं कर सकता।

 इतिहास इस बात का साक्षी है कि केवल मजहब को आधार बना कर ही मुहम्मद अली जिन्ना ने 1947 में भारत के दो टुकड़े करा दिये थे और हिन्दू व मुसलमानों को दो कौमें या नस्लें सिद्ध करने की जुर्रत की थी। पिछली सदी में भारत का हुआ यह बंटवारा सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी थी क्योंकि इसमें एक से दूसरे देश में आबादियों की अदला-बदली हुई थी और लाखों लोग कत्लो-गारत का निशाना बने थे। जिन्ना ने अखंड भारत के ऐसे दो राज्यों पंजाब व बंगाल को मुस्लिम बहुल होने की वजह से पाकिस्तान के लिए चुना था और अंग्रेजों की साजिश के तहत काम किया था जिनके लोगों की पूरी संस्कृति एक समान थी।   इन दोनों ही राज्यों के नागरिकों की संस्कृति एक थी इसके बावजूद ये पाकिस्तान के नाम पर बांट दिये गये थे। चाहे पंजाबी मुसलमान हों या बंगाली मुसलमान दोनों का पहनावा एक जैसा था, एक जैसी भाषा थी, एक जैसा ही खानपान था, एक जैसा ही सामाजिक ढांचा था, इसके बावजूद ये अलग-अलग नस्ल के इसलिए हो गये थे कि इनका मजहब अलग-अलग था। मजहब की वजह से इनकी राष्ट्रीयता अलग कर दी गई थी। मगर 1971 में बंगाल के पूर्वी पाकिस्तान के मुस्लिमों ने इसका  मुहतोड़ जवाब दिया और जिन्ना के सिद्धान्त को उसकी ही कब्र में गाड़ कर एक पृथक देश बांग्लादेश की घोषणा कर दी। ठीक यही स्थिति आज के पाकिस्तान स्थित पंजाब की है जहां के लोगों की जुबान पंजाबी है, पहनावा पंजाबी है और खानपान भी पंजाबी है और इनकी सामाजिक से लेकर धार्मिक रवायतें भी पंजाबी संस्कृति में  रंगी हुई हैं। मगर हकीकत यह भी है कि 1947 में इन्ही पंजाबियों और बंगालियों को एक-दूसरे के खून का प्यासा बना दिया गया। 

बांग्लादेश में तो इसके निर्माण के समय धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त इसके जनक शेख मुजीबुर्रहमान ने अपनाया मगर हम आज जिसे पाकिस्तान कहते हैं उसके हुक्मरानों ने हिन्दुओं से दुश्मनी की नीति को जारी रखा और भारत विरोध को अपना ईमान बना लिया जिसकी वजह से आज भी इस देश से धर्मान्तरण की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं जबकि पाकिस्तान बनने के बाद 1950 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री प. जवाहर लाल नेहरू व पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाकत अली खां के बीच दोनों देशों के अल्पसंख्यकों के धार्मिक व सामाजिक हित सुरक्षित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था जिसे ‘नेहरू-लियाकत पैक्ट’  के नाम से जाना जाता है । इस समझौते मंे पाकिस्तान ने अहद किया था कि वह अपने देश के हिन्दुओं व अन्य अल्पसंख्यकों को पूरी सुरक्षा देगा और एक आयोग बनाकर उनके हितों का संरक्षण करता रहेगा। मगर नामुराद पाकिस्तान में लियाकत अली की हत्या कर दी गई और इसके बाद 1956 के आते-आते लोकतन्त्र का गला घोट कर मार्शल ला लागू कर दिया गया और सैनिक शासन काबिज हो गया। इसके बाद पाकिस्तान पूरी तरह भारत विरोध के नाम पर हिन्दू विरोध में  डूबता चला गया। भारत के साथ किये गये इसके समझौते ताक पर रख दिये गये जिसकी वजह से इस देश में लगातार धर्मान्तरण होता रहा और अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढहाये जाते रहे। 

दूसरी तरफ अफगानिस्तान में नब्बे के दशक में तालिबानों के उभरने के साथ ही यहां के सिखों व हिन्दुओं को निशाना बनाया जाने लगा और उन पर जुल्म ढहाने का सिलसिला तेज कर दिया गया। इसी वजह से इस देश से हजारों की संख्या में सिख शरणार्थी आये। इनकी नागरिकता का सवाल अभी तक खुला हुआ है।  ऐसे ही पाकिस्तान से भी हिन्दू शरणार्थी भारत में शरण लिये हुए हैं। जबकि भारत लगातार 1950 के बाद से अपने असल्पसंख्यकों को पूर्ण सुरक्षा देने का वचन निभाता चला आ रहा है।  नये कानून के तहत ऐसे ही लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान की जायेगी। अतः इस कानून का विरोध तर्कपूर्ण नहीं है। दूसरी तरफ जहां तक इस कानून के विरोधियों का तर्क है कि यह कानून भारतीय संविधान के मानवीयता के सिद्धान्त का विरोध करता है तो यह पता होना चाहिए कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। न्यायालय ही इसकी संवैधानिकता की जांच कर सकता है क्योंकि इस कानून को संसद ने बनाया है।