चीन की ‘दादागिरी’ का जवाबचीन की ‘दादागिरी’ का जवाब


चीन के मुद्दे पर संसद में जो बहस चली है उसका निष्कर्ष यही निकलता है कि हमें कूटनीतिक स्तर की बातचीत के जरिये ही एशिया में अपनी ‘दादागिरी’ दिखाने को बेताब इस मुल्क से अपने ताल्लुकात ठीक करने होंगे और भूटान की सीमा पर डोकलाम में इसने जो रुख अख्तियार किया हुआ है उसे ढीला करना होगा। चीन ने पहली बार ऐसा नहीं किया है कि वह भारतीय फौजों के आमने-सामने ऐसी जगह पर आकर खड़ा हो गया जिन पर भारत अपना दावा करता रहा है। हमसे पहली बड़ी गलती तब हुई जब हमने तिब्बत को उसका अंग स्वीकार कर लिया। तिब्बत उसकी सबसे बड़ी दु:खती रग थी जिसे हमने आसानी से छोड़ दिया और हम खुश हो गये कि बदले में सिक्किम को उसने भारत का हिस्सा स्वीकार कर लिया।

सिक्किम का भारतीय संघ में विलय पूरे लोकतान्त्रिक तरीके से स्व. इन्दिरा गांधी ने इस प्रकार किया था कि राष्ट्रसंघ को भी उसे स्वीकृति देनी पड़ी थी मगर जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के नेतृत्व में  2003 में तिब्बत के मसले पर भारत ने हथियार डाल दिये तो इसके तुरन्त बाद ही हमारे अरुणाचल प्रदेश पर इसने अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया। अभी भी यह देश हमारे अरुणाचल के नागरिकों को वीजा सामान्य रूप में नहीं बल्कि नत्थी करके देता है। यह मसला राज्यसभा में अन्नाद्रमुक के सांसद श्री एन. गोपाल कृष्णन ने उठाया था जिसका सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिल सका था। चीन ने जब तिब्बत से लगे अरुणाचल पर अपना हक जताना शुरू किया था तभी यह तय हो गया था कि वह भारत के मत की परवाह नहीं करता है और अपनी ताकत के मद से हमें झुकाना चाहता है। ठीक यही कार्य वह डोकलाम में कर रहा है और छोटे से पहाड़ी देश भूटान को डराना चाहता है परन्तु इसकी राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भारत पर है और वह अपना धर्म निभा रहा है। इसके साथ ही उसने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीन-पाकिस्तान सड़क बनाने की परियोजना को 2015 में लागू करना शुरू कर दिया, यह स्वीकार करते हुए भी कि इस पर भारत अपना दावा करता है और इस दावे के पीछे भारत के पास पुख्ता कानूनी दस्तावेज हैं।

चीन की यह सड़क परियोजना 62 अरब डालर की है जिसे वह पाकिस्तान से किश्तों में वसूल करेगा क्योंकि इसके दोनों तरफ  वह बलूचिस्तान से लेकर ईरान की सीमा तक विभिन्न उद्योग-धन्धों का जाल खड़ा करेगा। अगर यह कहा जाये कि कालान्तर में पाकिस्तान उसके एक उपनिवेश की तरह उपयोग होगा तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि बलूचिस्तान में बने ग्वादर बन्दरगाह का उपयोग वह तिजारती व फौजी कार्रवाईयों के लिए भी करेगा। इसके साथ ही श्रीलंका के साथ भी बन्दरगाह बनाने की परियोजनाएं शुरू करके उसने हिन्द महासागर क्षेत्र को अपने दबदबे में लेने की पुरजोर कोशिश को अंजाम दे डाला है। हमें यह सोचना चाहिए कि एक कम्युनिस्ट देश चीन क्यों एक इस्लामी देश पाकिस्तान को अपनी पीठ पर बिठाकर दुनिया की सैर कराना चाहता है। इसके मुख्य कारण आर्थिक हैं। चीन केवल भूमिमूलक विस्तारवाद में ही यकीन नहीं रखता बल्कि आर्थिक विस्तारवाद में भी विश्वास करता है।

क्यों चीन आतंकवादी अजहर मसूद को राष्ट्रसंघ द्वारा आतंकवादी घोषित होने के मुद्दे पर बार-बार वीटो का इस्तेमाल करता है ? क्यों चीन न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप देशों का सदस्य बनने से भारत को हर हाल में रोकना चाहता है? भारत में एक मजबूत और स्थायी सरकार होने के बावजूद वह क्यों हठधर्मिता दिखा रहा है। इसका असली कारण भारत व अमरीका के बीच की घटती दूरियां हैं और दोनों देशों के बीच बढ़ता फौजी सहयोग है जबकि चीन यह भली-भांति जानता है कि वह भारत से युद्ध करके पूरे एशिया में अपनी बढ़ती ताकत को छोटा कर बैठेगा और उसने जो आर्थिक विकास का खाका तैयार किया है वह धरा का धरा रह जायेगा। उसने सिर्फ  पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि मालदीव से लेकर बंगलादेश व श्रीलंका में भी जमकर निवेश किया हुआ है।युद्ध का खतरा ही इसे निगल जायेगा इसलिए वह भारत को लगातार दबाव में रखकर भारतीय उपमहाद्वीप में उसकी भूमिका को छांटना चाहता है।

2008 में भारत-अमरीका के बीच परमाणु करार होने के बाद उसने जबर्दस्त पलटी मारी और प्रत्येक वह कार्य किया जिससे भारत आन्दोलित हो, इस काम में उसने सबसे पहले पाकिस्तान को ही अपना सबसे ज्यादा वफादार बनाने की बाजी फैंकी। आतंकवाद की सैरगाह बने पाकिस्तान को भारत से बचने की यह मुफीद तजवीज लगी। भारत के सीमा क्षेत्र में अतिक्रमण की घटनाओं में लगातार वृद्धि होनी शुरू हो गई। डोकलाम का तनाव चीन की धौंस दिखाने का ताजा नमूना है। इसका जवाब भारत पूरी मुश्तैदी के साथ दे रहा है और जता रहा है कि किसी मुद्दे पर मतभेद होने का अर्थ विवाद नहीं होता है। डोकलाम विवाद चीन और भूटान के बीच बने वार्ता तन्त्र के जरिये ही हल होना चाहिए। फौज इसका निपटारा नहीं कर सकती। संसद में चली बहस के बाद विदेशमन्त्री सुषमा स्वराज का यह मत पूरी तरह उचित है कि फौजी कार्रवाईयों के बाद भी विवादों का हल अन्त में बातचीत द्वारा ही होता है। यह सिद्धान्त विवादों के हर मोर्चे पर लागू होना चाहिए।