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चीन पुरानी जगह पर लौटे

रूस की राजधानी मास्को में चीनी रक्षा मन्त्री वे फेंगे से श्री राजनाथ सिंह ने साफ कह दिया है कि चीन को लद्दाख में खिंची  नियन्त्रण रेखा का सम्मान करना होगा और उसकी फौजों को विगत 2 मई की पूर्व स्थिति में लौटना होगा।  भारत के रक्षा मन्त्री की साफगोई बताती है कि भारत-चीन सीमा पर चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए चीन को आक्रामक तेवर छोड़ने पड़ेंगे और दोनों देशों के बीच इस सम्बन्ध में हुए विभिन्न समझौतों का पालन करते हुए वार्ता की मेज पर बैठ कर इससे जुड़ी हर समस्या का समाधान खोजना होगा। श्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि चीन को भारत के साथ नियन्त्रण रेखा पर उन सभी  स्थानों पर सेनाओं की स्थिति में ऐसा यथानुरूप संशोधन करना होगा जिससे दोनों देशों की फौजें आमने-सामने की स्थिति से बच सकें, बताता है कि भारत अपनी भौगोलिक संप्रभुता के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। श्री राजनाथ सिंह चीन के साथ जिस तेवर और तर्ज पर रिश्ते की बुनियाद मास्को में रख कर आ रहे हैं उसकी तस्दीक भी जल्दी ही हो जायेगी क्योंकि आगामी 9 सितम्बर को रूस में ही शंघाई सहयोग संगठन देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक होगी जिसमें भाग लेने विदेश मन्त्री श्री एस. जय शंकर जाएंगे और उनकी भेंट चीनी विदेश मन्त्री से होगी।

 चीनी रक्षा मन्त्री जनरल वे फेंगे का राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद यह कहना कि सीमा पर तनाव पैदा होने के बाद भारत व चीन के सम्बन्धों पर असर पड़ा है और इसकी छाया दोनों देशों की फौजों पर भी पड़ी है, बताता है कि चीन ताजा घटनाक्रम के लिए स्वयं को पाक-साफ दिखाना चाहता है। कूटनीतिक मोर्चे पर श्री जयशंकर को ही अब वह सफर तय करना है जिससे नियन्त्रण रेखा पर की गई ज्यादतियों का बदले हालात में जायजा लिया जा सके और ये बदले हालात एेसे बने हैं कि लद्दाख में चुशूल सेक्टर में भारतीय फौजें सैनिक नियन्त्रण की स्थिति में हैं जबकि पेगोंग झील इलाके में चीनी सेनाएं गलवान घाटी से लेकर दौलतबेग ओल्डी तक की नियन्त्रण रेखा को जगह-जगह सैनिक हस्तक्षेप से जिस तरह अपनी बढ़त बना कर इस रेखा का भूगोल बदल देना चाहती हैं उसे भी व्यक्त करने में श्री राजनाथ सिंह ने कोई गुरेज नहीं किया है और चीनी रक्षा मन्त्री को जता दिया है कि चीन की इस तरह की इकतरफा कार्रवाई भारत को किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होगी और वह अपनी एक इंच भूमि पर भी कब्जा नहीं होने देगा। चीनी रक्षा मन्त्री ने जब यह कहा कि चीन अपनी भूमि को नहीं खो सकता और उसकी सेनाएं उसकी रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम व समर्थ हैं तो श्री राजनाथ सिंह का नियन्त्रण रेखा की स्थिति पर दिया गया जवाब बताता है कि भारत चीन से सामरिक व कूटनीतिक दोनों ही मोर्चों पर निपटने के लिए तैयार है मगर सन्तोष की बात यह है कि वार्ता के बाद चीन की ओर से यह भी कहा गया कि दोनों पक्षों को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के बीच बनी सहमति के अनुसार वार्ता के द्वारा अपने सभी विवादों का हल खोजना चाहिए। इसके साथ ही भारत के रक्षा मन्त्री  बड़े ही एहतियात के साथ यह रेखांकित करना नहीं भूले कि किसी हद तक मौजूदा तनावपूर्ण वातावरण के लिए चीन ही जिम्मेदार है क्योंकि नियन्त्रण रेखा पर फौजी जमावड़ा  करके और आक्रामक व्यवहार करके उसकी फौजों ने नियन्त्रण रेखा को बदलना चाहा। इसका नतीजा कूटनीति में यही निकलता है कि राजनाथ सिंह चीनी रक्षा मन्त्री से साफ कह आये हैं कि उसकी फौजी दादागिरी नाकाबिले बर्दाश्त है।

 जाहिर है रूस जाने से पहले ही विगत 29-30 अगस्त की रात्रि को चुशूल सेक्टर में चीनी फौज की कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारतीय फौजों ने एेसे ऊंचाई वाले इलाकों पर कब्जा कर लिया था जिससे भारत की स्थिति मजबूत हो सके।  चीन इससे बौखलाया भी और उसने भारत पर ही नियन्त्रण रेखा को तोड़ने का आरोप लगा डाला। दरअसल चीन ने जिस तरह पेगोंग झील इलाके व देपसंग पठारी क्षेत्र में नियन्त्रण रेखा को पार करके अपना कब्जा किया है उसी तरह वह चुशूल सेक्टर में भी करना चाहता था मगर भारत के जांबाज फौजियों के आगे उसकी एक नहीं चली। इससे यह भी पता चलता है कि भारत ने चीन का मुकाबला करने के लिए अपनी सामरिक रणनीति में भी परिवर्तन किया। चीन अभी तक यह करता रहा है कि विगत 2 मई के बाद से अतिक्रमण कार्रवाई शुरू करने के बाद वह एक तरफ भारत से सैन्य व कूटनीतिक स्तर पर बाताचीत करता रहता था तो दूसरी तरफ उसकी फौजें जमीनी स्तर पर और घुसपैठ की कार्रवाइयां करती रहती थीं। 

अपनी मास्को भेंट में राजनाथ सिंह ने इसे पूरी तरह उलट दिया है और चीन के सामने चुनौती फैंक दी है कि वह वार्ता की मेज पर बैठ कर शान्ति व सौहार्द की बातें करें और जमीन पर उन्हें लागू भी करें। दोनों देशों के बीच जो सीमा वार्ता तन्त्र बना हुआ है उसमें शामिल दोनों ही तरफ के विशेष प्रतिनिधि जब सीमा पर तनावरहित माहौल बनाने पर सहमत हो चुके हैं तो व्यावहारिकता में जमीन पर इसे उतारने में मुश्किलों के आने का अर्थ चीन की वह जिद है जिसे अपनी अतिक्रमणकारी कार्रवाई के जरिये वह पूरी करना चाहता है अर्थात नियन्त्रण रेखा की स्थिति बदलना चाहता है। राजनाथ सिंह ने इस हकीकत को बहुत ही सरलता के साथ पेश कर दिया है और चेतावनी भी दे दी है कि भारत बराबरी पर खड़े होकर ही समस्या का हल चाहेगा और नियन्त्रण रेखा पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी वजह से राजनाथ सिंह को एक कठोर वार्ताकार कहा जाता है।