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संपादकीय

लोकतन्त्र का जश्न ‘जिन्दाबाद’

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लोकसभा चुनावों के मतदान के प्रथम चरण में आज जिस जोश के साथ विभिन्न राज्यों की कुल 91 सीटों पर लोगों ने वोट डाले हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतन्त्र की चुनाव प्रणाली मुस्तैदी से काम कर रही है। पूरी निष्पक्षता और निडरता के साथ चुनाव आयोग पर इन चुनावों को सम्पन्न कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी है। कुल सात चरणों में 19 मई तक होने वाले इस मतदान की निष्पक्षता और पवित्रता को कायम रखने के लिये चुनाव आयोग पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी ईवीएम मशीनों की सुरक्षा की है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन मशीनों को लेकर आम जनता के मन में सन्देह के बीज पड़ चुके हैं। अतः इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की गफलत सामने नहीं आनी चाहिए। हालांकि सत्तर साल के प्रौढ़ लोकतन्त्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं माना जा सकता मगर इसका सम्बन्ध चुनाव आयोग के निर्देशन में काम करने वाली सरकारों के कर्मचारियों से ज्यादा है।

बदकिस्मती से भ्रष्टाचार का बोलबाला होने से कर्मचारियों का राजनीतिकरण भी बढ़ा है मगर यह तय है कि पहले चरण के मतदान से अचानक भ्रष्टाचार का मुद्दा उभर कर सामने आ गया है जिसकी वजह से अन्य सभी चुनावी मुद्दे अब नेपथ्य में जा सकते हैं। लोकतन्त्र के लिए यह अशुभ कतई नहीं है क्योंकि सत्ता में बैठने वाले लोगों के लिए ईमानदार होना बहुत जरूरी है और नई सरकार की कमान संभालने वाले नेता का ‘सादिके अमीन’ होना लोकतन्त्र की पहली शर्त है। इसके साथ ही संविधान के अनुसार चुनावी समय में प्रत्येक प्रशासनिक काम होना बहुत जरूरी है। यह देखने की जिम्मेदारी प्राथमिक रूप से इस दौरान चुनाव आयोग पर ही आ जाती है। अतः मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुनील अरोड़ा इस समय संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति के बाद देश के दूसरे सर्वोच्च पदाधिकारी हैं जिनके निर्देश प्रत्येक राजनैतिक दल के बड़े से बड़े नेता के लिए मान्य होंगे चाहे वह किसी भी सरकारी औहदे पर काबिज हो। इस सन्दर्भ में मतदाताओं को साम्प्रदायिक आधार पर बांटकर उनके ध्रुवीकरण करने के किसी भी प्रयास को इस तरह नाकारा बनाया जाना चाहिए कि संविधान की हर उस धारा का पालन हो जिसमें मजहब या जाति को आगे रखकर लोगों को गोलबन्द करने की कोशिशें छिपी हुई हों मगर राजनीतिज्ञ भी कोई कम शातिर कलाबाज नहीं होते।

वे जानते हैं कि चुनावों के लिए बने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 124 उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देती इसलिए वे धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके जनता की धार्मिक भावनाएं भड़का कर उसका ध्यान अहम सामाजिक व आर्थिक मुद्दों से हटाने में महारथ हासिल कर चुके हैं। इसका ताजा उदाहरण बसपा नेता सुश्री मायावती और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। मायावती पहले देवबन्द में मुसलमानों से अपना वोट बंटने न देने की अपील कर आयीं और इसके अगले दिन ही योगी जी ने सहारनपुर में जाकर कह दिया कि उनके पास ‘अली’ है तो हमारे पास ‘बजरंग बली’ हैं। चुनाव जीतने की यह ऐसी सबसे सरल और आसान तकनीक है जिसमें न सत्ता पक्ष को अपनी कारगुजारियों का हिसाब देना पड़ता है और न विपक्ष को वैकल्पिक रास्ता बताना पड़ता है। अतः दोनों ही पक्षों में अलिखित समझौता रहता है कि जिसके भाग्य ने जोर मारा वही जीत जायेगा और निश्चिन्त होकर सत्ता भोगेगा। अतः लोकतन्त्र में आम मतदाता को किसी भी राजनैतिक दल की नीति से ज्यादा नीयत की जांच करनी होती है और इस मामले में भारत के मतदाताओं का कोई सानी नहीं है। वे विभिन्न राजनैतिक दलों को परखते हैं मगर असलियत को पकड़ना भी जानते हैं।

लोकतन्त्र को मजाक समझने वाले इन नेताओं को तो यह तक पता नहीं कि पिछले 48 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी से जूझ रहे देश के युवकों को क्या चाहिए? ये लोग उस जुल्मी शिक्षा व्यवस्था के बारे में बात करना तक उचित नहीं समझते जिसने गरीब घरों के मेधावी नौजवानों को धन न होने की वजह से उच्च शिक्षा प्राप्त करने से रोक दिया है और जब बात भी होती है तो तुर्रा मारा जाता है कि देश में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ गई है मगर ये लोग यह नहीं बताते कि कितने सरकारी विश्वविद्यालयों में गरीब छात्रों का वजीफा तक रोक दिया गया है।

ये उत्पादन बढ़ने के आंकड़े गिना जाते हैं और विकास वृद्धि दर के मायाजाल में उलझा जाते हैं मगर यह नहीं बताते कि किस वजह से सरकारी क्षेत्र की मुनाफा देने वाली कम्पनियों तक को निजी हाथ में बेचा जा रहा है ? यह बताने से घबराते हैं कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों की हालत और उनकी कार्यप्रणाली को नाकारा बनाने के लिए क्यों उनके कर्मचारियों की संख्या लगातार घटाई जा रही है? क्यों 52 लाख के लगभग केन्द्र व राज्य सरकारों की नौकरियों में पद खाली पड़े हुए हैं? चुनाव इन्हीं सब का हिसाब-किताब मांगने का अवसर होते हैं मगर हम हिन्दू व मुसलमान का बवंडर खड़ा करके बड़ी आसानी से बच जाते हैं और कभी राष्ट्रवाद तो कभी समाजवाद क तूफान खड़ा कर देते हैं मगर यह नहीं बताते कि पाकिस्तान के साथ हमारे धन्ना सेठों के कारोबारी रिश्ते हमलों के बावजूद क्यों बदस्तूर जारी रहते हैं? प्रख्यात समाजवादी व गांधीवादी नेता डा. राम मनोहर लोहिया कहते थे कि लोकतन्त्र में जो सरकार बनिया प्रवृत्ति से काम करती है वह किसी भी सूरत में आम जनता की नुमाइन्दगी नहीं कर सकती क्योंकि उसका ध्येय लोगों का भला करना नहीं बल्कि पांच साल बाद अपने चुनाव लड़ने का इन्तजाम करना होता है जिसके परिणाम स्वरूप ‘लोकतन्त्र’ एक न दिन ‘धनतन्त्र’ में तब्दील होकर रह जाता है।

अतः डा. लोहिया ने सिद्धान्त दिया था कि राष्ट्रवादी बनने के लिए पहली शर्त है कि ‘भाषा हो या बाना हो, बस भारत का गाना हो’ और भारत का मतलब द्रविड़ संस्कृति से लेकर उस अकबर महान की विरासत को नमन करने से है जिसने ईरान के उलेमाओं को फरमान भेजा था कि वह न शिया मुस्लिम है न सुन्नी है बल्कि ‘हिन्दोस्तानी मुसलमान’ है मगर क्या खूबी के साथ बांटा है हमने राष्ट्रवाद को कि भारत के एक इलाके ‘वायनाड’ को ही ‘पाकिस्तान’ जैसा बता दिया। ऐसे नेताओं को पहले भारत का इतिहास ही पढ़ाया जाना चाहिए।