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संपादकीय

राजनीति में खैरात बांटने की होड़

लोकसभा चुनावों के बाद राजनीति के तेवर जिस तरह बदल रहे हैं वह स्वतन्त्र भारत में विस्मयकारी इसलिए नहीं है क्योंकि जनमत प्राप्त करने के लिए उस सरल रास्ते को अपनाने की होड़ लग गई है जिसमें वंचित नागरिकों के आत्मसम्मान और कर्मठशीलता का सौदा चन्द रुपयों के बदले करने की भावना निहित रहती है। लोकतन्त्र में सरकारें यदि ‘भंडारा’ लगाने लगें तो आर्थिक और सामाजिक विकास स्वयं ही ‘जाम’ हो जायेगा क्योंकि गरीबी की हालत में बने रहने को ही संरक्षण मिलेगा और राष्ट्रीय सम्पत्ति पर चन्द लोगों के अधिकारों को ‘जायज’ मान लिया जायेगा। 

दिल्ली के मुख्यमन्त्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह राजधानी की महिला यात्रियों के लिए बसों व मेट्रो ट्रेन का सफर मुफ्त बनाने की घोषणा की है वह इसी क्रम में ऐसा ‘कदम’ है जिसके आगे कोई ‘रोशनी’ ही नहीं है। बेशक उनके फैसले का महिलाएं दिल खोलकर स्वागत करेंगी मगर ऐसा करते ही वे स्वयं को दया और उपेक्षा का पात्र बना लेंगी। समूचे समाज की मानसिकता में इससे जो परिवर्तन आयेगा वह उन्हें बराबरी देने के स्थान पर उनकी ही मेहनत पर मौज करने वाले के रूप में उभरेगा किन्तु यह राजनीति में मुफ्त सौगात बांटने की पराकाष्ठा है। इस नीति से अन्ततः आर्थिक विकास की गति धीमी होती है और जनता का सरकारी सौगात पाने वाला तबका अपना व्यक्तिगत विकास करने की ऊर्जा को नष्ट कर देता है। 

सही मायने में यह गरीब को गरीब बनाये रखने का वह खूबसूरत तरीका है जिसमें उसके सर्वांगीण विकास की मूल जिम्मेदारी से बन्धी सरकार बड़े आराम से अपने हाथ झाड़कर अलग हो सकती है। मुफ्त में मिली खैरात किसी भी व्यक्ति के आत्मबल को नष्ट करने में उत्प्रेरक का काम करती है, उसमें उपेक्षित या वंचित बने रहकर ही फायदा पाने की प्रवृत्ति घर कर जाती है और वह इससे ऊपर उठने की इच्छा शक्ति से ही वंचित होने लगता है। मनुष्य को जब अपने परिश्रम का सन्तोषजनक पारितोषिक मिलता है तो वह लगातार और ऊपर जाने के सपने संजोता है। इसका प्रमाण इसी भारत के विभिन्न उद्योगपति (किर्लोस्कर से लेकर डीसीएम समूह व अम्बानी घराना आदि) हैं। 

राजनीति में भी कमोबेश इस सिद्धांत के कई उदाहरण हैं, परन्तु खींचतान कर गुजारा करने के लिए उसे मिली सरकारी आर्थिक मदद अकर्मण्यता की ओर धकेल देती है अतः सरकारी मदद के रूप में मिली आर्थिक मदद उसे लोकतन्त्र की उस प्रक्रिया से बाहर कर देती है जिसमें उसके द्वारा ही चुनी गई सरकार उसकी नौकर होती है बल्कि इसके विपरीत उसमें वह ‘दास भाव’ घर कर लेता है जिसमें उसका अधिकार केवल दया की भीख पाना ही रह जाता है। मुफ्त में मिली वस्तु की किसी की निगाह में कोई कीमत नहीं होती है, उसे उसकी कीमत का अन्दाजा तभी होता है जब वह उसे पाने के लिए श्रम करता है। लोकतन्त्र में अधिकार सम्पन्न और संभ्रान्त कहे जाने वाले लोगों के बराबर की सुविधाएं पाने का हक मिलना ही समाज के आर्थिक विकास को गति देता है। 

इसकी क्षतिपूर्ति किसी भी रूप में नकद आर्थिक मदद देकर नहीं हो सकती क्योंकि एेसा होते ही मदद पाने वाला व्यक्ति विकास के अन्य सभी अंगों से निरपेक्ष होकर मूकदर्शक में बदल जाता है। इस सन्दर्भ में एक ही उदाहरण काफी है जो भारत को आजादी मिलते ही घटित हुआ था। ओडिशा उस समय भी भारत का सबसे गरीब राज्य था और प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1949-50 के समय भारत स्थित अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स की उस सामुदायिक विकास परियोजना को मंजूरी दे दी थी जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों में जनसुविधाएं व अन्य विकास के काम होने थे। यह परियोजना पूरी तरह अमेरिका अपने धन से पूरी करके ओडिशावासियों को सौंपने वाला था। परियोजना पर काम भी शुरू हो चुका था।

तब राज्य के मुख्यमन्त्री स्व. डा. हरेकृष्ण मेहताब ने पं. नेहरू को खत लिखा और इसका पुरजोर विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि ‘अमेरिकी हमारे लोगों के लिए जो मुफ्त में सुविधाएं देंगे उन्हें उपयोग करने वाले हमारे नागरिकों में इन्हें पाने के लिए कोई श्रम न करने से वह हीन भावना जागृत होगी जो उन्हें अपने स्वतन्त्र होने के अहसास से इस प्रकार दूर करेगी कि उन्हें अपने विकास के लिए कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। उनमें यह भाव जम जायेगा कि लोकतान्त्रिक भारत में भी उनकी स्थिति गुलामों जैसी ही है और वे हुक्मरानों की दया के पात्र हैं, उनमें आगे बढ़ने का भाव तभी जागृत हो सकता है जब उन्हें लगे कि वे अपने बूते पर भी अपना विकास कर सकते हैं।

व्यक्ति को किसी भी चीज की कीमत का अहसास तभी होता है जब वह उसके लिए कुछ खर्च करता है और खर्च करने के लिए वह मेहनत करता है जिसका फायदा पूरे राष्ट्र को मिलता है। इसके साथ ही अपने बीच गोरों को अपने लिए सुविधाएं जुटाते देखकर वे यही समझेंगे कि अभी भी उनके माई-बाप गोरे ही हैं और वे ही इस मुल्क के मालिक हैं। इससे एक ऐसी नई प्रतिस्पर्धा पैदा होगी जिसमें विदेशी लोगों के बीच ही भारतीयों को मुफ्त सुविधाएं बांटने की होड़ लग सकती है। कल को रूसी भी आकर परियोजनाएं चलाना चाहेंगे और भारत उनका अखाड़ा बन जायेगा। 

डा. मेहताब का लिखा यह पत्र आज भी संग्रहालय में मौजूद है और मेहताब वह हस्ती थे जिनके बारे में नेहरू जी के रहते हुए कहा जाता था कि वही उनके बाद उनकी जगह ले सकते हैं मगर भारत में दक्षिण भारत से शुरू होकर खैरात बांटने की राजनीति का जिस तरह श्रीगणेश हुआ है उसमें अब प्रतियोगिता ने वह अन्दाज ले लिया है कि लिंग के आधार पर ही इसे बांटने की घोषणाएं की जा रही हैं। कल्याणकारी सरकार का अर्थ सुविधाओं पर समान अधिकार का होता है न कि खजाने से नकद खैरात बांटने का अतः सम्पन्न महिलाओं को इसे इसी नजरिये से देखना चाहिए।