जवाहर नवोदय विद्यालय परीक्षाओं में सर्वश्रेष्ठ परिणाम देने के लिए जाना जाता है। इसे 1985-86 में शुरू किया गया था और यह हजारों कमजोर बच्चों को गरीबी से बाहर निकालने का माध्यम बन गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2013 से लेकर 2017 के बीच जवाहर नवोदय विद्यालयों के 49 बच्चों ने आत्महत्या की। आत्महत्या करने वालों में अाधे छात्र दलित आैर आदिवासी हैं। देश में इस समय 635 नवोदय विद्यालय हैं और इन्हें मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था नवोदय समिति द्वारा चलाया जाता है। हैरानी की बात तो यह है कि वर्ष 2018 में 14 बच्चों ने आत्महत्या की। इस हिसाब से हर एक लाख बच्चों पर 5.5 बच्चों ने आत्महत्या की। आखिर बच्चे आत्महत्या क्यों करते हैं? इस सवाल के जवाब में उनकी घरेलू समस्याएं, शारीरिक दण्ड, एकतरफा प्यार की परम्पराएं, शिक्षकों द्वारा अपमान, पढ़ाई का दबाव, डिप्रेशन आैर दोस्तों के बीच लड़ाई जैसे कारण निकलकर आए हैं।

नवोदय विद्यालयों में 75 प्रतिशत सीटें ग्रामीण बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं इसलिए नवोदय विद्यालय को ऐसी जगह नहीं बनाया जाता जहां 100 फीसदी शहरी आबादी हो। इन विद्यालयों में छठी क्लास से दाखिला शुरू होता है और यहां 12वीं तक की पढ़ाई होती है। मेरिट लिस्ट के आधार पर यहां दाखिला होता है। इन विद्यालयों की लोकप्रियता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जितने बच्चे हर वर्ष दाखिले के लिए परीक्षा देते हैं, उनमें से आैसतन 3 प्रतिशत से कम बच्चे ही पास कर पाते हैं। पढ़ने में तेेज गरीब बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय किसी वरदान से कम नहीं है। उन्हें यहां रहने, खाने और अन्य सुविधाएं भी दी जाती हैं।

नवोदय विद्यालयों से हर वर्ष कई टॉपर्स निकलते हैं। गरीब बच्चों को बेहतर भविष्य देने वाले इन स्कूलों के बच्चे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? यह सवाल बार-बार दिमाग में कोंधता है। इस पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है और इसकी पूरी रिपोर्ट मांगी है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने छात्रों के आत्महत्या करने के कारणों की जांच के लिए समिति का गठन कर दिया है। मानवाधिकार आयोग ने मंत्रालय से 6 सप्ताह में जवाब तलब करते हुए पूछा था कि क्या विद्यालय के परिसरों में ऐसे प्रशिक्षित सलाहकार उपलब्ध हैं, जिनसे किशोर छात्र खुलकर बात कर सकें और उनके साथ अपनी भावनाएं साझा कर सकें। सवाल यह भी है कि ग्रामीण प्रतिभाओं को सामने लाने के मकसद से शुरू किए गए यह विद्यालय छात्रों को जान देने पर मजबूर करने की जगह तो नहीं बन गए?

आश्चर्य की बात तो यह है कि पिछले 6 साल से बच्चे आत्महत्याएं कर रहे हैं लेकिन विद्यालयों को संचालित करने वाली समिति ने कोई छानबीन की कोशिश ही नहीं की और न ही कारणों की तलाश की। समिति ने संवेदनहीनता का ही परिचय दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि जवाहर नवोदय विद्यालय गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे हैं। स्कूली शिक्षा का यह प्रयोग काफी हद तक सफल भी रहा है लेकिन इन विद्यालयों को भी दूसरे शिक्षण संस्थानों की तरह वह रोग लग गया है जिसकी वजह से बच्चे अपना भविष्य बनाने की बजाय जान देने के कदम उठा रहे हैं। ऐसे में स्वायत्तशासी निकाय की जिम्मेदारी बनती थी कि ऐसी घटनाओं की जांच करता और कुछ कदम उठाता।

सवाल शिक्षकों का भी है, पहले शिक्षकों का सम्बन्ध बच्चों के अभिभावकों से भी होता था। यह रिश्ता आत्मीयता का था लेकिन आज समय बदल चुका है। अब केवल शिक्षक खुद को पीरियड में लेक्चर देने तक सीमित हो गए हैं। वे बच्चों की समस्याओं और उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास ही नहीं करते। निजी स्कूलों के शिक्षक तो घरों में ट्यूशन सैंटर भी चलाते हैं और धनी परिवारों के बच्चे ट्यूशन पढ़ते भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चों से शिक्षकों को कोई उम्मीद ही नहीं है। ऐसे बच्चों को घर की आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 11वीं और 12वीं कक्षा के छात्र-छात्राएं तो परीक्षा के दिनों में तनाव में रहते हैं।

छात्रों में तनाव घटाने और उनमें सकारात्मक सोच पैदा करने के लिए निरंतर प्रयासों की जरूरत है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के युग में छात्र-छात्राओं को यह अहसास कराने की जरूरत है कि जीवन में चुनौतियों के बावजूद हर असफलता से निराश होने की जरूरत नहीं, इसके लिए पूरा जीवन पड़ा है। हर विफलता सफलता की सीढ़ी होती है। छात्रों की जिज्ञासाओं को शांत करने के प्रयास किए जाने चाहिएं। विद्यालयों में स्ट्रेस मैनेजमेंट कार्यशालाओं का आयोजन किया जाना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अब कहा है कि इन स्कूलों में काउंसलर नियुक्त किए जाएंगे। मंत्रालय को उन कारणों का निवारण करना होगा ताकि बच्चों में जान देने की प्रवृत्ति को खत्म किया जा सके।