भारत का लोकतन्त्र आजादी के पहले दिन से ही इस तरह मजबूत रहा है कि इसमें सामाजिक न्याय से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को इसका अन्तरंग हिस्सा बनाते हुए प्रत्येक नागरिक को अपने निजी विकास के लिए एक समान अवसर उपलब्ध कराने की गारंटी दी गई। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि आम जनता जब अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करके अपनी मनपसन्द सरकार चुने तो वह अपने सभी निजी धार्मिक आग्रहों से ऊपर उठकर केवल राष्ट्र के समग्र विकास के लिए साधारण व सामान्य व्यक्ति को सशक्त बनाने के ध्येय को ही केन्द्र में रखे परन्तु आजादी के सत्तर सालों में हमने इस अधिकार को इस प्रकार संकीर्ण स्वार्थों के घेरे में बांट डाला कि कहीं हम हिन्दू-मुसलमान हो गये और कहीं पिछड़े व सवर्ण अथवा दलित। बाद में इन्हें मजबूती देने के लिए स्वयं राजनैतिक दलों ने ही अपने-अपने लक्ष्य इन्हीं घेरों को सुगठित करके सत्ता तक आने की सीढि़यां बना लिया जिससे वोट का अधिकार लगातार तिजारत में इस तरह बदलता चला गया कि मतदाता के स्वाभिमान को ही कुछ सियासी पार्टियों ने अपने पास बन्धक बना लिया। यह और कुछ नहीं था बल्कि लोकतन्त्र में कबायली अन्दाज में लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ ही खड़ा करके सामाजिक न्याय के नाम पर वोटों का कारोबार था।

ऐसी कबायली राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश पिछले तीस वर्षों से बना हुआ है और हम इसे ‘सामाजिक इंजीनियरिंग की सियासत’ मानकर चल रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि इस सियासत में मतदाता कहां है? उसके वोट की वह ताकत कहां है जिसके बूते पर सत्ता में अपनी हकदारी जताता है? दरअसल कबीलों में बंटकर वह अपने सारे अधिकार इन्हीं कबीलों के सरदारों को इस तरह दे बैठता है कि वे उसके वोट को ‘परिवर्तनीय’ तक कहने की जुर्रत कर देते हैं मगर सियासत की हकीकत यह है कि वोट बैंक की ‘परिवर्तनीयता’ किसी भी प्रकार का ‘परिवर्तन’ नहीं ला सकती उल्टे यह यथास्थिति को ही और मजबूत करती है। लोकतन्त्र यथास्थिति को कभी स्वीकार नहीं करता और वह परिवर्तन को इस प्रकार चाहता है कि लोगों में ही उसका असर दिखाई पड़े और उन्हें लगे कि वे जहां खड़े थे उससे आगे बढ़े हैं। अतः उत्तर प्रदेश की सियासत की चुनौती कोई छोटी-मोटी नहीं है।

नई ऊर्जा और राष्ट्र समर्पण के अपने पारिवारिक संस्कारों से ओतप्रोत श्रीमती प्रियंका गांधी को इस राज्य में यही चमत्कार करना है और अपनी पार्टी कांग्रेस के पुरोधाओं की इस धरती पर पुनः मतदाता के अधिकार को सर्वोपरि बनाना है। पिछले तीस साल से जिस तरह उत्तर प्रदेश के लोगों की राजनैतिक कुशलता को जिस तरह चन्द सियासी पार्टियों ने अपने-अपने हिस्से की पूंजी में बांटकर रख दिया है उसे ही कुशाग्रता देकर उन्हें एकीकृत रूप में सत्ता पर बैठाना है। यह कार्य 1971 में स्व. इंदिरा गांधी ने इतनी कुशलता के साथ किया था कि बड़े-बड़े सियासी पंडितों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। इंदिरा जी ने सिर्फ यह किया था कि उन्होंने मतदाता के ही लोकतन्त्र का शासक होने का भाव जगा दिया था जिसकी वजह से उन चुनावों में अकेली पड़ी इन्दिरा गांधी ने अपनी पार्टी के ‘चींटी’ समझे जाने वाले प्रत्याशियों से विपक्ष के ‘शेर’ समझे जाने वाले प्रत्याशियों को पिटवा दिया था।

बेशक उस समय वह सत्ता में थीं मगर सत्ता के लाभ से चलने वाले सभी अंग उस समय उनके खिलाफ थे और इनमें सबसे बड़ा अंग पूंजीपतियों का था परन्तु इन्दिरा जी ने इस लड़ाई को वैचारिक बाना पहना कर इस प्रकार लड़ा था कि खुद को समाजवादी कहने वाले राजनीितज्ञ भी धराशायी हो गये थे जबकि बड़े-बड़े पूंजीपति और पूर्व राजे-महाराजे तो तिनकों की तरह बहते नजर आये थे। सवाल सिर्फ आम जनता को वह राजनैतिक विचार देने का था जिससे वह संगठित होकर अपने अधिकारों के प्रति सजग हो जाये। इंदिरा जी का इन चुनावों में नारा ‘गरीबी हटाओ’ मात्र जुमला नहीं था बल्कि सरकार की इच्छा शक्ति का प्रतीक था। ऐसे ही समय में उनका पाकिस्तान की शातिराना हरकतों के खिलाफ उठाया गया कदम भारत की सम्पूर्ण जनता की तरफ से किया गया वह अहद था जिससे हर नागरिक की पहचान केवल भारतीय होने से ही थी।

उन्होंने तब श्रीनगर हवाई अड्डे से भारतीय विमान को अगवा करके लाहौर ले जाकर फूंक देने की पाकिस्तानी हिमाकत का जवाब उसकी हवाई कमर तोड़कर इस प्रकार दिया था कि पाक के हुक्मरान पूरी दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम करते घूम रहे थे। उन्होंने भारतीय वायु सीमा के ऊपर से पाकिस्तान के किसी भी विमान के उड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। यह सब लिखने का आशय इतना ही है कि हमें अपने ताजा इतिहास का वह दौर हमेशा याद रहना चाहिए जब लोकतान्त्रिक भारत के लोगों की ताकत दुनिया के सर चढ़कर बोली थी। इन्दिरा जी को लोगों की ताकत पर ही भरोसा था और अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण पर पूर्ण विश्वास था जिसकी वजह से वह केवल ढाई साल (1977 से 1980 तक इमरजेंसी लगाने की वजह से सत्ता से बाहर होने) बाद पुनः दिल्ली की गद्दी पर भारी गाजे-बाजे के साथ बैठ गई थीं। उनके खिलाफ शाह जांच आयोग में लगाये गये सभी आरोप जनता ने हवा में काफूर कर दिये थे। यह जनता की ही ताकत थी और मतदाता का स्वाभिमान और आत्मविश्वास था जिसने इंदिरा गांधी को इंदिरा गांधी बनाया था, वरना 1967 तक तो उन्हें भी सिर्फ ‘नेहरू की बेटी’ ही कहा जाता था।

निश्चित तौर पर भारत आज ऐसे राजनैतिक द्वन्दात्मक चौराहे पर आकर खड़ा हो गया है जिसमें विचारधारा का स्थान व्यक्तिगत आलोचनाओं की छींटाकशी ने ले लिया है। देश के चुनावों में म्युनिसपलिटी के मुद्दे इस तरतीब से उठाये जा रहे हैं कि लोगों की सोच ही सिमट कर रह जाये। किन्तु लोकतन्त्र जनता की ताकत से चलता है और जनता की ताकत को जगाने वाला ही लोकतन्त्र में नेता कहलाता है और जनता नेता उसे ही स्वीकार करती है जो सच को ऐसा ‘आइना’ बना देता है जिसमें हर आदमी नेता के किरदार को भी करीब से देख ले। उस आइने में देखकर हर आदमी अपनी आवाज में जरूर बोलता है मगर उसे सुनाई सिर्फ सच ही देता है।