आधी रात को ‘अराजक-राज’


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देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल के घर पर आधी रात को मुख्य सचिव को बुलाकर जिस तरह बेइज्जत किया गया है उसने सिद्ध कर दिया है कि दिल्ली पर एेसे लोगों की हुकूमत है जिनकी निगाहों में संविधान और इससे उत्पादित लोकतन्त्र की विभिन्न शक्तियों और अधिकारों का अर्थ सत्ता की रंगदारी का रौब जमाने के अलावा कुछ नहीं है। दरअसल आम आदमी पार्टी ने सिद्ध कर दिया है कि वह कोई सियासी पार्टी न हाेकर धींगामुश्ती करने वाले लोगों का जमावड़ा है। अपनी इसी मुहीम के तहत इसने दिल्ली के उन बाइज्जत अफसरों को भी नहीं बख्शा जो संविधान की कसम लेकर अपने काम को अंजाम देते हैं और हुकूमत में काबिज किसी भी राजनैतिक दल की हुक्मरानी के फरमानों को कानून और संविधान की तराजू पर तौल कर उस पर अमल करते हैं मगर क्या कयामत बरपा हुई कि आधी रात को दिल्ली के सबसे बड़े शहरी हुक्मरान मुख्य सचिव को मुख्यमन्त्री ने अपने घर पर ही बुला कर ‘कानून’ की धज्जियां इस तरह उड़ाईं कि खुद ‘कानून’ ही पूछने लगा कि वह किस दरवाजे पर जाकर अपना माथा फोड़े और पूछे कि इस मुल्क में उसकी जगह क्या है? यह पहला मौका नहीं है जब तीन साल पहले दिल्ली की 70 में से 67 विधानसभा सीटें जीतने वाली अरविन्द केजरीवाल एंड पार्टी के कारिन्दों ने दिल्ली में कानून के राज को धत्ता बताया हो, मगर यकीनन यह पहला मौका है जब किसी मुख्य सचिव को किसी मुख्यमन्त्री के घर बुलाकर उसे जबरन अपना हुक्म मानने के लिए मजबूर किया गया हो और उसके न मानने पर उसके साथ हाथापाई तक की गई हो।

जाहिर है कि दिल्ली में संविधान का राज जैसी कोई चीज नहीं रह गई है और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संवैधानिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। अतः किसी भी सूरत में मौजूदा सरकार के सत्ता में बने रहने का कोई कारण नहीं है। जब मुख्यमन्त्री के घर के भीतर ही दिल्ली में कानून का राज काबिज करने की कसम से बन्धे मुख्य सचिव को ही संविधान का शासन लागू करने की कसम से बन्धे मुख्यमन्त्री द्वारा कानून तोड़ कर बेइज्जत किया जाता है तो एेसी सरकार की कोई इज्जत आम जनता के बीच में नहीं रह सकती। एेसी सरकार सिर्फ अराजकतावादियों के जमघट के अलावा और कुछ नहीं कहलाई जा सकती क्योेेंकि यह कानून पर चलने की अपनी राह छोड़ चुकी है। लोगों ने जिन्हें अपना रहबर चुन कर विधानसभा में भेजा था अगर वे ही इस तरह करने लगे तो फिर दिल्ली वालों के पास भी इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रहता है कि वे खुद उठकर हिन्दोस्तान के सरपरस्त राष्ट्रपति से मांग करें कि एेसी सरकार को जहन्नुम का रास्ता दिखाया जाए और दिल्ली में फिर से चुनाव कराकर नई सरकार बनाई जाए। शायद इसी वक्त की इंतजार में आम आदमी पार्टी के लोग हैं क्योंकि इनकी फितरत अपनी हर नाकामी को दूसरी पार्टियों के गले मढ़ने की रही है मगर कुछ वाकये एेसे हो जाते हैं जिनसे वह राज फाश हो जाता है जिसे ढाल बना कर सियासत में लोगों की हमदर्दी बटोरने की चालें चली जाती हैं। आम आदमी पार्टी के एहलकार हर मोड़ पर दिल्ली वालों की आंखों में धूल झोंक कर खुद को ‘कमसिन’ दिखाने की फनकारी में आगे रहे हैं मगर हालात ने आज इनको सीधा गुनहगार बता दिया है और एेलान कर दिया है कि ये लोग खुद ही चोर-चोर का शोर मचा कर माल लेकर चम्पत होते रहे हैं। इनका एक ही सिद्धान्त है कि जब गुनाह करते पकड़े जाओ तो उल्टे कोतवाल को डांटने लगो।

क्या सितम हुआ कि जिस पार्टी के 20 विधायकों को दोहरे लाभ के पद पर रहने की वजह से विधानसभा की सदस्यता से चुनाव आयोग ने मुअत्तिल कर दिया हो, वह पार्टी शिकायत कर रही है कि चुनाव आयोग ने उनकी पूरी बात ही नहीं सुनी? जिस पार्टी के एक दर्जन के लगभग विधायक विभिन्न कानून तोड़ने की वजह से जेल की हवा खा चुके हों, उसी पार्टी के मुख्यमन्त्री और उपमुख्यमन्त्री समेत कई अन्य विधायकों की मौजूदगी में आधी रात को मुख्य सचिव को भी कानून तोड़ कर अपनी सियासत के अंदाज का नजराना दिया जाता है? भारत के संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका तीनों के अधिकार इस तरह मुकर्रर किये हैं कि इनमें से कोई भी एक-दूसरे के आमने-सामने आकर टकरा न सके मगर आम आदमी पार्टी की फितरत एेसे सभी दायरों से इस तरह टकराने की है जिससे यह लगे कि उनके साथ जबर्दस्ती की जा रही है। हकीकत में ये लोग ‘व्यवस्था’ में ‘अव्यवस्था’ पैदा करके अपनी जगह तलाशना चाहते हैं। यह बिना शक एेसी नासमझी है जिसे समझना इस पार्टी के नौसिखिय राजनीतिज्ञ बने लोगों के बस की बात नहीं है। ये भूल जाते हैं कि समुद्र में जब ज्वार-भाटा आता है तो लहरें उछाल जरूर मारती हैं मगर बाद में वे समुद्र में ही समाहित होकर उसके नियमों से बन्ध जाती हैं। यही वजह है कि केजरीवाल ने मुख्यमन्त्री होने के बावजूद कहा था कि 26 जनवरी जैसा गणतन्त्र दिवस उत्सव केवल कुछ लोगों का मन बहलाने के लिए होता है।

एेसा केवल अन्धड़ में लहरों को दबोच कर राजनीति करने वाले लोग ही कह सकते थे और सोच सकते थे कि लहरें हमेशा उनके आगोश में ही बन्धी रहेंगी लेकिन हिमाकत तो देखिये इन एक वक्त के खुदाई खिदमतगार बने लोगों की कि ये मुख्य सचिव पर ही आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने कुछ विधायकों के लिए जातिमूलक शब्दों का प्रयोग किया। उस पर तुर्रा यह मार रहे हैं कि आधी रात को तो उन्होंने राशन की दुकानों पर हो रही गड़बडि़यों का हल ढूंढने के लिए बैठक बुलाई थी। जी चाहता है कि केजरीवाल का सदका उतार लूं कि कितनी फ़िक्र है हुजूर को गरीबों के राशन की ! क्या गम है उस हुक्काम को गरीबों की रोटी का जिसने लाखों रुपए चाय-समोसे पर ही खर्च किये हों और अपनी सरकार की पार्टी में हजारों रुपए की भोजन थाली का खर्चा ढोया हो जबकि हकीकत यह है कि मुख्य सचिव से सरकार के विज्ञापन के लिए धन के विशेष आवंटन की मांग की जा रही थी जिसे उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के खिलाफ बता कर मानने से इन्कार कर दिया मगर क्या बहना ढूंढा गया रोटी का कि रोटी भी समोसे की बलैयां लेने लगे !
नहीं मालूम किस-किसका लहू पानी हुआ होगा
कयामत है सरिस्का आलूदा होना तेरी मिशगां का