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कांग्रेस के सामने चुनौतियां?

कांग्रेस पार्टी द्वारा लोकसभा चुनावों के लिए 15 प्रत्याशियों की सूची जारी करके ऐलान कर दिया है कि राष्ट्रीय मुकाबले में वही विपक्ष की तरफ से सत्ताधारी दल पर हमले की कमान संभालेगी। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश से 11 प्रत्याशियों की घोषणा से यही सन्देश जा रहा है जो कि राष्ट्रीय सन्दर्भ में कांग्रेस की भूमिका को देखते हुए पूरी तरह वाजिब और समयोचित कहा जायेगा। राजधानी दिल्ली की सातों सीटों पर भी इस पार्टी ने जिस आत्मविश्वास के साथ इस अर्ध राज्य की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी से किसी प्रकार का गठबन्धन या समझौता नहीं करने का ऐलान किया है उससे भी इस पार्टी के नेताओं के हौंसलों का अन्दाजा लगाया जा सकता है। दरअसल नवम्बर महीने में उत्तर भारत के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को शानदार सफलता मिली थी उससे इस पार्टी के युवा अध्यक्ष श्री राहुल गांधी के नेतृत्व में ऊर्जा का संचार हुआ था और उनके बारे में भाजपा के परिवारवाद व राजनीति में अपरिपक्व होने के आरोपों की धार कुन्द हो गई थी।

बल्कि इसके विपरीत श्री गांधी ने जिस प्रकार इन तीनों राज्यों के कांग्रेसी मुख्यमन्त्रियों का चयन किया था उससे उनके परिपक्व होने, दूर की सोचने वाले राजनीतिज्ञ की छवि बनी थी परन्तु उनके लिए भी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश टेढ़ी खीर थी जिसकी वजह से अपनी बहन श्रीमती प्रियंका गांधी को राजनीति में लाये थे। उनका यह दांव इस कदर कारगर रहा कि एक तरफ सत्ताधारी दल भाजपा और दूसरी तरफ इस राज्य की अन्य विपक्षी क्षेत्रीय पार्टियां सकते में आ गईं। यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी ने किस समीकरण को तैरा कर इस राज्य की राजनीति को भाजपा के लिए मुफीद बना डाला था और कांग्रेस जैसी मध्य मार्गी पार्टी के लिए मुश्किलें पैदा कर दी थीं।

अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़ा वर्ग के समुदायों को इन दोनों पार्टियों ने अपने वोटों की तिजारत में इस तरह तब्दील किया कि भाजपा को एक तैयार और बना-बनाया वोट बैंक सुरक्षित रूप में मिल जाये। यह कार्य जातिगत विद्वेष व रंजिश और साम्प्रदायिक रस्साकशी पैदा करके किया गया। इससे राज्य के मतदाता इस प्रकार बिखरे कि उनके लिए केवल ये ही मुद्दे राजनीति का पर्याय बनते गये और इस राज्य की सबसे शक्तिशाली पार्टी कांग्रेस लगातार कमजोर बनती चली गई। इसमें कांग्रेस का भी दोष इसलिए ज्यादा नहीं है क्योंकि मतदाताओं के समक्ष इन तीनों पार्टियों ने पूरे परिश्रम से जाति, धर्म व बिरादरी के ही ऐसे ही सवाल लाकर खड़े कर दिये जिनसे उनका सामाजिक जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है मगर कांग्रेस पार्टी ने इस बार ठीक वहीं नब्ज पर हाथ रख दिया है जहां हरकत होती है।

श्री राहुल गांधी ने कुछ ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों और सवालों को लोकसभा चुनावों का एजेंडा बनाने में पिछले छह महीने से दिन-रात एक कर डाला है जिनका सम्बन्ध सीधे राष्ट्रीय विकास के जनमूलक पैमाने और लोकतान्त्रिक पारदर्शिता व सदाचार और भ्रष्टाचार व संवैधानिक संस्थानों की स्वतन्त्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी से है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि आजाद भारत को स्वस्थ और परिपक्व लोकतान्त्रिक प्रणाली देने का श्रेय इसी पार्टी को जाता है और विशेषरूप से प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू को। यह जबर्दस्त विरोधाभास ही कहा जायेगा कि पं. नेहरू की कर्म भूमि उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस पार्टी काे बेवजन होने का अभिशाप ढोना पड़ रहा है।

अतः उनके वंशज राहुल गांधी का यह पहला कर्त्तव्य बनता है कि वह केवल पं. नेहरू की ही नहीं बल्कि अपनी दादी की कर्मभूमि भी रहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को वजनदार पार्टी बनायें। इस राज्य की 80 सीटों में से 11 पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके उन्होंने सन्देश दे दिया है कि बसपा व सपा की विलोपीय समर्थन (लेटेंट सपोर्ट) की राजनीति के लदने का समय आ गया है और अब सीधे भाजपा व कांग्रेस के बीच विचार युद्ध होना चाहिए जिसमें इस राज्य के मतदाता धर्म व जाति और समुदाय में बांटकर न देखे जायें बल्कि भारतीय नागरिक के रूप में देखे जायें और उन मुद्दों पर उनसे वोट मांगा जाये जिनका वास्ता उनके आर्थिक-सामाजिक व राष्ट्रीय विकास से है। यह मुद्दा भारत के उस समावेशी संस्करण का है जिसे हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे हाथ में देते वक्त चेताया था कि संविधान के शासन में संविधान से चलने वाली सरकार का धर्म संविधान ही होगा और यही संविधान मुल्क के हर तबके पर एक समान रूप से इस प्रकार लागू होगा कि सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में इसका सम्मान किसी पूजा या इबादत से कमतर करके न देखा जाये।

दरअसल लोकतन्त्र में चुनाव विचारधारा की लड़ाई ही होती है। कभी-कभी यह बेशक हो जाता है कि विचारधारा व्यक्ति सापेक्ष हो जाती है जिसका प्रमाण पिछले तीस सालों से चल रही भारत की राजनीति के तेवर हैं मगर इसके बावजूद कांग्रेस से निकल कर ही अलग वजूद में आने वाली पार्टियों की भरमार होना बताता है कि उनका शिकवा व्यक्ति सापेक्ष ज्यादा रहा है न कि विचारधारा सापेक्ष। इसकी एक वजह यह भी है कि 1967 तक कांग्रेस पार्टी कमोबेश आजादी से निकली वह पार्टी ही रही जिसमें मध्यमार्गी या गांधीवादी समाजवाद के समर्थक विचारों का संगम था। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि यह स्वयं ही अंतर्नििहत गठबन्धन था। अतः विपक्षी दलों के जिस महागठबन्धन की चर्चा अक्सर होती रहती है उसमें भी कुछ विशेष दलों को छोड़कर वैचारिक साम्यता का होना स्वाभाविक है।

राहुल गांधी ने यह कार्य उत्तर प्रदेश में करने की शुरूआत घुमाकर इस प्रकार की है कि लोगों को आभास हो कि वे जिस राजनीति के गुलाम बना दिये गये हैं वह केवल नफरत और रंजिश को ही परवान चढ़ा सकती है जबकि सियासत का मतलब इस तरह ‘दोस्ती’ होती है कि सामने वाला दुश्मन नहीं बल्कि ज्यादा अक्लमंद लगे और उसे पछाड़ने के लिए उससे भी ज्यादा अक्ल लगाकर उसे मात दी जाये। लोकतन्त्र में राजनीति की पूरी किताब यही होती है, इसके अलावा और कुछ नहीं।