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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति?

बाबा साहेब अम्बेडकर ने भारत को जो संविधान दिया उसमें भारत के लोकतन्त्र की जमीन तैयार करने का कार्य चुनाव आयोग को इस तरह सौंपा गया था कि देश की राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह निरपेक्ष रहते हुए आयोग अपने अधिकार व शक्तियां सीधे संविधान से ले सकें। चुनाव आयोग भारत में लोकतन्त्र की स्थापना इस प्रकार करे कि सत्ता में शामिल होने वाली प्रत्येक राजनीतिक पार्टी की नकेल इसके हाथ में रहे जिससे वह केवल संवैधानिक रास्तों के माध्यम से ही चुनावों के जरिये देश की जनता का बहुमत प्राप्त करके सरकार के गठन की प्रक्रिया को पूरा कर सके। चुनाव आयोग को यह अधिकार भी दिया गया कि वह किसी भी चुनाव की निष्पक्ष व स्वतन्त्र प्रक्रिया को पूरा करने के लिए किसी भी सरकार का मोहताज नहीं होगा और सीधे संविधान से शक्ति लेकर इस दायित्व को निभायेगा। चुनावी समय में वह देश की समूची व्यवस्था का संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति की निगरानी में संरक्षक बनकर प्रत्येक नागरिक को मिले एक वोट के संवैधानिक अधिकार की गारंटी देगा जिसके प्रयोग करने पर आम मतदाता अपनी मनपसंद की लोकतान्त्रिक सरकार का गठन करेगा। डा. अम्बेडकर ने भारत के लोकतन्त्र को जिन चार पायों पर टिका हुआ बताया उनमें विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के अतिरिक्त चुनाव आयोग भी था। लेकिन चुनाव आयोग की भूमिका इन सभी पायों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यही विधायिका का प्रारंम्भिक गठन करता है। चुनावों में किसी भी प्रत्याशी के विजयी होने का प्रमाणपत्र चुनाव आयोग ही देता है। विधायक ही वह पाया है जिसके पास संविधान में संशोधन तक करने का अधिकार होता है। एक मायने में चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं होता बल्कि वह स्वायत्तशासी स्वतन्त्र निकाय होता है। चूंकि भारत की संसद के पास राष्ट्रपति तक के विरुद्ध महाभियोग चलाने का अधिकार है। अतः मुख्य चुनाव आयुक्त भी संसद की परिधि से बाहर नहीं रखे गये हैं। परन्तु पिछले कई दशकों से जैसे राजनीति के स्तर में गिरावट दर्ज हुई है वैसे–वैसे ही मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को लेकर भी विवाद उठता रहा है। 1990 में नियुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त स्व. टी.एन. शेषन ने पहली बार स्वतन्त्र भारत में यह दिखाने की कोशिश की थी कि चुनाव आयोग के पास संविधान प्रदत्त कितनी शक्तियां हैं। उसके बाद नरसिम्हाराव सरकार ने घबरा कर चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त समेत तीन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति शुरू कर दी क्योंकि मूल संविधान में तीन आयुक्तों की नियुक्ति की स्वीकृति प्रदान की गई थी। मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ अपने समक्ष प्रस्तुत एक याचिका पर विचार कर रही है और उसका मत है कि  इस पद की शुचिता व दायित्व को देखते हुए एेसे चयन मंडल का गठन किया जाना चाहिए जिसमें राजनीतिक पक्षपात को दरकिनार करते हुए निष्पक्ष व पारदर्शी प्रणाली की शुरूआत हो। पांच न्यायमूर्तियों वाली इस संविधान पीठ का मत है कि नियुक्ति मंडल मे भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जा सकता है जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त समेत अन्य दो आयुक्तों की सदाकत के बारे में शक की संभावनाओं को समाप्त किया जा सके। फिलहाल जो नियुक्ति प्रणाली है उसके तहत केन्द्रीय मन्त्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति ही मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते हैं। सरकार प्रायः वरिष्ठ नौकरशाह या अधिकारी को अपनी समझ व विवेक के अनुसार राष्ट्रपति से विशिष्ट अफसर की नियुक्ति की सिफारिश करती हैं। मगर सरकारें राजनीतिक दलों की होती हैं। अतः उनके चुनाव में न चाह कर भी राजनीतिक आग्रहों का समावेश हो सकता है। इससे चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता व निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है जिसकी अपेक्षा चुनाव आयोग के संस्थान से भारतीय संविधान में की गई है। यह पूरी तरह सरकार पर निर्भर करता है कि वह किस अधिकारी का चयन इस पद के लिए करती है। संविधान में यह उल्लिखित नहीं है कि चुनाव आयुक्त के पद पर केवल नौकरशाह ही बैठेगा। परन्तु यह परंपरा 1950 में नियुक्त पहले मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुकुमार सेन की अद्वितीय योग्यता और न्याय क्षमता की वजह से पं. नेहरू ने शुरू की थी। स्व. सेन एक आईसीएस अधिकारी जरूर थे मगर वह कुछ समय के लिए जज भी रहे थे। देश के प्रथम पद्म विभूषण पाने वाले भी वही थे और केन्द्र में कानून मन्त्री रहे स्वतन्त्रता सेनानी अशोक कुमार सेन के भाई भी थे।  परन्तु लगातार राजनीतिक स्तर मे गिरावट आने की वजह से पिछले दो दशक से मुख्य चुनाव आयुक्त का पद विवादास्पद होता चला गया और कई बार पक्षपात के गंभीर आरोपों में भी घिरा। इसी वजह से 2012 में कांग्रेस सुशासन के दौरान पूर्व उपप्रधानमन्त्री व विपक्षी पार्टी भाजपा के नेता श्री लालकृष्ण अडवानी ने सुझाव दिया था कि चुनाव आयुक्त व लेखा महानियन्त्रक की नियुक्ति के लिए राजनीतिक द्विपक्षीय आधार पर एक चयन मंडल का गठन किया जाना चाहिए जिसमें प्रधानमन्त्री, मुख्य न्यायाधीश, कानून मन्त्री, लोकसभा व राज्यसभा में विपक्ष के नेता (गण) शामिल हों। उनका समर्थन तब तमिलनाडु के वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ श्री एम. करुणानिधि ने भी किया था जिनकी पार्टी द्रमुक तत्कालीन कांग्रेसनीत मनमोहन सरकार में भी शामिल थी। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ भी कमोबेश श्री अडवानी के सुझाव का अनुमोदन करती लगती है। अतः यह विषय राजनीति से ऊपर उठकर विचार करने योग्य है और लोकतन्त्र को मजबूत करने के लिए है। क्योंकि श्री अडवानी सरकार के महत्वपूर्ण पद पर भी रहे थे औऱ विपक्ष के नेता भी रहे थे। उनका विचार पूरी तरह निष्पक्ष व राष्ट्रहित में था।