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संपादकीय

अफवाहों और सोशल मीडिया से सावधान...

आज जब प्रधानमंत्री मोदी जी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी बड़े सशक्त फैसले ले रही है जिसका लोगों को इंतजार था तो कुछ लोग अफवाहें भी उड़ाते हैं कि हालात ठीक नहीं। कोई व्हाट्सऐप पर ग्रुप बनाकर अफवाहें उड़ा रहे हैं। इस समय हर भारतीय का फर्ज है कि भारतीयता का परिचय दें और कोई भी झूठी अफवाह ना उड़ाएं। सब ठीक है कहेंगे तो सब ठीक होता जाएगा। बस हमें यह देखना है कि ना अन्याय करना है, ना अन्याय सहना है। देश को मजबूत बनाना है और सबका सम्मान करना है। लोकतंत्र में दूसरी पार्टियों के लोगों का सम्मान और उन्हें साथ लेकर चलना भी जरूरी है। पहले जमाने में तो महिलाओं को अफवाहें फैलाने का जिम्मेदार ठहराया जाता था। अब नई चीजें आ गई हैं जो सबको मात कर रही हैं।

यह सच है कि सोशल मीडिया का नशा आज पूरी दुनिया पर छाया पड़ा है लेकिन जिस तरह से भारत में इसके प्रति क्रेज है वह चौकाने वाला है। एशिया में भारत ही एक ऐसा महाद्वीप है जहां सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर भारत नंबर वन है। इंसान के दिलो दिमाग को झकझोर कर रख देने में सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका निभा रहा है और इसी चीज को लेकर अमरीकी वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों एक चौकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक एक दिन में आठ घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर काम करने वाले लोग इसके एक ड्रग्स की तरह आदी हो रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि महीने में 270 से 300 घंटे तक सोशल मीडिया पर अपनी उंगलियों के दम पर और आंखे अपने मोबाइल पर गाड़े रखने वाले लोगों के दिमाग कुंद हो रहे हैं। 

इतना ही नहीं उनकी मानसिकता भी सोशल मीडिया से मिलने वाली जानकारी के आधार पर विचित्र सा व्यवहार करने वाली हो रही है। रिपोर्ट कहती है कि अगर एक ईमेल को छोड़ दिया जाए तो बाकी साधन ट्विटर, फेसबुक, व्हाटसऐप, टिकटॉक और इंस्टाग्राम के जरूरत से ज्यादा प्रयोग ने इंसान के दिलो दिमाग में सदा काम करने वाले करोड़ों सैल्ज कमजोर कर दिए हैं। जब ये सैल्ज् शत-प्रतिशत निष्क्रिय हो जाते हैं तो इंसान एक कल्पना लोक जैसा व्यवहार करने लगता है। इन अमरीकी वैज्ञानिकों ने इससे सावधान रहने की अपील करते हुए मानव जाति को सोशल मीडिया के इन साधनों से सावधान रहने का आह्वान भी किया है। 

फिर ​भी हम यह मानते हैं कि सोशल मीडिया ने लोगों को लोगों से जोड़कर सूचनाएं पहुंचाने का काम बखूबी किया। निर्भया रेप कांड हो या अन्ना हजारे का आंदोलन, सोशल मीडिया का प्रयोग करके लोग एक-दूसरे से जुड़े लेकिन जिस तरह से चुनावी पार्टियों ने इसे एक हथियार बनाया और आज जहां देखो हर तरफ हर किसी कोे मोबाइल पर ऑडियो और वीडियो चैट करते हुए देखा जा रहा है तो उनकी हरकतें ना शारीरिक रूप से ठीक हैं बल्कि स्वास्थ्य पर बुरा असर भी डाल रही हैं।

सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म ट्विटर, फेसबुक, व्हाटसऐप, टिकटॉक और इंस्टाग्राम का जरूरत से ज्यादा प्रयोग हमें बीमार कर रहा है। यहां तक कि एक परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने मोबाइलों पर पागलों की तरह हरकतें करते हैं, इस बात का उल्लेख अमरीकी वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में किया गया है। हमारा मानना है कि लिमिट में हर चीज की जानी चाहिए। पिछले दिनों टिकटॉक और कई वीडियो गेम चाहे वह ब्लू व्हेल हो या किकी डांस या अन्य खेल यूथ को इन खेलों के पीछे पागल होते हुए देखा है। टूरिस्ट स्थानों पर, नदियों, पहाड़ों और चिड़ियाघरों में जानवरों के साथ सेल्फी के चक्कर में जान जाने की सुर्खियां अखबारों में आम हो रही हैं। पोस्टकार्ड, इनलैंड, लेटर्स खत्म हो गए। 

लिखने की कला खत्म हो गई, साथ ही सोशल मीडिया ने नन्हें बचपन की मासूमियत छीन ली और यूथ को दिग्भ्रमित कर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि सोशल मीडिया के गलत प्रयोग से बहुत कुछ पहले घट चुका है जिसका असर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों पर भी पड़ा है। सोशल मीडिया के फायदे खत्म हो गए और अब इसका घातक असर सामने आने लगा है। उस लोकप्रियता का क्या फायदा जो आपकी जान पर बने। सोशल मीडिया के सभी फीचर जरूरत से ज्यादा प्रयोग के कारण हमारी जान पर बन रहे हैं। आओ संभल जाएं या संभल कर सोशल मीडिया के साधनों का प्रयोग करें तभी हम बच पाएंगे। खतरे की इस घंटी को सुनिए। खुद समझें और बच्चों को भी समझाएं।