पांच नवम्बर यानी आज से ईरान के विरुद्ध अमेरिकी प्रतिबंध लागू हो गए हैं। ईरान शुरू से ही कहता रहा है कि उसके परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य शांतिपूर्ण और अपने लिए ईंधन उपलब्ध कराना है लेकिन अमेरिका ने अपने चमचे देशों के साथ मिलकर यह प्रचार करना शुरू कर दिया था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में अग्रसर है जो कि विश्व शांति के लिए विशेषकर मध्य पूर्व एशिया के लिए घातक है। अमेरिका उसके खिलाफ पहले भी सख्त कदम उठाने और युद्ध तक के विकल्प आजमाने की घोषणाएं करता रहा है। टकराव के बाद 2015 में ईरान समेत 6 देशों के साथ परमाणु समझौत हुआ था। यह संधि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने की थी। उसके तहत ही अमेरिका और 5 अन्य देशों द्वारा ईरान को तेल बेचने और उसके केन्द्रीय बैंक को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करने की अनुमति दी गई थी। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अस्थिर प्रवृत्ति के हैं।

वह कब क्या करेंगे इस संबंध में कुछ निश्चित नहीं है लेकिन वह अपनी दादागिरी जरूर दिखा रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से परमाणु संधि तोड़ने की घोषणा कर दी और यह आह्वान किया कि दुनिया के सभी देश ईरान से संबंध तोड़ लें। हालांकि यूरोपीय देशों समेत अन्य देशों का मानना है कि ईरान परमाणु संधि पर टिका हुआ है और अमेरिका ने परमाणु संधि तोड़कर एकतरफा रुख अपनाया है। अमेरिकी प्रतिबंधों का कितना असर ईरान पर पड़ेगा, इसका अनुमान लगाया जा रहा है जबकि ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ईरान पर प्रतिबंधों की नई साजिश में अमेरिका सफल नहीं होगा।

ईरान की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर निर्भर है। ईरान में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है। अमेरिकी प्रतिबंधों का असर यह होगा कि ईरान का तेल निर्यात कम होगा। हालांकि यूरोपीय यूनियन ने ईरान के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों को अपना समर्थन देने की बात कही है। यदि इन कंपनियों ने ईरान के साथ व्यापार जारी रखा तो अमेरिका के साथ उनके व्यापार पर भी असर पड़ेगा। अमेरिकी दादागिरी का असर इतना है कि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने ईरान के साथ अपने व्यापार से हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं। यद्यपि अमेरिका ने सहयोगी ईटली, जापान, भारत और दक्षिण अफ्रीका समेत 8 देशों को ईरान से तेल आयात की मंजूरी कुछ समय के लिए दी है। अमेरिका ने ईरान के बैं​किंग सैक्टर पर भी प्रतिबंध लगाए हैं। बहुमूल्य धातु सोना और मोटर-वाहन क्षेत्र समेत कई उद्योगों को प्रतिबंधों के दायरे में लाया गया था। अमेरिका का इरादा उसके तेल व्यापार को पूरी तरह खत्म करने का है।

दूसरी तरफ ट्रंप ने यह भी कहा है कि वह ईरान के साथ नया समझौता करना चाहते हैं। स्थिति टकराव की बन चुकी है, आशंका तो इस बात की है कि कहीं अमेरिका ईरान को इराक न बना डाले। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान के तेल निर्यात को खत्म कर पाएगा? लेकिन यह संभव नहीं हो सकेगा क्योंकि इससे तेल की कीमतों में बहुत बढ़ौतरी हो जाएगी। चीन निश्चित रूप से उन देशों के पाले में खड़ा होगा जिन्हें ईरान से तेल खरीदने की छूट मिली है। यह भी संभव है कि ईरान रूस और चीन के साथ नए संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़े। ईरान पहले भी प्रतिबंधों को झेल चुका है, वह तेल बेचने के नए रास्ते ईजाद करेगा। ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों का असर भारत को भी प्रभावित करेगा। भारत-ईरान संबंध बहुत पुराने हैं। सम्राट अशोक का शासन भारत से लेकर ईरान तक रहा। प्राचीनकाल में पारस देश आर्यों की एक शाखा का निवास स्थान था। वैदिक युग में तो पारस से लेकर गंगा, सरयू के किनारे तक की सारी भूमि आर्य भूमि थी। ऐतिहासिक युगों में स्थल मार्ग से ईरान के शासक वर्ग एवं आम लोग भारत के पश्चिमोत्तर भागों में आए। भारत-ईरानी आर्यों के संबंध काफी मधुर रहे। भारत-ईरानी आर्यों के मूल स्थान, धर्म समाज, सांस्कृतिक क्रियाकलाप बहुत ही मिलते-जुलते हैं। वर्तमान ईरान का स्वरूप तो इस्लामी क्रांति के बाद ही बदला है।

भारत ने ईरान में काफी निवेश कर रखा है। ईरान इसे इसकी एवज में राहत भी देता है। भारत ईरान को पेमैंट की एक ऐसी व्यवस्था पर काम कर रहा है जिससे उसे दोहरा फायदा होगा। इस व्यवस्था में भारत ईरान को रुपए में पेमैंट करेगा जिसका इस्तेमाल ईरान भारत से होने वाले आयात के लिए कर सकेगा। ईरान से कच्चे तेल को भारत लाने की कीमत दूसरे देशों से कम है। भारत ने लाखों अमेरिकी डालर ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश किये हुए हैं। चाबहार बंदरगाह के जरिये भारत ने अपना माल अफगानिस्तान और कुछ अन्य देशों को भेजना है। अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थिति में भारत को सतर्क होकर चलना होगा। अमेरिका की घरेलू राजनीति और मध्यावधि चुनावों के बीच लोगों का ध्यान बंटाने के लिए ट्रंप ने यह चाल चली है। भारत के लिए अपने हितों की रक्षा करना सर्वोपरि है।

अमेरिका कौन होता है हम पर पाबंदियां या शर्तें थोपने वाला। जिस तरह अमेरिकी अपने हितों को सबसे ऊपर रखते हैं भारत को भी उसी तरीके से सोचना होगा। अमेरिका भले ही आज की तारीख में भारत का मित्र है लेकिन उसकी कार्रवाई से ईरान में भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं। ईरान से दोस्ती के चलते मध्य पूर्व के शक्ति संतुलन में भारत की भागीदारी भी बनी है लेकिन अमेरिका का साथ देने से भारत की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। भारत को जबरदस्त कूटनीतिक, रणनीतिक परिपक्वता का परिचय देना होगा।