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चीन : खि​सियानी बिल्ली खम्भा नोचे

लद्दाख में भारत के कड़े प्रति​रोध के चलते चीन की हालत खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसी हो गई है। कड़ाके की ठंड के चलते वहां तैनात उसके सैनिकों की हालत खराब हो रही है, जबकि भारतीय जवान सजग होकर तैनात हैं। चीन को कभी उम्मीद भी नहीं रही होगी उसे भारत के इस तरह के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।

मीडिया ​रिपोर्ट बताती हैं कि चीन ने अपने दस हजार सैनिकों को वापिस बुला लिया है और वह रोजाना स्तर पर सैनिकों की अदला-बदली करता है, क्योंकि चीन के सैनिकों को इतनी ऊंचाई वाले इलाके में रहने का कोई अनुभव नहीं है। ड्रैगन को भारत से पंगा लेना भारी पड़ रहा है।

चीन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की राह में रोड़े अटकाने का प्रयास किया है। उसने अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत को आतंकवाद और आतंकी संगठनों अलकायदा और उससे जुड़े गिरोहों को लेकर एक बनी कमेटी का अध्यक्ष बनने से रोक दिया है।

अगर भारत इस कमेटी का अध्यक्ष बनता तो उसे कई तरह के फायदे होते। भारत किसी भी आतंकवादी संगठन और किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी के तौर पर नामित कर सकता था। तब उन पर प्रतिबंधों की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी। इससे पहले भी जब पाकिस्तानी मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित किया जाना था तब चीन ने तीन पर सैक्शंस कमेटी में अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर उस पर रोक लगा दी थी।

अंततः चीन पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया और अमेरिका, भारत और अन्य देशों के कूटनीतिक दबाव में चीन को खामोश रहना पड़ा तथा मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कर डाला गया। चीन इस बात को भूल नहीं पाया उसने इस चोट का बदला लेने के लिए ही भारत को कमेटी का अध्यक्ष नहीं बनने दिया। अब इस कमेटी की अध्यक्षता नार्वे करेगा। अब किसी को आतंकवादी घोषित करने या नहीं करने का अधिकार नार्वे के पास रहेगा।

अब भारत को नार्वे पर दबाव डालना होगा। चीन लाख को​िशशें कर ले, एक न एक दिन तो इस मामले में भी उसे मुंह की खानी पड़ेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन जो कुछ कर रहा है वह पाकिस्तान के इशारे पर ही कर रहा है। चीन का अलकायदा से कोई संबंध नहीं लेकिन तालिबान से उसके रिश्ते हैं। पाकिस्तान के इशारे पर चीन ने अलकायदा को खुश करने की को​शिश की है।

चीन द्वारा वीटो प्रस्ताव के इस्तेमाल से अलकायदा जैसे गिरोहों को प्रोत्साहन ही मिलेगा। दूसरी तरफ चीन की छवि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बनती जा रही है कि वह आतंकवाद का भरण-पोषण करने वाला देश है। दरअसल सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों के लिए क्रमिक अध्यक्षता का प्रावधान है। साथ ही परिषद के तहत काम करने वाली विभिन्न समितियों में अस्थाई सदस्यों को भी नेतृत्व करने का मौका दिया जाता है।

भारत इस वर्ष 8वीं बार सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य बना है। सुरक्षा परिषद की ताकतवर मेज पर भारत की मौजूदगी चीन को खटक रही है। चीन ही एक मात्र ऐसा देश रहा जिसने तालिबान कमेटी में भारत की अध्यक्षता का विरोध किया। चीन के विरोध के कारण ही ऐसा पहली बार हो रहा है कि तालिबान प्रतिबंध कमेटी और अलकायदा प्रतिबंध कमेटी की अध्यक्षता अलग-अलग देश करेगा।

2011 में अलकायदा और तालिबान कमेटी को दो हिस्सों में बांटा गया। उस समय जो देश तालिबान कमेटी की अध्यक्षता करता रहा, वही अलकायदा कमेटी का भी चीफ होता है। इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया ने इस दौर में अलकायदा और उससे जुड़ी कमेटियों की अध्यक्षता कर चुका है।

भारत अब तालिबान प्रतिबंध कमेटी की अध्यक्षता करेगा। भारत के ​लिए इस कमेटी की अध्यक्षता करना भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दौरान अफगानिस्तान ने शांति प्रक्रिया बहाल करने को लेकर वहां की सरकार और तालिबान में बातचीत चल रही है और भारत अफगान शांति प्रक्रिया में अहम रोल निभा रहा है।

भारत को चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव और चीन-पाक दोस्ती के बीच अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर भी ड्रैगन से लड़ना पड़ेगा। भारत को सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों के साथ व्यापक भागीदारी बनानी होगी। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका तो भारत का साथ दे रहे हैं, लेकिन चीन का रुख अनिश्चित है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की समस्या यह है कि यदि कोई भी स्थाई सदस्य किसी मुद्दे पर ना कर दे तो उस पर आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। सवाल यह भी है कि चीन और कितना गिरेगा और पाकिस्तान के लिए खुद की छवि ​बिगाड़ता रहेगा। चीन भारत को आगे बढ़ने से रोकना चाहता है।

वह किसी भी कीमत पर भारत को एशिया का सबसे शक्तिशाली देश नहीं बनने देना चाहता। ऐसा होने पर एशिया की दादागिरी उसके हाथ से ​िनकल जाएगी, परन्तु चीन ऐसा कर नहीं पाएगा। अब भारत 1962 वाला भारत ­नहीं है, बल्कि 2021 का भारत है। वह हताश होकर खम्भे ही नोचेगा।