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संपादकीय

धधकती भट्ठियां, मरते लोग

जहरीली शराब ने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में फिर 45 लोगों की जान ले ली। सुहागिनें विधवा हो गईं, मां ने अपना सहारा खोया। वृद्ध पिता की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली, बहनों का क्रन्दन सन्नाटे को चीरता रहा। गांवों की छतों पर खड़े लोग सब देखते रहे।जहरीली शराब से मौत कोई खुशी के मौके पर नहीं हुई बल्कि एक मृतक की तेरहवीं में अवैध शराब परोसी गई जिसे पीकर लोगों की तबीयत बिगड़ गई और मृतकों की संख्या बढ़ती गई। अब अधिकारियों, पुलिसकर्मियों को निलम्बित किया जा रहा है।

प्रशासन जहरीली शराब का धंधा करने वालों पर छापेमारी कर रहा है लेकिन अब इस कवायद से उन लोगों को वापस नहीं लाया जा सकता जो हमेशा के लिए मौत के आगोश में सो चुके हैं। भारत में कानून का पालन हो जाए तो कई समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी लेकिन हमारे देश में कभी कानून का पालन सही ढंग से होता ही नहीं। राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार ही इन समस्याओं को बढ़ाने में सहायक होता है।

जितने भी गैर कानूनी काम होते हैं, उनके पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक शक्ति का संरक्षण दिखाई देता है। कई जगह तो प्रशासन आंखें बन्द करके तमाशा देखता रहता है। इसके लिए अवैध कारोबारी प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को उपकृत करते हैं। अवैध शराब माफियाओं द्वारा किए जा रहे अवैध कारोबार के कारण जहां जन-धन की हानि हो रही है, वहीं देश का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।

अवैध ढंग से शराब का कारोबार करने वाले माफिया सीधे तौर पर जनता के साथ मौत का खेल खेल रहे हैं। इस मौत के व्यापार से उत्तर प्रदेश की जनता सर्वाधिक प्रभावित दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड में जहरीली शराब से मौतों की खबर कोई नई नहीं है। खबर बड़ी तब बनती है जब मौतों की संख्या काफी अधिक हो जाए, यदि एक या दो मौतें होती हैं तो इन्हें नजरंदाज कर दिया जाता है। शराब पीने के आ​दी हो चुके लोगों को कैसी भी शराब मिल जाए, वह पीते ही हैं। वर्तमान में भारत की युवा पीढ़ी भी खुद को नशे के हवाले करती हुई दिखाई दे रही है।

मेहनती लोगों का पंजाब ‘उड़ता पंजाब’ के नाम से मशहूर हो चुका है। वहां की युवा पीढ़ी ड्रग्स की शिकार हो चुकी है। ऐसी स्थिति इसलिए पैदा हुई क्योंकि वहां ड्रग्स आसानी से उपलब्ध हो जाती है। नशीले पदार्थों के माफिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है आैर वह कई वर्षों से मौत का व्यापार करते रहे। आजकल कई धनी परिवारों के लोग शराब को स्टेटस सिम्बल के रूप में लेते हैं। शराब से जीवन तो बर्बाद होता ही है, साथ ही पूरा परिवार तबाही के कगार पर चला जाता है। समाज में बिगड़ते सम्बन्धों का एक कारण शराब भी है। सब जानते हैं कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कहां-कहां अवैध शराब बनाई जाती है। पुलिस के वरिष्ठ अफसर को सब जानकारी रहती है।

पुलिस और आला अफसर चाहें तो अवैध शराब की बिक्री रोकी जा सकती है लेकिन यह धंधा मिलीभगत से चलता है इसलिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब की सप्लाई धड़ल्ले से होती है। ड्राई-डे पर भी आपको झुग्गी बस्तियों और अन्य क्षेत्रों में शराब मिल जाएगी। अवैध शराब बनाने के लिए रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। कई क्षेत्रों में मानव जीवन का स्तर ऊंचा उठाने में शराब बहुत बड़े अवरोधक का काम कर रही है। बुंदेलखंड के लगभग सभी गांवों में अवैध शराब का धंधा होता है।

कहा जाता है कि अगर अवैध शराब का कारोबार बन्द हो जाए तो ग्रामीण किसान काफी हद तक समृद्ध हो सकते हैं लेकिन भ्रष्ट राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के चलते इस पर रोक लगाने के सभी उपाय नाकाम साबित हुए हैं। सितम्बर 2017 में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जहरीली शराब से होने वाली मौतों पर लगाम लगाने के लिए बड़ा फैसला लेते हुए दोषियों को मौत की सजा देने का निर्णय लिया था और सरकार ने इसके लिए आबकारी एक्ट में नई धारा जोड़ी थी। इस धारा के अनुसार शराब से मौत या स्थायी अपंगता पर दोषियों को उम्रकैद, 10 लाख का जुर्माना या फिर दोनों सजाएं एक साथ मिल सकती हैं आैर मृत्युदंड का भी प्रावधान है।

जहरीली शराब से मौत की कड़ी सजा का प्रावधान करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है। योगी सरकार ने आबकारी अधिनियम 1910 में दो दर्जन से अधिक धाराएं बदलीं। गिरफ्तारी, निरुद्ध, बरामदगी, सर्च वारंट, जमानत और गैर जमानती वारंट धाराओं में संशोधन कर अफसरों के अधिकार भी बढ़ाए हैं। कहां है आबकारी विभाग जिस पर अवैध शराब की बिक्री रोकने की जिम्मेदारी है, कहां गई कड़ी धाराएं और कानून। अवैध शराब की भट्ठियां धधक रही हैं और लोगों की लाशें भी धधक रही हैं। नशा अब विकराल समस्या बन गया है।

इस अभिशाप से मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है। नशीले पदार्थों का सेवन किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जनीय होना चाहिए। यह कैसी विडम्बना है कि सामाजिक हितों से सम्बन्धित अनेक मुद्दों और उससे जुड़े नकारात्मक प्रभावों पर हमारी सरकारें व सामाजिक संगठन बहुत जोर-शोर से आवाजें उठाते हैं। कुछ मसलों पर आंदोलन छेड़ देते हैं लेकिन जहरीली शराब से लगातार हो रही मौतों पर कोई जनांदोलन नहीं छेड़ता। लोग घरों पर खड़े होकर मातम देखते हैं, फिर अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में लौट आते हैं। कुछ जागरूक लोग स्थानीय स्तर पर प्रयास करते रहते हैं लेकिन उनकी आवाज भी दब जाती है।