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संपादकीय

सीबीआई का सम्मान?

सीबीआई प्रमुख श्री आलोक वर्मा को पदस्थापित करके सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि तीन महीने पहले जिस तरह उन्हें आधी रात को जबरन छुट्टी पर भेजने का आदेश दिया गया था वह पूर्णतः असंवैधानिक था परन्तु न्यायालय ने अपने आदेश में इसके साथ यह भी कहा है कि वह तब तक कोई नीतिगत नया निर्णय नहीं ले सकते हैं जब तक कि प्रधानमन्त्री, मुख्य न्यायाधीश व लोकसभा में विपक्ष के नेता की तीन सदस्यीय समिति उनके मामले पर विचार कर न ले। इस समिति की बैठक एक सप्ताह में करने का आदेश भी दिया गया है। श्री वर्मा को उनके ही एक एक कनिष्ठ साथी राकेश अस्थाना द्वारा उन पर जवाबी भ्रष्टाचार के आरोप लगाये जाने पर जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था जिस पर पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप थे और श्री वर्मा ने स्वयं सीबीआई प्रमुख की हैसियत से उसकी नियुक्ति किये जाने पर आपत्ति की थी।

तीन महीने पहले सरकार ने श्री वर्मा के साथ राकेश अस्थाना को भी छुट्टी पर भेज दिया था परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने साफ फैसला दिया है कि श्री वर्मा को अधिकारविहीन बनाकर छुट्टी पर भेजने का फैसला कानूनन गलत था क्योंकि इसका निर्णय करने का हक केवल उस तीन सदस्यीय उच्च समिति के पास ही था जो उन्हें नियुक्त करती है। जबकि सरकार ने जबरन छुट्टी पर भेजने का फैसला केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की उस रिपोर्ट के तहत लेकर अपना बचाव करने की कोशिश की थी जिसमें श्री वर्मा पर राकेश अस्थाना द्वारा लगाये गये आरोपों की जांच में उन पर सहयोग न करने की बात कही गई थी। इसे भी न्यायालय ने बरतरफ करते हुए एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की निगरानी में श्री वर्मा पर लगे आरोपों की जांच कराने के आदेश दिये थे और इसने अपनी रिपोर्ट न्यायालय को सौंप दी थी।

तीन न्यायमूर्तियों की पीठ ने इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही श्री वर्मा को पदस्थापित करने का फैसला देकर साफ कर दिया है कि उनके ऊपर लगे आरोपों की गंभीरता इस हद तक नहीं है कि उन्हें जबरन छुट्टी पर भेजा गया फैसला सामयिक कहा जा सके। अतः यह स्पष्ट हो गया है कि तीन महीने पहले जिस तरह देश की इस सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित जांच एजेंसी के मुखिया को बेअख्तियार करके घर बैठाया गया था, वह सही नहीं था। श्री वर्मा ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था जहां से उन्हें आज न्याय मिला है लेकिन इसका वजन इतना भी नहीं है कि वह पहले की तरह अपनी कुर्सी पर बैठ कर ऐसे फैसले कर सकें जिनका सम्बन्ध भविष्य की रणनीति से हो। इसका मतलब यही निकलता है कि वह सीबीआई के रोजमर्रा के कामों को अंजाम देने के लिए मातहत अफसरों को आदेश दे सकते हैं और हर नई दायर होने वाली एफआईआर को भी कलमबन्द करते रहेंगे और जो जांच सीबीआई के अफसर पहले से ही कर रहे हैं उनकी निगरानी करते रहेंगे। बेशक उनके रिटायर होने में अब बमुश्किल 20 दिन ही बचे हैं मगर इन 20 दिनों के भीतर उन्हें अपने विभाग के उन मसलों पर गौर करने से कोई नहीं रोक सकता जो पहले हो चुके हैं।

इनमें उनके विभाग के उन अफसरों के तीन महीने पहले किये गये तबादले भी शामिल हो सकते हैं जो उनके छुट्टी पर जाने के दिन ही अस्थायी तौर पर मुखिया बने अफसर नागेश्वर राव ने किये थे। हालांकि यह मसला भी सर्वोच्च न्यायालय के सामने है मगर रोजमर्रा के काम निपटाने का हुक्म भी उन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने ही दिया है और नागेश्वर राव से भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनके उन फैसलों की फेहरिस्त मांगी थी जो उन्होंने श्री वर्मा के छुट्टी पर जाने से लेकर उसके सामने अपनी बहाली की याचिका पेश करने के दौरान तक किये थे। सर्वोच्च न्यायालय ने नागेश्वर राव को भी हुक्म दिया था कि वह भी भविष्य में कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकते हैं मगर नागेश्वर राव और आलोक वर्मा की हैसियत में जमीन-आसमान का फर्क है। वह फर्क यह है कि नागेश्वर राव कामचलाऊ मुखिया थे और आलोक वर्मा बाकायदा संविधान के तहत बैठाये गये मुखिया हैं जिन्हें नीतिगत फैसले लेने से फिलहाल रोक दिया गया है।

अतः अदालती फैसले की रूह से यह माना जायेगा कि सीबीआई में तीन महीने पहले जैसे हालात थे वैसे ही वापस बनने चाहिएं। इस फैसले से एक बात और उजागर हो गई है कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के पास यह अधिकार नहीं है कि वह सीबीआई संस्था के भीतर भ्रष्टाचार की निगरानी के हक की बुनियाद पर इसके मुखिया को ही बेअख्तियार बनाने की सिफारिश कर सके। यह अधिकार केवल उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय समिति के पास ही है जिसमें प्रधानमन्त्री भी होते हैं। इस समिति के अलावा सरकार का कोई भी अन्य अंग सीबीआई के मुखिया के आचार-विचार या व्यवहार के मद्देनजर अन्तिम निर्णय नहीं ले सकता।

क्योंकि संवैधानिक तौर पर उनका दो साल का कार्यकाल होता है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले तीन महीने से यह संंस्था बिना किसी बाअख्तियार मुखिया के ही चल रही है जबकि पूरे देश में सीबीआई की कार्यप्रणाली को लेकर भारी बावेला मचा हुआ है। यह स्थिति उस भारत जैसे लोकतन्त्र के लिए किसी भी तौर पर उचित नहीं ठहराई जा सकती जिसमें एक साधारण इन्सान से लेकर सरकारें तक सन्देहों को समाप्त करने के लिए सीबीआई की जांच की मांग करते हैं लेकिन दीगर सवाल यह भी है कि श्री आलोक वर्मा के बीते हुए तीन महीने कौन लौटायेगा?