भारत और ईरान की दोस्ती कई दशकों पुरानी है। यहां तक कि जब सारे विश्व ने ईरान को अलग-थलग कर दिया था, उस वक्त भी भारत ने एक सच्चे दोस्त की तरह ईरान का साथ दिया। इसके पीछे एक मुख्य कारण यह भी रहा कि भारत को ईरानी तेल की बहुत जरूरत है तो दूसरी तरफ ईरान को भी भारत के साथ की बड़ी जरूरत है। ईरान भी भारत की मदद के लिए हमेशा ही कृतज्ञ रहा है और समय-समय पर भारत को अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए व्यापार के कई रास्ते आसानी से खोल देता है। भारत ने अब सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण ईरान के दक्षिण-पूर्व तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह के संचालन की जिम्मेदारी सम्भाल ली है।

चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत, ईरान और अफगानिस्तान व्यापार और पारगमन गलियारों के मार्गों पर पहले ही सहमति बना चुके हैं। 1947 में देश विभाजन के बाद पूरे मध्य-पूर्व, मध्य एशिया और यूरोप से भौगोलिक तौर पर अलग हुए भारत ने इस दूरी को पाटने की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल कर ली है। यह पहला मौका है जब भारत अपने सीमा क्षेत्र से बाहर किसी बंदरगाह का परिचालन करेगा। इस बंदरगाह के वाणिज्य परिचालन की शुरूआत ब्राजील से 72,458 टन मक्के से लदे एक जहाज के आगमन के साथ हुई। इसके साथ ही भारत ने चाबहार बंदरगाह परियोजना में शामिल होकर एक इतिहास रच डाला।

समुद्री रास्ते से होते हुए भारत ईरान में दाखिल हुआ और इसके जरिये अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक के बाजार भारतीय कम्पनियों और कारोबार के लिए खुल गए। भारत के लिए चाबहार बंदरगाह का मार्ग खुलना पाकिस्तान और चीन के लिए झटका है। कांडला बंदरगाह और चाबहार बंदरगाह के बीच दूरी दिल्ली और मुम्बई के बीच की दूरी से भी कम है। अब देश के किसी भी हिस्से का माल ईरान तक तेजी से पहुंचाया जा सकता है। चाबहार बंदरगाह से ईरान के मौजूदा सड़क नेटवर्क को अफगानिस्तान में जरांज तक जोड़ा जा सकता है जो बंदरगाह से 883 किलोमीटर दूर है।

भारत पहले ही ईरान-अफगानिस्तान सीमा पर जरांज से डेलाराम की 218 किलोमीटर लम्बी सड़क का निर्माण कर चुका है। इस सड़क के माध्यम से गारलैंड हाइवे तक आवागमन आसान हो जाएगा। इस हाइवे से अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों हैरान, काबुल, कंधार और मजार-ए-शरीफ तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह के जरिये भारत को घेरने की कोशिश की थी लेकिन ईरान ने चाबहार के जरिये चीन के इरादों को नाकाम कर दिया।

चाबहार बंदरगाह और ग्वादर बंदरगाह की दूरी महज 72 किलोमीटर है। अमेरिका के ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अलग होने के बाद उसने ईरान पर कई प्रतिबंध लगाए। डोनाल्ड ट्रंप ने लगातार दबाव बनाया और धमकियां दीं कि यदि कोई भी देश ईरान से व्यापार जारी रखेगा तो उसे भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। ईरान के साथ कारोबार करने वाली कम्पनियां भी प्रतिबंध के दायरे में आ गईं। इन प्रतिबंधों का असर भारत पर पड़ना स्वाभाविक था। भारत की यह कूटनीतिक सफलता है कि अमेरिका ने भारत को ईरान से तेल खरीदने और चाबहार बंदरगाह को प्रतिबंधों से मुक्त रखा है।

अमेरिका की चिन्ता अफगानिस्तान भी है और भारत अफगानिस्तान में शांति प्रयासों के लिए जोरदार पहल भी कर रहा है। चाबहार बंदरगाह के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 11 लाख टन गेहूं की पहली खेप अक्तूबर 2017 में भेजी गई थी। इस खेप के पहुंचने का असर यह हुआ कि अफगानिस्तान ने पाकिस्तान से गेहूं खरीदना कम कर दिया। ईरान के विदेश मंत्री जवाद शरीफ भी भारत दौरे पर हैं। उन्होंने केन्द्रीय पोत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात की। भारत ने ईरान के एक बैंक को मुम्बई में अपनी शाखा खोलने की अनुमति भी दे दी है।

यूको बैंक और ईरान का पसरगाद बैंक आपस में काम शुरू भी कर चुके हैं। दोनों बैंक चाबहार बंदरगाह से जुड़े लेन-देन के लिए सेवा प्रदान करेंगे। जवाद शरीफ ने विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज से अफगानिस्तान पर चर्चा की और यह प्रस्ताव भी किया कि अगर भारत चाहे तो तालिबान के साथ उसकी बातचीत शुरू कराने में वह भारत की मदद करेगा। पहले भी जब पाकिस्तान समर्थित तालिबान ने अफगानिस्तान में सरकार बनाई थी तो उसने भारत के हितों को काफी नुक्सान पहुंचाया था। अमे​रिका सरकार की तरफ से अफगा​िनस्तान से अपने सैनिकों की संख्या घटाने के ऐलान के बाद भारतीय हितों पर उलटा असर पड़ने की चिन्ता भारत को भी है। ईरान तो तालिबान से वार्ता शुरू कर चुका है। भारत का रुख तालिबान विरोधी रहा है लेकिन उसे अब अफगानिस्तान मामले में फूंक-फूंककर चलना होगा। कूटनीतिक माध्यमों से वह ईरान की मदद ले सकता है। फिलहाल चाबहार से भारत-ईरान संबंधों में बहार तो आ ही चुकी है।