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दो राज्यों के चुनावों में ‘उपचुनाव’

चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र व हरियाणा राज्यों की नई विधानसभाएं चुनने के लिए मतदान की तिथि की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही 18 राज्यों में कई कारणों से खाली हुईं विधानसभा की 64 सीटों व समस्तीपुर (बिहार) की एक लोकसभा सीट के लिए भी उपचुनाव होगा। महाराष्ट्र की कुल 288 व हरियाणा की 90 सीटों समेत सभी स्थानों पर एक दिन 21 अक्टूबर को मतदान होगा और सभी के नतीजे 24 अक्टूबर को सुना दिये जायेंगे। 

एक चरण में मतदान कराये जाने का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि अतीत में चुनाव आयोग द्वारा बहु-चरणों में चुनाव कराना एक नियम जैसा बन गया था। चुनाव आयोग का मुख्य कार्य निष्पक्ष रूप से निर्भय वातावरण में मतदान कराना होता है जो बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए। यह निष्पक्षता होनी ही नहीं चाहिए बल्कि दिखनी भी चाहिए। अतः दोनों राज्यों में आदर्श आचार संहिता लागू होने के साथ ही सत्ता पर काबिज सरकारों की हैसियत कार्यवाहक सत्ता चालकों की हो जायेगी। 

चुनाव आयोग को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि किस पार्टी की सरकार है बल्कि इस बात से मतलब है कि जो भी सरकार है वह नये चुनाव नतीजे आने के बाद नई बनने वाली सरकार के सत्ता पर बैठने तक केवल दैनिक काम चलाने भर के लिए जरूरी शासकीय काम करने के लिए अधिकृत है। हरियाणा व महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। इनमें से हरियाणा में भाजपा का अकेले अपने बूते पर शासन है जबकि महाराष्ट्र में वह क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना के साथ मिलकर सरकार चला रही है। 

इन दोनों ही राज्यों में इस पार्टी का मुकाबला भी इन्हीं समीकरणों पर कांग्रेस पार्टी से मुख्य रूप से होगा। हरियाणा में जहां कांग्रेस अपने दम पर इसका मुकाबला करेगी वहीं महाराष्ट्र में यह राष्ट्रवादी कांग्रेस व अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर मुकाबला करेगी। इन राज्यों में जो राजनैतिक माहौल बना हुआ है उसे देखते हुए चुनावों से पहले ही कहा जा सकता है कि भाजपा का हाथ दोनों ही राज्यों में ऊपर रहेगा मगर राजनीति में कभी भी कुछ भी स्थायी नहीं होता और माहौल बदलते देर भी नहीं लगती। 

अतः सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सत्तारूढ़ मोर्चा और पार्टी अपने विरोधी पक्ष के आक्रमण को निरस्त करने में किस प्रकार स्वयं को अधिकाधिक मजबूत बनाते हुए पिछले पांच सालों में किये गये अपने कामों का विवरण आम जनता के सामने रखती है। जाहिर है दोनों ही राज्यों में भाजपा बजाये राज्य के मुद्दों के राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ना पसन्द करेगी क्योंकि इन पर कांग्रेस का पक्ष पूरी तरह जनभावनाओं के विपरीत कहा जा सकता है खासकर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त किये जाने के मुद्दे पर यह पार्टी संसद से लेकर सड़क तक खंड-खंड दिखाई पड़ती है। 

वास्तव में कांग्रेस का अभी तक का यह सबसे तीक्ष्ण प्रभावकाल है जिसमें हर राज्य में यह पार्टी विभिन्न गुटों में बंटती दिखाई पड़ रही है। इन चुनावों में फिर इस बात की तसदीक होगी कि पार्टी एकजुट होकर भाजपा जैसी केन्द्रीकृत शक्तिशाली पार्टी का मुकाबला किस तरह कर पाती है मगर इन दोनों राज्यों से भी ज्यादा दिलचस्प उपचुनाव होने जा रहे हैं, इसमें भी कर्नाटक राज्य की 15 विधानसभा सीटों के उपचुनाव होंगे जिनमें विजयी होना राज्य की भाजपा की येदियुरप्पा सरकार के लिए प्राणदान के समान होगा। पिछले दिनों जिस तरह का नाटक कर्नाटक में चला था उसमें कांग्रेस व जनता दल (सै.) की मिलीजुली कुमारस्वामी सरकार का पतन सत्तापक्ष के ही 17 विधायकों द्वारा इस्तीफा देने से हुआ था, जिसकी वजह से 225 सदस्यीय विधानसभा में कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ गई थी। 

विधानसभा में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी (104 विधायकों) होने की वजह से कुछ निर्दलीयों की मदद से इसके बाद भाजपा के श्री वाई.एस. येदियुरप्पा अपना बहुमत सिद्ध करने में कामयाब हुए थे। अब ऐसे 15 विधायकों की सीटों पर पुनः चुनाव कराया जा रहा है जहां भाजपा को निश्चित रूप से कम से कम 10 स्थानों पर विजय प्राप्त करनी पड़ेगी जिससे विधानसभा में इसकी सरकार का स्पष्ट बहुमत हो सके परन्तु जिन 15 सीटों पर उपचुनाव होगा वे पारंपरिक रूप से कांग्रेस व जनता दल (सै.) के गढ़ रहे हैं। चूंकि ये उपचुनाव हैं अतः इनमें राज्य की भाजपा सरकार अपने राष्ट्रीय एजेंडे पर सवार होकर आम मतादाताओं का मन नहीं मोह सकती और स्थानीय मुद्दों पर ही चुनाव लड़े जायेंगे। 

राज्य में आयी ताजा-ताजा बाढ़ से जिस तरह इस राज्य के लोग प्रभावित हुए हैं उसका असर भी इन उपचुनावों पर रहना लाजिमी माना जा रहा है। इसके साथ ही सत्ता से बाहर हुए कांग्रेस व जनता दल (सै.) हालांकि अलग-अलग रहकर ही अपने प्रत्याशी उतारेंगे किन्तु चुनावों की अंतिम तिथि तक पहुंचते-पहुंचते इन दोनों पार्टियों में इस तरह का रणनीतिक समझौता हो सकता है कि वे एक-दूसरे के मजबूत प्रत्याशियों के हक में अपनी संयुक्त ताकत लगा दें। 

यह अजीब संयोग कहा जायेगा कि जिस राज्य में उपचुनाव हो रहे हैं वहां सरकार का भविष्य दांव पर माना जा रहा है और जिन राज्यों में बाकायदा पूरे चुनाव हो रहे हैं, वहां मतदान से पहले ही नतीजों का अन्दाजा लगा लिया गया है। लोकतन्त्र की यही विविधता राजनैतिक विविधता को जागृत रखती है जिसके गर्भ में परिवर्तन छिपा रहता है।