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बुल्डोजरः कानून सम्मत कार्रवाई

उत्तर प्रदेश में दोबारा योगी सरकार के बनने के बाद जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा हुुई, वह है बाबा के बुल्डोजर की। प्रदेश में अवैध कब्जों को और सम्पत्तियों पर बुल्डोजर के ध्वस्तिकरण कार्यक्रम से माफिया खौफ में है। यह भी सत्य है कि बुल्डोजर किसी गरीब की झोपड़ी या दुकान पर नहीं चल रहा, सिर्फ माफियाओं और अवैध सम्पत्तियों पर ही चल रहा है। इस मुहिम के तहत करोड़ों की सरकारी भूमि मुक्त कराई जा चुकी है। राजनीतिक गलियारों में बुल्डोजर काफी सुर्खियां बटोर रहा है। यूपी का बुल्डोजर जहांगीरपुरी दिल्ली और अलवर (राजस्थान) में होता हुआ मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में भी पहुंच चुका है। बुल्डोजर जिसका इस्तेमाल जमीन को समतल करने के लिए किया जाता है, वह अब सत्ता का प्रतीक बन चुका है। इस तुरन्त न्याय का सम्मोहन इतना ज्यादा है कि लोग भी ताली बजाते हैं। ऐसी तुरंत कार्रवाइयों के समर्थक अक्सर वर्ष 2009 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला देते हैं, जिसमें उसने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में की गई हिंसा के लिए आयोजकों को दोषी ठहराया था और उन्हीं से नुक्सान की भरपाई की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने भारत के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमना को एक याचिका पत्र लिखा था, जिसमें हाल ही में उत्तर प्रदेश में बुल्डोजर से विध्वंस अभियान चलाए जाने के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया था। पत्र में कहा गया कि विरोध प्रदर्शनकारियों के घरों को ध्वस्त किया जाना क्रूर दमन है और नागरिकों के अधिकारों का हनन है। प्रयागराज और उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में बुल्डोजर चलाने की कार्रवाई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। जमीयत-उलेमा-ए-हन्द की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से हलफनामा मांगा था। प्रयागराज हिंसा के मास्टर माइंड माने गए जावेद का घर बुल्डोजर से जमींदोज कर दिया गया था, जस पर कुछ सवाल भी उठे थे। पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी के विरोध में कानपुर में हिसा भड़क उठी थी और प्रयागराज में पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई थी। इसके बाद प्रयागराज और कानपुर में कई स्थानों पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बुल्डोजर की कार्रवाई की थी, जिसे हिंसक घटनाओं से जोड़कर देखा जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से हलफनामा मांगते समय यह स्पष्ट किया ​था कि अदालत अवैध निर्माण पर कार्रवाई को रोक नहीं सकती, लेकिन इसके लिए नियमों और कायदे कानूनों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने शीर्ष अदालत में जो हलफनामा दिया है उसमें सरकार ने कहा है कि बुल्डोजर की कार्रवाई का भाजपा के निलम्बित प्रवक्ताओं की ओर से पैगम्बर मोहम्मद पर दिए बयान के बाद भड़के दंगों से कोई संबंध नहीं है। अवैध ​निर्माण को गिराने की कार्रवाई नगर निकाय के नियमों के अनुसार की जा रही है। दंगा करने वालों को सजा देने के लिए  यह कार्रवाई नहीं की गई। सरकार का कहना है कि हमने नगर निकाय नियमों का पालन करते हुए अवैध निर्माण करने वाले लोगों को अपना पक्ष रखने के लिए उचित मौका भी दिया था। अदालत की ओर से 16 जून को दिए  गए नोटिस के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने कानपुर और प्रयागराज में हुए बुल्डोजर एक्शन को कानून सम्मत करार दिया है। जमीयत की अर्जी को लेकर सरकार का तर्क है कि उन्होंने कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर याचिका दायर की है, इसलिए उनकी अर्जी खारिज की जानी चाहिए। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ​सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई कानून सम्मत है या नहीं। एक पहलू यह भी है कि जिनके मकान गिराये गए हैं उनमें से कोई भी पीड़ित पक्ष खुद कोर्ट नहीं पहुंचा है। बुल्डोजर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर ने अहम प्रतिक्रिया देते हुए कार्यपालिका के व्यवहार की कड़ी आलोचना की है और उन्होंने बुल्डोजर की कार्रवाई को पूरी तरह गैर कानूनी बल्कि एक तरह से कानून के राज को चुनौती देने के तौर पर भी घोषित किया है। कोई भी सभ्य व्यक्ति किसी भी किस्म की हिंसा को जायज नहीं ठहरा सकता। अगर ​किसी वजह से सार्वजनिक कार्यक्रम में ​​हिंसा होती है तो इस मामले में क्या ​किया  जाना चाहिए। इसका फैसला अदालत पर छोड़ा जाना चाहिए। लोकतंत्र में हम केवल पुलिसतंत्र को यह अधिकार नहीं दे सकते कि वह यह तय करे कि दोषी के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए, यह भी वह तय करे। लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का विभाजन स्पष्ट है। यह कैसे हो सकता है ​िक कार्यपालिका ही सब कुछ तय करने लगे। अधिकारियों को नियमों और कानूनों का पालन करना ही होगा। अब यह शीर्ष अदालत फैसला करेगी कि क्या गलत है और क्या सही।उत्तर प्रदेश में दोबारा योगी सरकार के बनने के बाद जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा हुुई, वह है बाबा के बुल्डोजर की। प्रदेश में अवैध कब्जों को और सम्पत्तियों पर बुल्डोजर के ध्वस्तिकरण कार्यक्रम से माफिया खौफ में है। यह भी सत्य है कि बुल्डोजर किसी गरीब की झोपड़ी या दुकान पर नहीं चल रहा, सिर्फ माफियाओं और अवैध सम्पत्तियों पर ही चल रहा है। इस मुहिम के तहत करोड़ों की सरकारी भूमि मुक्त कराई जा चुकी है। राजनीतिक गलियारों में बुल्डोजर काफी सुर्खियां बटोर रहा है। यूपी का बुल्डोजर जहांगीरपुरी दिल्ली और अलवर (राजस्थान) में होता हुआ मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में भी पहुंच चुका है। बुल्डोजर जिसका इस्तेमाल जमीन को समतल करने के लिए किया जाता है, वह अब सत्ता का प्रतीक बन चुका है। इस तुरन्त न्याय का सम्मोहन इतना ज्यादा है कि लोग भी ताली बजाते हैं। ऐसी तुरंत कार्रवाइयों के समर्थक अक्सर वर्ष 2009 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला देते हैं, जिसमें उसने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में की गई हिंसा के लिए आयोजकों को दोषी ठहराया था और उन्हीं से नुक्सान की भरपाई की बात कही थी।सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने भारत के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमना को एक याचिका पत्र लिखा था, जिसमें हाल ही में उत्तर प्रदेश में बुल्डोजर से विध्वंस अभियान चलाए जाने के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया था। पत्र में कहा गया कि विरोध प्रदर्शनकारियों के घरों को ध्वस्त किया जाना क्रूर दमन है और नागरिकों के अधिकारों का हनन है। प्रयागराज और उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में बुल्डोजर चलाने की कार्रवाई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। जमीयत-उलेमा-ए-हन्द की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से हलफनामा मांगा था। प्रयागराज हिंसा के मास्टर माइंड माने गए जावेद का घर बुल्डोजर से जमींदोज कर दिया  गया था, जस पर कुछ सवाल भी उठे थे। पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी के विरोध में कानपुर में हिसा भड़क उठी थी और प्रयागराज में पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई थी। इसके बाद प्रयागराज और कानपुर में कई स्थानों पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बुल्डोजर की कार्रवाई की थी, जिसे हिंसक घटनाओं से जोड़कर देखा जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से हलफनामा मांगते समय यह स्पष्ट किया ​था कि अदालत अवैध निर्माण पर कार्रवाई को रोक नहीं सकती, लेकिन इसके लिए नियमों और कायदे कानूनों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने शीर्ष अदालत में जो हलफनामा दिया है उसमें सरकार ने कहा है कि बुल्डोजर की कार्रवाई का भाजपा के निलम्बित प्रवक्ताओं की ओर से पैगम्बर मोहम्मद पर दिए बयान के बाद भड़के दंगों से कोई संबंध नहीं है। अवैध ​निर्माण को गिराने की कार्रवाई नगर निकाय के नियमों के अनुसार की जा रही है। दंगा करने वालों को सजा देने के लिए  यह कार्रवाई नहीं की गई। सरकार का कहना है कि हमने नगर निकाय नियमों का पालन करते हुए अवैध निर्माण करने वाले लोगों को अपना पक्ष रखने के लिए उचित मौका भी दिया था। अदालत की ओर से 16 जून को दिए  गए नोटिस के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने कानपुर और प्रयागराज में हुए बुल्डोजर एक्शन को कानून सम्मत करार दिया है। जमीयत की अर्जी को लेकर सरकार का तर्क है कि उन्होंने कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर याचिका दायर की है, इसलिए उनकी अर्जी खारिज की जानी चाहिए। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ​सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई कानून सम्मत है या नहीं। एक पहलू यह भी है कि जिनके मकान गिराये गए हैं उनमें से कोई भी पीड़ित पक्ष खुद कोर्ट नहीं पहुंचा है। बुल्डोजर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर ने अहम प्रतिक्रिया देते हुए कार्यपालिका के व्यवहार की कड़ी आलोचना की है और उन्होंने बुल्डोजर की कार्रवाई को पूरी तरह गैर कानूनी बल्कि एक तरह से कानून के राज को चुनौती देने के तौर पर भी घोषित किया है। कोई भी सभ्य व्यक्ति किसी भी किस्म की हिंसा को जायज नहीं ठहरा सकता। अगर ​किसी वजह से सार्वजनिक कार्यक्रम में ​​हिंसा होती है तो इस मामले में क्या ​किया  जाना चाहिए। इसका फैसला अदालत पर छोड़ा जाना चाहिए। लोकतंत्र में हम केवल पुलिसतंत्र को यह अधिकार नहीं दे सकते कि वह यह तय करे कि दोषी के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए, यह भी वह तय करे। लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का विभाजन स्पष्ट है। यह कैसे हो सकता है ​कि कार्यपालिका ही सब कुछ तय करने लगे। अधिकारियों को नियमों और कानूनों का पालन करना ही होगा। अब यह शीर्ष अदालत फैसला करेगी कि क्या गलत है और क्या सही।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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