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अमेरिका : ट्रम्प की टायं-टायं

भारत के महान दार्शनिक और राजनीतिक विचारक आचार्य चाणक्य ने दो हजार साल पहले लिखा, ‘‘जिस देश का राजा ‘व्यापारी’ होता है उस देश के लोगों का भविष्य अंधकारमय होने से नहीं रोका जा सकता।’’ आचार्य चाणक्य की यह उक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ पर सटीक बैठती है जिन्होंने अपनी हरकतों से दुनिया के इस सबसे प्राचीन लोकतन्त्र को दागी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है परन्तु इसके समानान्तर यह भी हकीकत है कि इसी देश के लोग अपने लोकतन्त्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और अपने संविधान के प्रति इस प्रकार निष्ठा रखते हैं कि राष्ट्रपति का आदेश भी उन्हें इस मार्ग से डिगा नहीं सकता। डोनाल्ड ट्रम्प विगत वर्ष नवम्बर माह में हुए चुनावों में पराजित हो जाने के बावजूद पद से हटने की वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं और अमेरिका के प्रशासनिक तन्त्र के प्रमुख पदों पर बैठे लोगों को अपने रुआब में लेकर परिणामों को बदलवाने की साजिश रचने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह सब उनके निजी तौर पर ‘पक्का व्यापारी’ होने की वजह से ही हो रहा है क्योंकि उनके भीतर छिपा बैठा व्यापारी लगातार उन्हें कोई घाटे का सौदा स्वीकार न करने की प्रेरणा दे रहा है। यही वजह है कि ट्रम्प के समर्थकों ने इस देश के लोकतान्त्रिक संस्थानों में घुस कर ही हिंसा और भारी तोड़फोड़ की और संसद भवन में घुस कर संवैधानिक सत्ता को उखाड़ फैंकने जैसी कार्रवाई की। अंततः ट्रंप को वाइट हाउस छोड़ने के लिए विवश होना ही पड़ा

 ट्रम्प ने इन उपद्रवियों के लिए प्यार जताया जिसका मतलब यही निकलता है कि आगामी 20 जनवरी को नवनिर्वाचित राष्ट्रपति श्री जो बाइडेन के कुर्सी पर बैठने से पहले वह अपने देश में अराजकता फैला देना चाहते हैं। अमेरिका के पिछले दो सौ साल के इतिहास में एेसी घटना कभी नहीं हुई। अतः साफ है कि ट्रम्प अमेरिका का चेहरा कलुषता से भर देना चाहते हैं। पूरी दुनिया इस घटना को हतप्रभ होकर देख रही है और निन्दा कर रही है परन्तु उन्हीं के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने यह कह कर उनकी सारी साजिश को चकनाचूर कर दिया कि उनके पास जनता द्वारा दिये गये फैसले को पलटने का कोई अधिकार नहीं है। ट्रम्प ने उनसे कहा था कि छह जनवरी को जब अमेरिकी संसद के संयुक्त अधिवेशन में अमेरिका के विभिन्न राज्यों द्वारा चुनावों में दिये गये ‘चुनावी मतों’ की गणना हो तो वे उन्हें सम्बन्धित राज्यों के पास तस्दीक करने के लिए वापस भेज दें। श्री पेंस ने अपने ही राष्ट्रपति का यह आदेश मानने से इन्कार कर दिया और घोषणा की कि वह अपने देश के ‘सुप्रीम कमांडर’ के आदेश की जगह ‘संविधान’ के निर्देश को मानेंगे क्योंकि संविधान के अनुसार वह एेसा नहीं कर सकते हैं।

श्री पेंस का यह उदाहरण दुनिया के सभी लोकतान्त्रिक देशों के लिए अनुकरणीय ही नहीं बल्कि आंखें खोल देने वाला भी है और बताता है कि लोकतान्त्रिक पद्धति का सहारा लेकर सत्ता पर काबिज होने वाले ‘हिटलरी’ मानसिकता के लोग अपने देश के उसी संविधान को ताक पर रखकर सत्ता में बने रहने का जुगाड़ लगाते हैं जिसके तहत वे सत्ता पर पहुंचने में कामयाब होते हैं। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में अपने समर्थकों की रैली आयोजित करके ट्रम्प ने यही सिद्ध किया कि वह चुनावों में जनता द्वारा दिये गये निर्णय का अपमान करके संविधान के खिलाफ विद्रोह करना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने इस रैली में साफ कहा कि यदि उप राष्ट्रपति माइक पेंस ‘सही’ फैसला ले लें तो वह चुनाव जीत सकते हैं। यह उन्होंने तब कहा जब संसद के संयुक्त अधिवेशन के शुरू होने में मात्र एक घंटा ही शेष था और  अमेरिकी संविधान के अनुसार इसकी सदारत श्री पेंस को ही करनी थी जिसमें सभी राज्यों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को मिले वोटों (इलैक्ट्रोरल वोट) पर इसकी मुहर लगनी थी। इससे कुछ दिन पूर्व ही ट्रम्प ने जार्जिया राज्य के गवर्नर को फोन करके कहा था कि वह चुनाव परिणामों में हेरफेर करने की कोई जुगत लगाये। इसी से साबित होता है कि ट्रम्प अपने देश की चुनाव प्रणाली को किस तरह घुमाना चाहते थे और अपने ही प्रशासन के जिम्मेदार लोगों को भ्रष्ट बनाना चाहते थे। अमेरिका में हर राज्य की अपनी पृथक चुनाव प्रणाली होती है जिसके तहत विभिन्न चुनाव होते हैं। यह राज्य रिपब्लिकन पार्टी का गढ़ माना जाता है मगर इस राज्य में भी ट्रम्प को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई और सीनेट के सदस्यों के चुनाव में भी इसके प्रत्याशी विजयी रहे जिससे 100 सदस्यीय इस सभा में निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी के अब 50 सदस्य हो गये हैं। इस सदन के सभापति उपराष्ट्रपति होते हैं जिन्हें बराबरी की स्थिति बन जाने पर अपना वोट देने का अधिकार भी होता है जिससे श्री बाइडेन की पार्टी को बहुमत मिल जाता है। सीनेट का कार्यकाल छह वर्ष का होता है मगर इसके एक तिहाई सदस्यों का चुनाव हर दो वर्ष बाद होता रहता है और यह सदन भी भारत की राज्यसभा की तरह सतत् बना रहता है। इसी वजह से अमेरिका को ‘चुनावी देश’ भी कहा जाता है जहां हर वर्ष कोई न कोई  (स्थानीय निकायों से लेकर राज्य स्तरीय आदि के) चुनाव होते रहते हैं मगर भारत की तरह इस देश में सीनेट के चुनाव परोक्ष तरीके से नहीं होते बल्कि सीधे जनता द्वारा किये जाते हैं। 

सीनेट नीति नियामक संस्था है जो किसी भी राष्ट्रपति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। 1932 के बाद यह पहला मौका आया है जब चुने हुए राष्ट्रपति का सीनेट में भी बहुमत होगा। अतः ट्रम्प बुरी तरह बौखला गये हैं जिसकी वजह से ऊल-जुलूल हरकतें और बद जुबानी कर रहे हैं मगर अमेरिका की लोकतान्त्रिक ताकत का असली इजहार जनता द्वारा गद्दी से हटाये गये ट्रम्प की बदहवासी में ही नहीं होता है बल्कि निवर्तमान उपराष्ट्रपति माइक पेंस की दृढ़ इच्छा शक्ति में होता है जो संविधान के प्रति ‘निर्मल’ धारा की तरह बहती है। उन्होंने ट्रम्प की दुष्प्रवृत्ति का खुलासा जिस तरह किया उसे पढि़ये जिसे उन्होंने संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करने से कुछ मिनट पूर्व ही मीडिया को जारी किया ‘‘यह मेरा सुविचारित निर्णय  है कि मेरे द्वारा  संविधान की रक्षा और उसका संरक्षण करने  की ली गई शपथ मुझे यह इकतरफा फैसला करने से रोकती है कि कौन से इलैक्ट्रोरल वोट गिने जाएं और कौन से नहीं’’ जबकि ट्रम्प ने उन्हें आदेश दिया था कि वह इलैक्ट्रोरल वोटों की संसद द्वारा की जाने वाली तस्दीक में रोड़ा लगा दें और सम्बन्धित राज्यों को उन्हें पुनः तस्दीक के ​िलए भेज दें। अतः यह है अमेरिका के लोकतन्त्र की असली ताकत और रुतबा और यही ट्रम्प की सबसे बड़ी शिकस्त है। अतः संसद के संयुक्त अधिवेशन के दौरान हुई हिंसा के बाद इसका अधिवेशन पुनः बुलाया गया और ट्रम्प की टायं-टायं को कालिमा से भरने वाला कृत्य कहा गया।