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संपादकीय

भारत, इंडिया और जीडीपी!

आज देश में सकल विकास वृद्धि दर को लेकर इस प्रकार विवाद खड़ा हो गया है कि कांग्रेस व भाजपा दोनों ही अपने- अपने इसके आकलन के फार्मूले को सही बताकर एक-दूसरे को आड़े हाथों ले रही हैं मगर असल सवाल यह है कि क्या आम जनता को इससे कुछ लेना-देना है? आम आदमी का सम्बन्ध इस विकास वृद्धि दर से केवल इतना है कि उसकी जिन्दगी में क्या बेहतर बदलाव आया है और उसकी आमदनी में किस हिसाब से बढ़ौतरी हुई है अर्थात उसकी क्रय क्षमता में कितना इजाफा हुआ है। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विकास वृ​िद्ध दर के जो आंकड़े दिये जाते हैं वे किसकी कीमत पर प्राप्त किये गये हैं? सामाजिक-आर्थिक व शैक्षिक पैमाने पर सबसे निचले पायदान पर खड़े आदिवासियों के जीवन में कितना बदलाव आया है और राष्ट्रीय मुख्यधारा में उनकी हैसियत कितनी बदली है। इस पैमाने पर आर्थिक उदारीकरण के शुरू होने बाद सबसे खराब हालत आदिवासियों की ही रही है। उनके जल, जंगल और जमीन के अधिकार को जिस तरह से निजीकरण की अर्थव्यवस्था ने निगला उससे विकास वृद्धि दर या जीडीपी का आन्तरिक सच भी प्रकट हुआ।

मनमोहन सरकार के दौरान जब पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के वित्तमन्त्री रहते जीडीपी पर बजट अधिवेशन के दौरान संसद में बहस हो रही थी तो कुछ विपक्षी सांसदों ने ग्रामीण क्षेत्रों की खराब हालत का हवाला देते हुए कहा था कि जीडीपी को क्या लोग खायेंगे या ओढें़गे अगर उनकी माली हालत में सुधार नहीं होगा? इसका जवाब श्री मुखर्जी ने दिया था कि न तो जीडीपी को खाया जा सकता है और न ओढ़ा जा सकता है मगर इसकी बदौलत लोगों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि हमारी जीडीपी दर में इजाफा नहीं होता तो वर्ष 2006-07 में किस प्रकार सरकार किसानों का 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्जा माफ कर पाती। यह सब इसी वजह से हो पाया कि हमारी विकास वृद्धि दर 8 प्रतिशत के आसपास थी।

अतः वृद्धि दर का सम्बन्ध लोगों की सम्पन्नता से तो होता है और इस प्रकार होता है कि सरकार सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर लोगों के जीवन स्तर को ऊपर आने के प्रयास कर सकती है मगर आजादी प्राप्त करने के बाद 70 के दशक तक भारत की सकल विकास वृ​िद्ध दर साढ़े तीन प्रतिशत के लगभग रही और इसने हर क्षेत्र में विकास इस प्रकार किया कि कृषि से लेकर विज्ञान और स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा के क्षेत्र में इसके कदम लगातार आगे बढ़ते रहे, इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में भी विकास की किरणें पहुंचाने की पूरी कोशिश की गई। सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि साढ़े तीन प्रतिशत की विकास वृद्धि दर के दायरे में ही भारत ने अपनी 30 प्रतिशत से अधिक आबादी को कृषि क्षेत्र से निकाल कर औद्योगिक व वाणिज्यिक क्षेत्र में पुनर्स्थापित करते हुए शहरीकरण का विस्तार आधारभूत ढांचे को मजबूत करते हुए किया जबकि भारत की आबादी में भी विस्तार लगातार होता रहा अतः तर्क दिया जा सकता है।

हमारी पंचवर्षीय योजना का विकास माडल इस प्रकार काम कर रहा था कि वह किसी एक विशेष वर्ग के लिए सुविधाओं का पिटारा न खोल कर समूचे समाज में सम्पत्ति का बंटवारा न्यायपूर्ण ढंग से कर रहा था और जो लोग निचले पायदान पर खड़े थे उन्हें सिलसिलेवार आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर उठा रहा था। यह सारा काम साढ़े तीन प्रतिशत वृद्धि दर के चलते इस प्रकार हुआ कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा मध्यम वर्ग का बाजार 1990 के आते-आते बन गया। बेशक चीन इससे ऊपर था मगर इसने अपनी तरक्की का रास्ता आम जनता को मशीन बनाकर और उनके निजी हकों व स्वाभिमान को पैरों तले रौंद कर चुना जबकि भारत में जो भी तरक्की हुई वह निजी स्वाभिमान को सर्वोपरि रख कर हुई। वास्तव में महात्मा गांधी की अंग्रेजों से असली लड़ाई इसी मुद्दे पर थी और इसी वजह से उन्होंने लोकतन्त्र का रास्ता चुना था।

आज के सन्दर्भ में यह स्थिति सभी को भ्रण में डाल रही है कि जब अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी बताई जा रही है तो देश का किसान परेशान क्यों है, वह आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर हो रहा है? विश्व की वित्तीय एजेंसियां फऱाखदिली से कभी भारत को ऊपर के पायदान पर रख देती हैं तो कभी आशंका जाहिर करने लगती हैं। अगर हम पूरी तरह निष्पक्ष और बेनियाजी के साथ सोचें तो इसकी वजह एक ही नजर आती है कि अब देश में विदेशी कम्पनियों के लिए व्यापार करना इतना आसान हो गया है कि वे अपनी शर्तों पर हमारी सरकारों को घुमाने के ख्वाब देखने लगी हैं जबकि भारत का असंगठित क्षेत्र का सारा व्यापार बड़ी-बड़ी कम्पनियों के रहमो- करम पर निर्भर होता जा रहा है। हमने समाज में उपभोक्ता क्रान्ति लाने का जो दावा किया है उसने सबसे बड़ा जुल्म यह किया है कि हमारा देश ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंट गया है। कयामत यह है कि इंडिया की हरचन्द यह कोशिश रहती है कि भारत रूढ़िवादिता के संसार में ही घूमता रहे और अपनी धार्मिक पहचान के आगे अपनी आर्थिक दरिद्रता को ओढ़े रहे और ‘भारत’ पर ‘इंडिया’ ही राज करता रहे।