लोकतंत्र में अपने अधिकारों को लेकर हर कोई जागरूक रहता है लेकिन अर्थव्यवस्था को पाताल तक ले जाने का किसी को कोई हक नहीं है। वित्तीय व्यवस्था अर्थव्यवस्था में एक खास और अलग पहचान रखती है, जिसमें बैंकों की भूमिका सबसे बड़ी होती है। अगर बैंक अधिकारी किसी को भी कुछ भी करने की छूट दे दें या छूट के नाम पर कोई मनमर्जी करते हुए सरकारी पैसे का दुरुपयोग करें और बैंक आंखें मूंद लें तो यह नहीं चलना चाहिए। दुर्भाग्य सेभारत में कुछ ऐसे घोटाले हुए हैं, जिससे देश को अरबों-खरबों रुपयों का नुकसान हुआ है और सबसे बड़ी ट्रैजडी यह है कि इस धन की रिकवरी को लेकर कुछ नहीं किया जा रहा है। ताजा सिलसिले में तीन नए लुटेरे शामिल हो गए हैं, जिनके नाम नीरव मोदी, मुहेल चौकसी और विक्रम कोठारी हैं। इनसे पहले बैंक से 9000 करोड़ रुपए लेकर विजय माल्या फरार हो गया और इसी कड़ी में ललित मोदी आईपीएल का करोड़ों डकार कर फरार हो गया और विदेश जाकर बस गया। इसी तरह अब चौकसी और विक्रम कोठारी सबके सब चोरी और सीना जोरी की परिभाषा पर खुल्लम-खुल्ला हस्ताक्षर कर रहे हैं।

कोई इन्हें कहने वाला नहीं है। बहरहाल, सरकारी तौर पर केस दर्ज होने से लेकर सीबीआई जांच तक बहुत कुछ किया जा रहा है, लेकिन हमारा सवाल यह है कि सरकार का गया हुआ धन वापस कब आएगा?  ये तमाम बातें जो हमने लिखी हैं ये सब जनता की भावनाएं हैं, जो सोशल साइट्स पर जमकर शेयर की जा रही हैं। इन्हीं टिप्पणियों में हमारे एक मित्र कहते हैं कि हम लोग तो मंदिर का घंटा हैं, जब चाहे आओ और बजाकर चले जाओ। बैंकों का करोड़ों-अरबों रुपया लेकर फरार हो जाना और कोई कार्यवाही न होना या विदेशों में जाकर बस जाना अगर ऐसे ही चलता रहा तो फिर यह देश चलेगा कैसे? पर ये इंडिया है और इंडिया में सब चलता है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि अभी और कितने चौकसी, कितने नीरव मोदी, कितने माल्या, कितने कोठारी भरे पड़े हैं, जिन्होंने बैंकों से लोन ले रखे हैं, वापिस नहीं किया और कई गड़बडिय़ों के बावजूद विदेशों में सैट हैं या फिर विदेश भागने को तैयार हैं।

सीनाजोरी की हद देखिये कि नीरव मोदी के वकीलों की फौज पीएनबी को चिी लिख रही है कि उसकी प्रतिष्ठा खराब कर दी गई, सारा मामला खराब कर दिया गया, इसलिए वह ये 11,000 करोड़ नहीं चुका सकता। क्या बेशर्मी भरी बात है और इससे भी बड़ी हैरानगी इस बात की है कि रिकवरी की ओर से बड़े-बड़े बयान दागे जा रहे हैं कि चौकसी या नीरव मोदी की भारी प्रॉपर्टी, लक्जरी कारें और सोने-हीरे के गहने जब्त किए जा रहे हैं। अपने इंद्र दरबार को राजनीतिक रसूख और अफसरशाही के अलावा मॉडलों की चमक-धमक से सजाने वाले नीरव मोदी के बारे में एक दिलचस्प चीज यह शेयर की जा रही है कि सरकार की ओर से जो प्रॉपर्टी या गहने अटैच किए गए हैं, वे कितने असली, कितने नकली और कितनी वैल्यू रखते हैं। बड़े-बड़े लोग सफाइयां देने का काम कर रहे हैं। सोशल साइट्स पर यह टिप्पणी भी कमाल की है, जिसमें लोग कह रहे हैं कि जब माल्या और ललित मोदी का कोई कुछ न बिगाड़ सका तो फिर चौकसी और नीरव मोदी भी इनसे कौन-सा अलग हैं? लोग चाहते हैं कि इन बैंक लुटेरों के खिलाफ तुरंत एक्शन होना चाहिए। आने वाला वक्त अगर इन बैंक लुटेरों के खिलाफ एक्शन को लेकर आगे बढ़ता है तो सचमुच आपकी पारदर्शिता को भी लोग सलाम कर सकते हैं।

राजनीतिक दृष्टिकोण से आरोप-प्रत्यारोप भारतीय लोकतंत्र की एक विशेषता है लेकिन हमारा यह मानना है कि भविष्य में ऐसी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए कि बैंक का एक रुपया भी कोई मार न सके। लोग कहते हैं कि महज पचास हजार रुपए लोन के लिए हमें पचास चक्कर यही बैंक वाले लगवाते हैं। बैंक में फॉर्म पर साइन करने के लिए उस पेन को भी बांध कर रखा जाता है, जिससे हम लिखते हंै, लेकिन करोड़ों-अरबों बैंक से लूट कर ले जाने वालों को बांधने की व्यवस्था नहीं है। यह टिप्पणी भी सोशल साइट्स पर खूब लाइक्स बटोर रही है, लेकिन हमारा कहना है कि आरोप-प्रत्यारोप में लगे राजनीतिक लोग घोटालों को लेकर ठोस व्यवस्था जब तक नहीं करेंगे तब तक ये घोटालेबाज अपना खुला खेल फर्रुखाबादी खेलते ही रहेंगे।

लोकतंत्र में लोगों की यादाश्त भले ही ज्यादा मजबूत न हो लेकिन सही समय पर मार जरूर करती है। हर सूरत में देश का धन देश में रहना चाहिए। लोग कह रहे हैं कि विदेशों से कालाधन लाने की बजाय उन लोगों को पकड़ कर लाओ, जो देश के बैंकों को सरेआम लूटकर विदेशों में जा बसे हैं। यदि ऐसा नहीं किया गया तो फिर इस देश का भगवान ही मालिक है। जिस देश में जनता को भगवान कहा जाता हो, लेकिन लोकतंत्र में यही जनता अपना पैसा लुटता हुआ देख रही हो, तो फिर किसे दोष दें? लोग यही चाहते हैं कि अब इस धन की रिकवरी होनी चाहिए और घोटालेबाज चाहे कोई भी क्यों न हो, उसको तुरंत सजा दी जानी चाहिए। उम्मीद है घोटालों की गिनती करने की बजाय घोटालेबाजों की गिनती पर विराम लगना चाहिए, यही समय का तकाजा और देशवासियों की मांग है।