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चीन दो कदम पीछे ही रहे !

चीन की यह रणनीति रही है कि वह दो कदम आगे चल कर एक कदम पीछे हट जाता है। अतः उसकी इस शातिराना चाल को समझते हुए हमें अपनी सीमाओं की सुरक्षा की चौकसी करनी होगी। गलवान घाटी में नियन्त्रण रेखा से भारत व चीन दोनों की सेनाएं ही डेढ़-डेढ़ कि.मी. से ज्यादा दूरी तक पीछे हट रही हैं और इसी प्रकार ‘हाट स्प्रिंग’ क्षेत्र में भी  चीनी सेनाओं ने भारतीय सैनिक चौकियों से पीछे हटना शुरू कर दिया है।  हकीकत यह है कि 1962 के बाद से चीन ने 1967 से लेकर 2017 तक जब भी भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण करने की कोशिश की तब-तब उसने अपनी सेनाओं की स्थिति इस तरह बदल दी कि भारतीय क्षेत्र में उसकी घुसपैठ आसान हो सके।  कोशिश यह होनी चाहिए कि पूरे लद्दाख में चीनी सेनाएं अपने उन्हीं पूर्व स्थानों तक जायें जहां वे मई महीने से पहले थीं। 2013 में जब दौलत बेग ओल्डी सैक्टर इलाके के देपसंग पठारी क्षेत्र में चीनी सेनाओं ने अतिक्रमण किया था तो तीन सप्ताह बाद वे वापस चली गई थीं मगर तब भारतीय सेनाएं भी पीछे हटी थीं तो तत्कालीन विपक्ष ने मनमोहन सरकार की इस बात के लिए जम कर आलोचना की थी।

 हमें यह ध्यान रखना होगा कि पूरी गलवान घाटी पर चीन ने अपना दावा ठोका हुआ है। भारत के कुछ रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार  यहां खिंची नियन्त्रण रेखा पर स्थित भारत की 14वीं सैनिक चौकी से डेढ़ कि.मी. पीछे तक भारतीय सेनाएं आती हैं तो वे यहां बहने वाली ‘श्योंक नदी’ तक सीमित हो जायेगी जो गलवान घाटी के छोर पर है।  नियन्त्रण रेखा के दोनों ओर का इलाका निर्जन (बफर एरिया) घोषित करने पर हमारे सैनिकों की गश्त यहीं तक सीमित रहेगी।  देखना यह भी है कि ‘पेगोंग- सो’ झील इलाके में चीन क्या रुख लेता है क्योंकि यहां की चौकी नं. चार से लेकर आठ तक चीनी सेनाओं ने कब्जा रखी है और वह भारतीय सेना को इस इलाके में गश्त नहीं लगाने दे रही है।  भारतीय सेना के जवानों को चौकी नं. चार से आठ तक जाने के लिए घूम कर आठ कि.मी. का चक्कर लगाना पड़ता है।  ये सब एेसे तथ्य हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी हैं और इस तरह जरूरी हैं कि चीन की फितरत को पहचानते हुए फैसले किये जायें।

 2017 में जब डोकलाम विवाद बामुश्किल हल हुआ था तो भी चीनी सेना पीछे हट गई थी मगर उसने बाद में ‘भारत-भूटान- चीन’ तिराहे के बहुत करीब ही भारी सैनिक ढांचे बना लिये।  1967 में जब सिक्किम में ‘नाथूला’ सरहद पर संघर्ष हुआ था तो भारतीय सेना के रणबांकुरों ने चार सौ से ज्यादा चीनी सैनिकों को हलाक करके अपने क्षेत्र की रक्षा की थी।  इसके बाद चीनी सेना इस क्षेत्र में भी बहुत करीब तक आ गई।  अतः चीन की इस रणनीति को समझना बहुत जरूरी है।  उसकी नीति मूलतः विस्तारवाद की है।  प्रधानमन्त्री ने इसकी घोषणा लद्दाख की राजधानी लेह में ही खुल कर की।  अतः भारत-चीन के बीच होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं में इसी बात का सबसे ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत होगी सीमा पर शान्ति व सौहार्द बनाये रखने का भारत पूरी तरह से तरफदार है मगर अपनी एक इंच जमीन न देने का भी उसका कौमी अहद है इसी प्रतिज्ञा से प्रत्येक भारतवासी बन्धा हुआ है। चीन यदि चाहता था कि लद्दाख नियन्त्रण रेखा पर उठे विवाद को कूटनीतिक रूप से सुलझाने के लिए वह ‘वार्ता तन्त्र’ सक्रिय हो जो वृहद सीमा विवाद पर चर्चा कर रहा है और जिसकी अभी तक 22 बैठकें हो चुकी हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का सौहार्द स्थापित करने के लिए चीनी पक्ष के विदेशमन्त्री से वार्ता करना औचित्यपूर्ण था मगर अब यह भी औचित्यपूर्ण है कि चीनी सेनाएं उसी स्थान पर जायें जहां वे 30 अप्रैल तक थीं और भारतीय सेनाएं इस दिन तक अपनी पूर्व स्थिति में रहें। परन्तु तनाव को कम करने के लिए इसमें भारत यदि कुछ मोहलत चीन को दे रहा है तो चीन के पूर्व पैंतरों का विशेष ध्यान रखना होगा।

 असल बात चीन की नीयत बदलने की है। नीयत में खोट आने पर अक्सर देखा जाता है कि बदनीयत रखने वाला पक्ष रास्ता बदल देता है मगर नीयत नहीं बदलता। कूटनीति कहती है कि ऐसे रास्तों में पहले से ही अवरोधक खड़े कर देने चाहिएं।  चीन भारत का सबसे निकट का ऐतिहासिक पड़ोसी है, 1914 में जो दोनों देशों के बीच शिमला में बैठ कर मिस्टर मैकमोहन ने  सीमा रेखा खींची थी वह 550 मील लम्बी है। मगर चीन इसे स्वीकार ही नहीं करता है।  यह तथ्य हमें हमेशा चौकन्ना रहने की सलाह देता है। 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद स्थिति और पेचीदा हो गई और पाकिस्तान ने भारत से दुश्मनी को अपने वजूद की निशानी बना लिया जिससे चीन के हौसले बढे़ और 1962 में उसने हम पर हमला बोल दिया।

 1963 में पाकिस्तान ने चीन के साथ नया सीमा समझौता करके उसे पाक अधिकृत इलाके का 550 कि.मी. काराकोरम इलाका खैरात मे दे दिया जिसकी वजह से आज चीनी सेनाएं इस इलाके में भी हैं  मगर चीन जानता है कि पूरे एशिया में अगर उसका कोई मुकाबला कर सकता है तो वह एकमात्र भारत है जिसकी आर्थिक और सामरिक शक्ति विविध क्षमताओं से भरी है। लद्दाख में इसीलिए वह जातीय (ईथनिक) समानता की दुहाई देकर नियन्त्रण रेखा का स्वरूप बदल कर अपनी आर्थिक परियोजना ‘सी पैक’ की इस रास्ते से पहुंच बनाना चाहता है।  कूटनीति बहुत दूरन्देशी से विरोधी के इरादों को तोड़ती है और सैनिक संघर्ष को टालती है।  कूटनीति की असली उपयोगिता यही होती है कि वह किफायती तरीके से मेज पर युद्ध लड़ती है और इतिहास को जमींदोज करते हुए भविष्य को सुनहरा बनाते हुए और  सैनिकों का मनोबल ऊंचा रखती है। आचार्य चाणक्य ने इस नीति का अपने अर्थशास्त्र में खुल कर वर्णन किया है जिसे किसी और दिन पाठकों के समक्ष रखूंगा।