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हमारा शत्रु नम्बर ‘वन’ है चीन

कोई जमाना था जब जार्ज फर्नांडीज ने चीन को हमारा शत्रु नम्बर ‘वन’ घोषित कर दिया था। तब इस बात पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। बुद्धिजीवियों ने इसकी कड़ी निंदा की थी। कुछ बुद्धिजीवी तो आपे से बाहर हो गए थे। सभी की राय थी कि कूटनीति में ऐसी भाषा बोलना ठीक नहीं। यह कूटनीति किस चिड़िया का नाम है, इसे भारत के तत्कालीन कर्णधार जानते होते तो स्थितियां खराब नहीं होतीं।

आम जनता की नजर में पाकिस्तान ही हमारा दुश्मन नम्बर वन है। हमारे मानस पटल पर पाकिस्तान और चीन की छवि का एक महत्वपूर्ण कारण, हमसे उनके पूर्व के युद्धों का भी होना है। पाकिस्तान से हमने 1947, 1965, 1971 में तीन युद्ध लड़े। कारगिल भी अघोषित युद्ध की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

कारगिल युद्ध तो हमें अपनी ही जमीन पर लड़ना पड़ा। चीन से हमने 1962 में युद्ध लड़ा। इस युद्ध में हारे भी और चीन ने हमारे भूभाग पर कब्जा भी किया। शीत युद्ध तो हमारा दोनों देशों से आज तक समाप्त नहीं हुआ। लद्दाख में एलएसी पर भारत और चीन में तनाव चल रहा है।

दोनों देशों में तनाव समाप्त करने के लिए सातवें दौर की बातचीत हो चुकी है। भारत ने अपना स्टैंड फिर दोहराया है कि चीन के सैनिकों को पूरी तरह से वा​पस जाना होगा और सीमा पर मई माह जैसी स्थिति बहाल करनी होगी। उधर वार्ता चल रही थी इधर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान की तरह चीन भी एक मिशन के तहत सीमा पर विवाद खड़ा कर रहा है।

राजनाथ सिंह के वक्तव्य का अपना अर्थ है। उन्होंने यह भी कहा है कि चीन और पाकिस्तान के साथ हमारी 7 हजार किलोमीटर की सीमा मिलती है, जहां आए दिन तनाव बना रहता है, लेकिन दूरदर्शी नेतृत्व में यह देश न केवल संकटों का दृढ़ता से पालन कर रहा है बल्कि सभी क्षेत्रों में बड़ा बदलाव भी ला रहा है। राजनाथ सिंह परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं और उन्हें चीन की नीतियों का जवाब देना भी आता है।

रक्षा मंत्री के वक्तव्य से स्पष्ट है कि अब पाकिस्तान और चीन एक साथ मिलकर भारत को परेशान करने में लगे हैं। चीन द्वारा खड़ा किया जा रहा ​िववाद पाक प्रायोजित ही है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में यह बहुचर्चित सिद्धांत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।

भारत को परेशान करने के लिए ही चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के ​िवकास का काम अपने हाथों में लिया था। चीन लगातार पाकिस्तान की मदद कर रहा है। चीन पाकिस्तान में पीआेके में आर्थिक गलियारा बना चुका है, जिसका भारत ​विरोध कर रहा है क्योंकि भारत का स्टैंड यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान ने उस पर अवैध ढंग से कब्जा कर रखा है।

भारत से युद्ध में लगातार हारता पाकिस्तान अमेरिका की दया दृष्टि पर टिका हुआ था। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दृश्य पटल बदला। भारत-अमेरिका की दोस्ती परवान चढ़ गई और अमेरिका पाकिस्तान से दूर हो गया। अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र से मित्रता बनाए रखना हमारी ​नियति भी आैर मजबूरी भी रही।

सोवियत संघ के विघटन से हमारा एक मित्र  राष्ट्र हमसे विदा हो गया था लेकिन अब रूस फिर से शक्तिशाली राष्ट्र हो चुका है और हमारे रूस से संबंध पहले जैसे ही हैं। भारत को विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बनते और अमेरिका से दोस्ती को देख चीन परेशान हुआ। सब जानते हैं कि अमेरिका की सहायता पर रोक के बाद पाकिस्तान ने अपनी झोली चीन के आगे पसार दी।

चीन ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को बढ़ाते हुए पाकिस्तान में घुसपैठ कर ली है। यद्यपि पीओके के लोग चीन की मौजूदगी का विरोध कर रहे हैं। आतंकवादियों के हमलों में चीन के कई इंजीनियर और मजदूर मारे भी जा चुके हैं, लेकिन चीन को इस सबकी परवाह नहीं, वह व्यावसायिक लाभ के लिए परियोजनाओं पर काम जारी रखे हुए है।

जब से भारत ने साउथ चाइना सी पर चीन की दादागिरी का विरोध करना शुरू कर दिया है तब से चीन ने जी-जान से भारत को चारों तरफ से घेरने की साजिश रच डाली। नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत को एक  सामरिक शक्ति बनाया गया। जल, थल, नभ सेना को मजबूत बनाया गया है।

जिस ढंग से सी​मांत क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा मजबूत किया गया उससे इस बात का कोई संदेह नहीं कि भारत दुश्मनों का हर तरीके से ​मुकाबला करने में सक्षम है। राफेल जैसे विमान हमारे पास हैं, नवीनतम मिसाइलों के परीक्षण सफल हो रहे हैं। भारत को छूना चीन के लिए आसान नहीं होगा। अरुणाचल, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पुलों का निर्माण किया गया है, जिससे सेना और रक्षा सामग्री पहुंचाने में ​विलम्ब नहीं हाेगा।

डोकलाम के बाद लद्दाख में चीन हमारा प्रतिरोध देख रहा है।  चीन को उम्मीद भी नहीं होगी कि ​भारत से उसे इस तरह के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। चीन को यह भी पता है कि युद्ध में उसे भी नुक्सान हो सकता है। कोरोना के चलते उसकी अन्तर्राष्ट्रीय छवि भी खराब हो चुकी है। उसके खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लामबंदी हो चुकी है। उसे वैश्विक शक्तियों का समर्थन भी नहीं मिलने वाला।

अमेरिका लगातार उसे चेतावनी दे रहा है। इस राष्ट्र को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की दृढ़ इच्छा शक्ति पर पूरा भरोसा है। इसलिए भारत चीन को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार बैठा है।