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संपादकीय

आरक्षण की अंधी सुरंग

राजस्थान में एक बार फिर गुर्जर समुदाय 5 फीसदी आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर है। गुर्जरों ने रेल पटरियों पर बसेरा डाल दिया है। सड़कें अवरुद्ध हो रही हैं। धौलपुर में आंदोलनकारियों के हिंसक हो जाने के बाद फाय​रिंग भी हुई। आंदोलनकारी आगजनी भी कर रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलनों के हिंसक हो जाने से लोग भी मारे जाते हैं बल्कि राष्ट्रीय सम्पत्ति को भी व्यापक नुक्सान पहुंचाया जाता रहा है। गुर्जर आरक्षण आंदाेलन से राजस्थान फिर बेपटरी हो चुका है।

वोट बैंक केन्द्रित राजनीति कितनी अराजक हो सकती है, इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलनों के हिंसक हो जाने से यह राज्य बहुत बड़ा नुक्सान झेल चुका है। गुर्जर नेता इस बात पर अड़े हैं कि इस बार वे आरक्षण लेकर ही उठेंगे परन्तु मुश्किल यह है कि राज्य सरकार के लिए आरक्षण की मांग पूरी कर पाना संभव नहीं है। तभी तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि सरकार गुर्जरों की मांग पर मदद करने को तैयार है। उनकी बात केन्द्र तक पहुंचाने की जरूरत है और अब यह केन्द्र सरकार पर निर्भर करता है कि वह क्या फैसला लेती है।

बातचीत की अपील के बावजूद गुर्जर आंदोलनकारी राज्य को बंधक बनाने पर तुले हुए हैं। आरक्षण के मामले में हमारा चिन्तन बिल्कुल भी इस तरह का नहीं है कि देश में वर्षों से दमित​ और पीड़ित समाज को मुख्यधारा का अंग न बनाया जाए परन्तु एेसा भी न हो कि इस आरक्षण के प्याले को हर कोई जूठा कर दे। इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि इस छीना-झपटी से इस प्याले में दरारें आने लगी हैं और यह वातावरण की जहरीली गैसों के सम्पर्क में आने से विषपाई हो चुका है। संविधान की नज़र में अगर मानव-मानव एक है तो फिर यह शोषित, पीड़ित और प्रताड़ित शब्दों का प्रयोग कयों?

आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का विकास राष्ट्र और समाज का दायित्व है लेकिन प्रतिभाओं को पीछे धकेलना कहां तक उचित है। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को अलग से दस फीसदी आरक्षण का ऐलान किया है। गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर सब आरक्षण मांग रहे हैं। गुर्जर आरक्षण आंदोलन के मूल में यह तथ्य अवश्य रहा है कि गुर्जरों में शिक्षा का अभाव रहा है जबकि मीणा शिक्षा के प्रति ज्यादा जागरूक रहे हैं। तभी तो अन्य पिछड़ा वर्ग के होने के बावजूद गुर्जर इसका बहुत कम लाभ उठा सके हैं। गुर्जर समुदाय को यह बात समझनी होगी कि यदि उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया तो भी उन्हें कोई फायदा नहीं हाेगा।

जब तक शिक्षा के मामले में वह जागरूक नहीं होते तब तक सरकारी नौकरियां भी उन्हें नहीं मिल सकतीं। सवाल केवल सरकारी नौकरियों का नहीं बल्कि राजनीतिक वर्चस्व का भी है। राज्य की 25 लोकसभा सीटों में 8 सीटों पर गुर्जर समुदाय की पकड़ काफी मजबूत है और 7 पर उसका दबदबा है। 12 वर्ष पहले भी जब गुर्जर आरक्षण आंदोलन हिंसक हुआ था, तब करीब 30 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। तब तत्कालीन भाजपा सरकार ने पांच फीसद आरक्षण की मांग मान ली थी, परन्तु जब यह मामला अदालत में गया तो उसने इसे निरस्त कर दिया। क्योंकि कानूनी रूप से आरक्षण की सीमा को पचास फीसद से ऊपर नहीं कर करवाया जा सकता। फिर जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी तो तब भी आंदोलन उठा और उसने फिर इनकी मांग स्वीकार कर ली, परन्तु अदालत ने फिर उस पर रोक लगा दी। हालांकि उस समय गुर्जर समुदाय को एक फीसदी आरक्षण मिल गया था।

अब राज्य सरकार फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है और उसने गेंद केन्द्र के पाले में सरका दी है क्योंकि यह मामला संविधान में संशोधन का है, इसलिए वही इस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ कर सकती है। समस्या यह है कि राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के चलते विभिन्न समुदायों को आरक्षण का प्रलोभन देते रहते हैं। सामाजिक रूप से सबल मानी जाने वाली जातियां भी अब आरक्षण की मांग करने लगी हैं। महाराष्ट्र में मराठा को आरक्षण देने के लिए पहले सरकार ने समिति बनाकर सर्वे किया और सर्वेक्षण के आधार पर पाया गया कि मराठा को आरक्षण की जरूरत है, फिर विधानसभा में आरक्षण की सिफारिशों को पारित किया गया लेकिन इसे भी अदालत में चुनौती दे दी गई है। देश आरक्षण की अंधी सुरंग में फंस चुका है।

संविधान में जिन समुदायों को आरक्षण मिला हुआ है या जो समुदाय आरक्षण का लाभ ले चुके हैं, वह भी आरक्षण छोड़ना नहीं चाहते। थोड़ी सी कटौती उन्हें गवारा नहीं। जो आरक्षण मांग रहे हैं उनके तर्क भी गले नहीं उतर रहे। बार-बार किए जा रहे आंदोलनों से समाज में टकराव बढ़ रहा है। अंत कहां होगा कुछ पता नहीं। बेहतर होगा कि राजनीतिज्ञ आरक्षण पर सियासत नहीं करें और ऐसे समाज का निर्माण करें जिसे अपनी बौद्धिक क्षमता पर विश्वास हो आैर प्रतिभाओं को सम्मान मिले।