कर्नाटक को राजनीति के मैदान में घटित घटनाक्रम के चलते मीडिया चैनलों और अखबारों ने एक नाटकीय शहर का नाम देना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं इसे गोवा, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल से जोड़कर एक सवाल खड़ा कर दिया गया कि चुनाव में सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का मौका दिया जाए या फिर उसे जिसके पास संख्या बल है? अब हम इस सवाल से हटकर उस पहलू पर आते हैं जो भारतीय जनता पार्टी के भविष्य को 2019 के लोकसभा के चुनावों पर केंद्रित कर रहा है। विश्वासमत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लड़ाई और शक्ति परीक्षण, हमारा यह मानना है कुछ भी हो लेकिन इस सारे घटनाक्रम के बीच भाजपा की सफलता का एक ग्राफ क्यों चर्चा से दूर रह गया? दक्षिण में जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी अपनी जड़ें बना रही है वह देश की राजनीति के लिए एक परिवर्तन का वह दौर है, जो कभी इंदिरा गांधी के समय से शुरू था। सत्ता में कोई राज्य कभी किसी की रियासत नहीं रहा। ऐसे में भाजपा अब इस भ्रम को तोड़कर अगर आगे बढ़ रही है तो उसका मकसद क्या है, इसकी सारी प्लानिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर फोकस है।

सरकार बनाने को लेकर हो रही जद्दोजहद से अलग रहकर राजनीतिक पंडित दक्षिण तक जा पहुंची भाजपा के बारे में अगर टिप्पणियां नहीं कर रहे तो यह हैरानगी की बात है। कुल 222 सीटों में से 104 सीटें प्राप्त कर लेना, इस मकसद को पाने के लिए मोदी, अमित शाह और भाजपा के कार्यकर्ता बधाई के पात्र हैं। ऐसा लगता है कि देश में कांग्रेस को जिस भ्रष्टाचार की जननी के रूप में भाजपा की ओर से हमले किए गए हैं, जनता उसका जवाब देकर फूल वाली पार्टी के साथ ही चल निकली है। लोग प्रधानमंत्री मोदी और उनकी नीतियों पर भरोसा करने लगे हैं। इसीलिए मोदी और अमित शाह बार-बार 2019 का उल्लेख करते हैं।

कर्नाटक की पृष्ठभूमि इसलिए महत्वपूर्ण है कि मोदी और अमित शाह ने वहां अपनी दर्जनों रैलियां करके लोगों के बीच यही संदेश दिया कि हम आपके बीच से हैं। एक विश्वास और आपसी तालमेल का पुल हमारे बीच अच्छी सरकारों के गठन से ही बनेगा। दुनिया के सबसे बड़े आईटी राज्य के लोगों को यह बात समझ में आई और उन्होंने जिस पार्टी का दक्षिण में कोई वजूद नहीं था, उसे 37 प्रतिशत वोट देकर नंबर वन पार्टी के रूप में स्थापित कर दिया, जो यह सिद्ध करता है कि भाजपा के प्रति न सिर्फ कर्नाटक का बल्कि देशवासियों का विश्वास बढ़ रहा है।

आज की तारीख में राजनीतिक पंडितों ने इसी कर्नाटक को लेकर, इसी कांग्रेस को लेकर यह विवेचना नहीं की कि कांग्रेस का वजूद कैसे सिमटता जा रहा है और कैसे उसके भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इन आशंकाओं को सोशल साइट्स पर करोड़ों लोगों ने एक-दूसरे के साथ कुछ इस तरह से शेयर किया है कि आने वाले दिनों में लोग देश में कांग्रेस को ढूंढते रह जाएंगे। कुछ लोग कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से भी सवाल कर रहे हैं कि जबसे आपने कांग्रेस की कमान संभाली है, लोगों का विश्वास आप पर बन नहीं रहा और अब गुजरात के बाद कर्नाटक में भी आप पिछड़ गए, तो आपका और पार्टी का भविष्य क्या होगा? सच बात यह है कि कई लोग चुनावी अंक गणित को उस जमीनी होमवर्क से भी जोड़ते हैं, जिसमें कांग्रेस आज की तारीख में भाजपा से बहुत पीछे रह गई है। जहां अमित शाह और मोदी लोगों के बीच में जाकर उनसे संपर्क करते हैं, वहीं राहुल गांधी महज डेढ़ महीने में अगर कर्नाटक में चंद रैलियां आयोजित करते हैं और इसे कांग्रेस की रणनीति बताते हैं तो फिर सरकारें आसानी से नहीं बनती। यह बात हम नहीं सोशल साइट्स पर लोग शेयर कर रहे हैं और कह रहे हैं कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है।

कांग्रेस जहां विभिन्न भ्रष्टाचार के आरोपों की काट नहीं ढूंढ पा रही है, वहीं मोदी और अमित शाह अपने वर्करों से सोशल साइट्स के जरिए हमेशा संवाद बनाए रखते हैं और उन्हें हमेशा काम के लिए डटे रहने को प्रेरित करते रहते हैं। कांग्रेस को अगर आगे आना है तो पार्टी के अंदर चल रहे लोकतंत्र को ठीक करना होगा। वहीं पिछले दिनों दिल्ली में अमित शाह और मोदी ने भाजपा के कई-कई मोर्चों के पदाधिकारियों से पार्टी दफ्तर में सीधी बात की और उन्हें डटे रहने का आह्वान यह कहकर किया कि देश को विश्व गुरु बनाने के लिए वो अभी से डट जाएं।

समय तेजी से आगे बढ़ रहा है। भाजपा अपनी सहयोगी शाखाओं के दम पर सबको विश्वास में ले रही है और कांग्रेस की ओर से ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। कर्नाटक को ही अगर केंद्र बिन्दु माना जाए तो हम यही पाते हैं कि भाजपा और कांग्रेस की रणनीतियों में यही एक बड़ा फर्क था कि भाजपा की ओर से उसकी बात जनता के बीच अच्छी तरह से सुनी गई और उसकी तरफ से कही गई हर बात का जनता ने भरोसा भी किया। जबकि कांग्रेस केवल लिंगायत समुदाय का कार्ड खेलकर अपनी प्लानिंग में फंस गई। यही वजह है कि एक अकेले लिंगायत मुद्दे के दम पर ही उसे दर्जनों सीटों पर हार झेलनी पड़ी।

सीएम सिद्धारमैया पर राहुल का इस मामले पर फ्री हैंड भरोसा और पुराने सीनियरों को नजरंदाज करने की कीमत भी कांग्रेस को चुकानी पड़ी। जहां भाजपा अब 2019 को मिशन मानकर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस की 2019 को लेकर क्या चुनौती है इस बात का होमवर्क फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। भाजपा और कांग्रेस के बीच पीएम मोदी और अमित शाह एक बहुत बड़ा अंतर खड़ा कर रहे हैं, कांग्रेस को यही समझना पड़ेगा और यही बीजेपी का सबसे बड़ा आत्मविश्वास है।