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बदले की आग में झुलसते अरब देश

संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबुधाबी पर हुए ड्रोन हमले में दो भारतीयों और एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत दोनों देशों के लिए काफी दुखद है। यह भारत के​ लिए चिंता की बात है क्योंकि लाखों भारतीय अरब देशों में काम करते हैं। यह हमले अबुधाबी के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निकट तेल डिपो के पास किए गए। इस हमले की जिम्मेदारी यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लिए जाने के बाद से ही सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लड़ाकू विमानों ने यमन की राजधानी सना में हूती के अड्डों पर बम बरसा दिए। बदले की आग में अरब जगत झुलस उठा है। तीन वर्ष पहले भी हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दो तेल संयंत्रों पर हमला किया था जिससे पूरी दुनिया के तेल बाजार पर असर पड़ा था। हूती विद्रोह के चलते अब तक 70 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। शिया इस्लाम को मानने वाले हूती विद्रोहियों का उत्तरी यमन के ज्यादातर हिस्सों पर कब्जा है। हूती विद्रोही सुन्नी इस्लाम की विचारधारा का विरोध करते हैं। 2015 में यमन की राजधानी सना पर हूती विद्रोहियों के कब्जे के बाद राष्ट्रपति मंसूर हादी को देश छोड़कर भागना पड़ा था, तब से ही सऊदी अरब हादी का समर्थन करता नजर आ रहा है। यमन की सेना का एक धड़ा भी विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है। हूती विद्रोहियों का समर्थन ईरान भी कर रहा है। ईरान और हूती विद्रोही दोनों शिया इस्लाम को मानते हैं। सऊदी अरब ईरान पर आरोप लगाता है कि वो हथियार और पैसे देकर इनकी मदद करता है।

ईरान इन विद्रोहियों की मदद कर यमन में शिया सरकार स्थापित करना चाहता है, जबकि सुन्नी विचारधारा को मानने वाला सऊदी इन्हें रोकने में लगा है। क्या यह लड़ाई शिया बनाम सुन्नी की है या इसके पीछे और भी कारण हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि ईरान और सऊदी अरब दोनों ही इस्लामी दुनिया के मुखिया बनना चाहते हैं।

एक दौर में यमन एक शांतिप्रिय देश माना जाता था। यमन कभी पर्यटकों के लिए  आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यमन में ऐसा भी हो सकता है। जिस तरह जंग का सीरिया शिकार हुआ, वैसे ही यमन भी जंग का शिकार हुआ। आज यमन दुनिया का सबसे खतरनाक देश बन चुका है। आज यमन मौत के कुएं के रूप में कुख्यात है। दरअसल यमन के गृहयुद्ध ने उसकी बर्बादी की कथा लिख दी। यमन एक पेचीदे युद्ध का​ शिकार हुआ। इस जंग की शुरूआत राष्ट्रपति की कुर्सी के लिए  हुई थी। एक राजनीतिक सौदे के तहत यमन के राष्ट्रपति अली अब्बदुलाह सालेह को अपनी गद्दी नए राष्ट्रपति हादी को सौंपनी थी। लोगों को उम्मीद थी कि यह बदलाव यमन में राजनीतिक स्थिरता एवं शांति लाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सलेह ने मौके पर गद्दी छोड़ने से इंकार कर दिया। हालांकि बाद में उन्हें भी अन्तर्राष्ट्रीय दबाव में अपना इस्तीफा देना पड़ा था। इस उठा-पटक में ज्यादातर लोगों को हादी के ​खिलाफ कर दिया था। हादी ने जैसे ही गद्दी सम्भाली उनके सामने कई चुनौतियों ने उभार लेना शुरू कर दिया था। सलेह के समर्थकों ने हादी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था तो दूसरी तरफ आतंकवादी संगठन अलकायदा ने भी हादी के​ खिलाफ हमला करना शुरू कर दिया था। हश्र यह हुआ कि एक तरफ हादी की सेना और दूसरी तरफ अलकायदा के आतंकी और सलेह के समर्थक आमने-सामने आ गए। फिर यह लड़ाई गृह युद्ध में तब्दील हो गई। हर कोई यमन में अपना-अपना राज बनाने के लिए मैदान में उतर गया। इस गृह युद्ध के दौरान शिया और सुन्नी के बीच भी जंग भड़क उठी। यमन पूरी तरह से गृह युद्ध से जर्जर हो गया। यमन की जंग का सबसे ज्यादा असर वहां की जनता और बच्चों पर पड़ा। कहते हैं कि हर आठ में से एक परिवार जो यमन में रहता है उसने अपना एक बच्चा जंग में खोया। यमन अब बाहरी ताकतों का अखाड़ा बन चुका है। यमन में गृह युद्ध के चलते हथियारों की मांग बढ़ गई है। जिस तरह शहरों में सब्जी मंडी होती है उसी तरह यहां बंदूक की मंडियां हैं। छोटी-बड़ी पिस्तौल, राइफल, ग्रेनेड, राकेट और न जाने कितने ही तरीके के हथियार यहां खुलेआम मिलते हैं। कभी बड़े तो कभी बच्चे इन दुकानों को चलाते हुए देखे जा सकते हैं। दुकानदारों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खरीदने वाला कौन है। फिर चाहे वो सरकारी आदमी हो, विद्रोही हो या अलकायदा का आतंकी ही क्याें न हो।

जंग में तबाह हुए मध्य पूर्व का देश यमन भुखमरी के कगार पर है। लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। पानी की सप्लाई बंद हो चुकी है और लोग पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। दरअसल हूती विद्रोही दशकों पुराना एक प्रतिरोध वाला आंदोलन है जो सऊदी अरब के बढ़ते धार्मिक प्रभाव के ​​विरोध में पैदा हुआ था। इस आंदोलन की नींव 1990 में हुसैन बदरेद्दीन अल हूती ने की थी। उनकी हत्या 2004 में यमन सैनिकों ने कर दी थी। यमन के अधिकांश हिस्सों पर हूती विद्रोहियों का कब्जा है। यमन की हालत के लिए जिम्मेदार 2011 की क्रांति की ​विफलता ही है। नई पीढ़ी को पता तक नहीं कि लोग आखिर किस लिए लड़ रहे हैं। यमन की तरफ किसी की मदद का हाथ नहीं बढ़ रहा। यमन ने अपने आपको खुद ही खत्म कर लिया है। यमन के आवाम का भविष्य क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। फिलहाल हिंसा की आग में अरब देशों का झुलसना पूरी दुनिया के लिए अच्छा नहीं है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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