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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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सफेद धुएं पर काली सियासत

दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण को लेकर जमकर सियासत हो रही है। किसानों द्वारा पराली जलाए जाने को लेकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा सरकारें आपस में उलझ गई हैं, आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला जारी है। इसी ​ि​सयासत के बीच अन्नदाता किसानों को निशाना बनाया जा रहा है। पराली जलाने पर उन्हें जुर्माना लगाया जा रहा है। जो किसान देश को अन्न देता है, सर्दी, धूप, बारिश में कड़ी मेहनत कर खेतों में अन्न उगाता है, कृषि से होने वाली आय पर कर भी नहीं है तो फिर उस किसान को दंडित करने का औचित्य मुझे नज़र नहीं आता। किसान तो सूखे आैर अतिवृष्टि से हमेशा प्रभावित हुआ है, कर्ज के बोझ तले दबे किसान आज भी आत्महत्याएं कर रहे हैं, मुझे हैरानी होती है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, शीर्ष न्यायालय और राज्य सरकारों के फैसले किसान केन्द्रित ही क्यों हैं।

वायु प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा किसानों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। न केवल प्रशासनिक स्तर पर बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी किसानों को निशाना बनाना आसान माना जाता है लेकिन वर्तमान पीढ़ी जानती ही नहीं कि आखिर किसान फसल के अवशेष जलाते क्यों हैं? वैसे ताे हर राज्य के कई अलग-अलग कारण हैं लेकिन पंजाब आैर हरियाणा के किसान बताते हैं कि सबसे ज्यादा जोर पराली जलाने पर वर्ष 1988-1989 के आसपास शुरू हुआ था क्योकि उस दौरान सरकार की आेर से कृषि वैज्ञानिकों ने गांव-गांव कैम्प लगाकर, किसान मेलों में स्टाल लगाकर ​िकसानों को जागरूक किया था कि फसल काटने के बाद जल्द से जल्द खेत की सफाई करें। इससे दूसरी फसल लगाने लगाने पर पैदावार बढ़ेगी, फसलों को नुक्सान नहीं होगा क्योंकि कीट मर जाएंगे। कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि पराली जलाने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों की मंशा ठीक थी लेकिन उसके प्रभाव उलट होने लगे। जो भी हुआ खेत क्लीनिंग योजना के तहत हुआ लेकिन समय के साथ मशीनों का चलन बढ़ने लगा और लोग फसल की कटाई भी मशीनों से करने लगे आैर इससे पराली खेत में ज्यादा मात्रा में बचने लगी जिसे साफ करने का आसान रास्ता इसे जलाना ही माना गया। समस्या बढ़ती गई। यदि खेत क्ली​निंग कवायद में सफाई के अच्छे विकल्प दिए जाते और फसल के अवशेष जलाने के लिए सख्त मना किया जाता तो शायद स्थिति इतनी खराब नहीं होती।

अब सवाल यह है कि क्या दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की अकेली वजह केवल पराली जलाना है। आईआईटी का एक सर्वे बताता है कि प्रदूषण में पराली जलाए जाने से केवल 7 प्रतिशत की बढ़ौतरी ही होती है। किसान तो कई वर्षों से पराली जलाते आ रहे हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण का जायजा लें तो पता चलता है कि धुएं का 20 फीसदी उत्सर्जन दिल्ली के वाहनों से, 60 फीसदी दिल्ली के बाहर के वाहनों से और 20 फीसदी के आसपास बायोमॉस जलाने से होता है। आज विकास का पर्याय बन चुकी मौजूदा पश्चिमी जीवन शैली ने विकास की परिभाषा बदल दी है। देश की जीडीपी में वृद्धि, आलीशान इमारतें, बड़े-बड़े राजमार्ग, फ्लाई ओवर, वातानुकूलित ट्रेनें, बसें आैर कारें, बड़े-बड़े उद्योग, शॉपिंग माल, कृषि के कार्पोरेट तरीकों आदि को आर्थिक विकास की अवधारणा मान लिया है। आर्थिक विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक नहीं बल्कि विरोधी हैं। महानगरों और शहरों के अनियोजित विकास ने प्रकृति को तबाह करके रख दिया है। पर्यावरण और विकास की मौलिक अवधारणा में अंतर्द्वंद्व अब स्पष्ट रूप से सामने है। विकास के इस बाजार प्रतिरूप मॉडल ने पर्यावरणीय समस्या का दानव खड़ा कर दिया। शहरों की हर साल बढ़ती आबादी से बुनियादी ढांचा चरमराने लगा है।

वातावरण में जहर के काकटेल का निर्माण हो रहा है, वातावरण में सबसे घातक अजैविक एयरोसेल का निर्माण बिजली घरों, उद्योगों, ट्रैफिक से निकलने वाली सल्फयूरिक एसिड, नाइट्रोजन आक्साइड और कृषि कार्यों से पैदा होने वाले अमोनिया के मेल से होता है। यह सही है कि पर्यावरण को स्वच्छ रखना हम सबकी जिम्मेदारी है लेकिन यह भी सच है कि पराली किसानों की वाजिब समस्या है और उनकी परेशानी को समझा जाना चाहिए। अब पराली से बायो कम्पोस्ट के माध्यम से खाद बनाकर खेत में डाला जाए तो यह खेती के लिए अमृत है। इससे अगली फसल बिना बाजारू कीटनाशकों और खाद के अच्छी हो सकती है लेकिन किसानों में जानकारी का अभाव है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली की सरकारों ने किसानों की कोई मदद नहीं की। विकल्प के अभाव में कसानों का पराली जलाना मजबूरी हो गया है। धान के बाद गेहूं की फसल लगाने के बीच लगभग एक माह का समय होता है। एक माह में पराली का निपटारा आसान नहीं। अप्रैल में गेहूं की फसल उठाने के बाद धान की फसल लगाने के बीच 3 माह का समय होता है। तीनों राज्य सरकारों को किसानों काे पर्यावरण हितैषी बनाने के लिए काम करना चाहिए था। जब नवम्बर का महीना आता है तो किसांन को जुर्माना लगाया जाता है। पंजाब दो हजार करोड़ मांग रहा है, हरियाणा भी धन मांग रहा है। सरकार को किसानों को पराली का विकल्प उपलब्ध कराना होगा। राज्य सरकारों को मिलजुल कर एक समन्वित योजना तैयार करनी होगी। दिल्ली को खुद महानगर में प्रदूषण फैलाने वाले कारणों का उपाय ढूंढना होगा। किसान तो अन्नदाता हैं, उनका हम पर बहुत बड़ा उपकार है। सफेद धुएं पर काली सियासत बंद होनी चाहिए।