सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठतम न्यायाधीशों के निर्णायक समूह (कोलिजियम) ने उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ की पदोन्नति की सिफारिश पुनः सरकार से करने का फैसला किया है। उनकी नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर की जानी है। जिस समूह ने सर्वसम्मति से पुनः यह सिफारिश की है उसके मुखिया मुख्य न्यायाधीश हैं। हालांकि कोलिजियम ने पहले ही श्री जोसेफ के नाम की सिफारिश दूसरी न्यायाधीश पद पर आसीन हुई सुश्री इंदु मल्होत्रा के नाम के साथ सर्वसम्मति से की थी परन्तु सरकार ने श्री जोसेफ के नाम को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। बाद में उनके नियुक्त न करने के जो कारण बताये गये वो विपक्षियों के गले नहीं उतर पाए। इनमें एक वजह बताई जा रही थी कि श्री जोसेफ सर्वोच्च न्यायालय में केरल से तीसरे न्यायाधीश होंगे और अखिल भारतीय स्तर पर वरीयता सूची में उनका 42वां स्थान आता है। एक प्रकार से यह देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की कोशिश थी और उनकी विद्वत्ता व निष्पक्षता को भी चुनौती थी।

विद्वान न्यायाधीशों ने सभी पक्षों और विषयों पर गहरा विचार करने के बाद ही श्री जोसेफ के नाम पर स्वीकृति की मुहर लगाई थी और सर्वसम्मति से मुहर लगाई थी। इसके बावजूद कानून मन्त्रालय ने केवल सुश्री इन्दु मल्होत्रा के नाम को ही राष्ट्रपति के पास नियुक्ति के वारंट के लिए भेजा। श्री जोसेफ की नियुक्ति रोककर सरकार और इसकी सूत्रधार पार्टी भाजपा के प्रवक्ताओं की तरफ से जो दलीलें पेश की गईं उनमें भी कुछ लोगों को राजनीति की गन्ध आ रही थी क्योंकि श्री जोसेफ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रहते हुए 2016 में इस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के केन्द्र सरकार के फैसले को अवैध घोषित कर दिया था और बर्खास्त मुख्यमन्त्री कांग्रेस नेता श्री हरीश रावत को बहाल किया था। यह वह दौर था जब कांग्रेस पार्टी के ही मुख्यमन्त्री रहे श्री विजय बहुगुणा ने अपनी पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। राज्य विधानसभा के भीतर से लेकर बाहर तक एेसा राजनीतिक कारोबार चला था कि विधायकों की बोलियां लगने की खबरें भी आयी थीं। एेसे संक्रमणकाल की घटनाओं को संविधान के तराजू पर तोलते हुए श्री जोसेफ ने राष्ट्रपति शासन लगाने को असंवैधानिक करार दिया था। अतः उनका फैसला संविधान की ‘रूह’ की कलम से लिखा गया था।

कोलेजियम द्वारा उनके नाम पर पुनः अपनी स्वीकृति की मुहर लगाना यह सिद्ध करता है कि उनका चुनाव सभी प्रकार के सन्देहों से परे हैं। आगामी 16 मई को कोलिजियम की बैठक पुनः होगी जिसमें न्यायालय के खाली न्यायाधीश पदों पर अन्य विद्वान न्यायविदों की नियुक्ति पर विचार किया जायेगा। इस फैसले के बाद कानून मन्त्रालय के पास और कोई विकल्प नहीं बचता है और उसे श्री जोसेफ की नियुक्ति के लिए उनका नाम राष्ट्रपति को भेजना ही पड़ेगा। क्योंकि सरकार केवल एक बार ही कोलिजियम से पुनर्विचार की दरख्वास्त कर सकती है मगर सरकार के पास यह अधिकार जरूर है कि वह जब तक चाहे कोलेजियम की सिफारिश पर ‘चौकड़ी’ मारकर बैठ सकती है। इसके लिए कोई समय सीमा नहीं है परन्तु उस स्थिति में सरकार पर और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के खाली पदों से अधूरा रखकर वह न्यायपालिका के कार्य में अवरोध पैदा करने का कारण बनेगी। फिलहाल देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में सैकड़ों पद खाली पड़े हुए हैं जिन्हें कई वर्षों से भरा नहीं जा रहा है। दूसरी तरफ न्यायालयों में लम्बित मामलों की कतार बढ़ती जा रही है। यह न्यायपालिका को अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप काम करने से रोकता है। इसका विपरीत असर न्यायालयों से न्याय पाने वाले आम नागरिकों पर पड़े बिना नहीं रह सकता, सवाल पैदा होता है कि आखिर क्यों वर्षों से न्यायाधीशों के पद उच्च न्यायालयों में खाली पड़े हुए हैं ? सरकार किस बात का इन्तजार कर रही है जबकि नियुक्ति की पूरी प्रणाली स्थापित है।

उच्च न्यायपालिका के प्रति इस देश के लोगों में जो सम्मान है उससे लोकतन्त्र में उसकी निष्ठा और पुख्ता ही होती है क्योंकि समय-समय पर न्यायपालिका ही राजनीति के चोले में छिपे हुए बहुरूपियों की पकड़ करती है और उनके अवैध व काले कारनामों को उजागर भी करती है। अतः इसके कामकाज को सुचारू चलने देने की जिम्मेदारी भी किसी भी सरकार पर स्वाभाविक तौर पर होती है। इसलिए सरकार अगर इस संवैधानिक नुक्ते का प्रयोग करते हुए श्री जोसेफ की नियुक्ति पर आंखें मूंद कर बैठने का प्रयास करेगी कि वह तब ही कोलिजियम की अन्तिम सिफारिश पर अमल करेगी जब उसकी मर्जी होगी तो यह न्यायपालिका को परोक्ष रूप से प्रभावित करने के प्रयास के रूप में ही देखा जायेगा। देशवासी वह नजारा भूले नहीं हैं जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री ठाकुर की आंखों में खाली पड़े पदों को भरने को लेकर आंसू तक आ गये थे।

स्वतन्त्र न्यायपालिका भारत के संविधान की प्राण वायु है क्योंकि यह राजनैतिक धींगामुश्ती और निरंकुशता पर इस तरह लगाम लगाती है कि किसी भी राजनैतिक दल की सत्ता पर काबिज सरकार उन मूलभूत मानकों से बाहर जाने की सोच भी न सके जो संविधान में किसी भी नागरिक को दिये गये हैं। तभी तो भारत में कोई भी सरकार नागरिकों की और नागरिकों द्वारा और नागरिकों के लिये होती है। हमारे लोकतन्त्र का यही तो मूल मन्त्र है जो कक्षा चार से ही अंग्रेजी स्कूल के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है। हम अजीम मुल्क इसलिए हैं कि हमारा पूरा निजाम सिर्फ कानून से चलता है, हमारे यहां चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो मगर राज कानून का ही होता है और यह कानून एेसा है जो न तो किसी मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री या आम नागरिक में भेद करता है और न ही किसी को हुकूमत के गरूर में मनमाफिक फरमान जारी करने की इजाजत देता है। जो भी होगा वह कानून के दायरे में उस पर तसदीक के साथ ही होगा। एेसा ही भारत तो भीमराव अम्बेडकर ने आजाद हिन्दोस्तानियों को देते हुए कहा था कि हर हिन्दोस्तानी की गैरत और अजमत का रखवाला संविधान होगा।