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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

कोरोना की पुष्टि

इलाज चल रहा है

ठीक हो चुके

मृत लोग

सावधान संसद चालू आहे!

क्या समां बन्धा है देश की सबसे बड़ी चुनी हुई प्रतिनिधि संस्था संसद में कि यह रोज सुबह 11 बजे बैठती है और शोर-शराबे व नारेबाजी का कामकाज करके अगले दिन के लिए स्थगित हो जाती है। बेशक बीच-बीच में लोकसभा कई चरणों के लिए स्थगित हो कर यह काम करती है मगर राज्यसभा उच्च सदन होने की वजह से बार-बार स्थगित होने की जहमत जरा कम ही उठाती है और एक बार बैठ कर अगले दिन के लिए स्थगित हो जाती है। 

नहीं भूला जाना चाहिए कि यह दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतन्त्र की वह महान संसद है जिसने आजादी के 72 सालों में देश के लोगों की किस्मत बदलने का काम किया है और भारत को तेजी से विकास करने वाले मुल्कों की कतार में लाकर खड़ा किया है। इसी संसद में ऐसे -ऐसे सांसदविद हुए हैं जिनकी आवाज पर पूरा हिन्दोस्तान ‘जयहिन्द’ बोलते हुए सत्ता और विपक्ष का भेद भूल जाया करता था और एक स्वर से संसद में रखे गये तर्कों का कायल हुआ करता था। 

संसद के सुचारू चलने से ही लोकतन्त्र चलता है और संसद को चलाने की जिम्मेदारी प्राथमिक रूप से उस दल की होती है जो सत्ता में बैठा हुआ होता है। संसद में पूरी निष्पक्षता के साथ कामकाज हो इसके लिए ही यह परंपरा अपनाई गई थी कि अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल से होंगे और उपाध्यक्ष विपक्षी खेमे से होंगे। यह परंपरा भी तब शुरू हुई जब कांग्रेस पार्टी का बहुमत ढीला होने लगा था और विपक्षी सांसदों की संख्या बढ़ने लगी थी मगर 17वीं लोकसभा काे गठित हुए एक साल होने जा रहा है किन्तु उपाध्यक्ष का चुनाव अभी तक नहीं हो पाया है। 

इसका सन्देश संसद की प्रतिष्ठा के अनुरूप तो नहीं कहा जा सकता किन्तु समूची संसद की प्रतिष्ठा से यह तथ्य भी मेल नहीं खाता है कि राजधानी दिल्ली में हुई कुछ तास्सुबी लोगों द्वारा प्रायोजित हिंसा पर बहस को टाले रख कर अन्य विषयों को लिया जाये। संसद लोगों की समस्याओं पर विचार करने के लिए ही बनी है और यह भारत के 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। 

जब लोगों में बेचैनी इस कदर हो कि उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कसरत कुछ वोटों के सौदागर कर रहे हों तो संसद चुप कैसे बैठ सकती है? दिल्ली देश की राजधानी है और दो दिन व दो रात इसकी छाती पर इंसानियत के कातिलों ने इस तरह कहर बरपाया कि 53 लोगों को मौत के घाट उतार कर बस्तियों को तबाह कर डाला और ‘मकतबों’ को ‘मकतलों’ में बदल डाला। बारोजगारों को बेरोजगार बना डाला। जिस शहर में संसद मौजूद हो उसी में कत्लोगारत का बाजार गर्म करके क्या ऐसे शैतानों ने मुल्क की हुकूमत और लोकतन्त्र को चैलेंज नहीं किया है? 

जिन कातिलों ने होली के रंग के रसीले मुहब्बत के त्यौहार से पहले खून का बाजार गर्म करने की जुर्रत की हो उनकी कारगुजारियों पर अगर संसद के भीतर चर्चा करके किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जायेगा तो फिर यह काम किस मंच पर  होगा? भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरफ इशारा भी दिया है कि नफरत के सौदागरों के मामले को लम्बा लटकाया जाना मुनासिब नहीं होगा और इंसाफ की नजर से गलत होगा। 

तभी तो इसने दिल्ली उच्च न्यायालय को निर्देश दिया है कि विवादास्पद और घृणा फैलाने वाले बयान देने वाले भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मामले को महीने भर के लिए टालने का उसका फैसला उचित नहीं लगता। अतः वह सुनवाई 6 मार्च को ही करे। न्याय कहता है कि दोषी को जल्दी से जल्दी कानून के सामने पेश किया जाना चाहिए। इसके लिए अगर अनुकूल वातावरण होने की दलीलें दी जाने लगेंगी तो अपराधियों का मनोबल ही बढे़गा। 

संसद लोकमत की अभिव्यक्ति का केन्द्र होती है और यह जिम्मेदारी विपक्ष को इस तरह निभानी पड़ती है कि सत्ता में बैठी पार्टी और उसकी सरकार जनभावनाओं का संज्ञान निरपेक्ष भाव से ले। संसद के भीतर विपक्षी दलों का व्यवहार सरकार के लिए देश की सड़कों पर होने वाली हलचल का बैरोमीटर होता है। लोकतन्त्र की खूबी भी यही होती है, इसके साथ ही संसद पर पहला अधिकार विपक्षी दलों का ही होता है क्योंकि अल्पमत में रहने के बाद इसकी जिम्मेदारी बहुमत से सत्ता में आई सरकार की नीतियों के जमीन पर पड़ने वाले असर से उसे बाखबर करने की होती है क्योंकि सरकार की नीतियां सभी नागरिकों के लिए एक समान होती हैं। 

दिल्ली की हिंसा को लेकर विदेशों में भारत की छवि पर गलत प्रभाव पड़ा है। सत्तारूढ़ व विपक्षी दल भारत की जनता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं और भारत की छवि का दोनों पर ही प्रभाव पड़ता है। अतः ऐसे मसले पर संसद में बहस टाले रखने की क्या तुक हो सकती है? यही वजह है कि विपक्षी सांसदों के सब्र का प्याला भर रहा है और वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए नारेबाजी, शोरशराबा व पोस्टर आदि दिखा कर प्रभावित करना चाहते हैं। 

संसदीय अनुशासन निश्चित रूप से आवश्यक होता है किन्तु यह इकतरफा नहीं हो सकता। संसदीय लोकतन्त्र में  अहिंसक तरीके से असंतोष व्यक्त करने का तरीका आज की विपक्ष में बैठी कांग्रेस को कल की विपक्ष में बैठी भाजपा ने ही सिखाया है। लोकतन्त्र  नियम के साथ नजीरों से भी चलता है मगर तेवरों में जरूर फर्क है। जिसकी वजह से सात कांग्रेसी सांसदों को वर्तमान सत्र के दौरान मुअत्तिल कर दिया गया है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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