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संपादकीय

अर्थव्यवस्था से उठती चिन्ताएं ?

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भारत की अर्थव्यवस्था में जिस तरह की उल्टी गति का बहाव शुरू हुआ है वह निश्चित रूप से बड़ी समस्या की शुरूआत के रूप में देखा जाना चाहिए और इसे दुरुस्त करने के कारगर उपाय किये जाने चाहिए। अगस्त महीने के दौरान फैक्टरियों के उत्पादन में केवल कमी ही दर्ज नहीं हुई है बल्कि यह नीचे जाकर 1.1 प्रतिशत कम की दर पर आ गया है। इसके असर निश्चित रूप से बहुआयामी होंगे जिनका सम्बन्ध रोजगार से लेकर आम आदमी की क्रय क्षमता से बन्धा हुआ है परन्तु सबसे ज्यादा असर निवेश माहौल पर पड़ेगा क्योंकि जब बाजार में माल की मांग ही नहीं होगी तो निवेश कौन करेगा? 

मांग का सीधा सम्बन्ध नागरिकों की क्रय क्षमता से होता है परन्तु बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में घरेलू उत्पाद और आयातित उत्पाद के बिक्री मूल्य भी बहुत महत्व रखते हैं, अतः हमें देखना होगा कि इस मूल्यान्तर में कहीं घरेलू माल पिट तो नहीं रहा है लेकिन इस मूल्यान्तर का सबसे ज्यादा प्रभाव उपभोक्ता मूलक सामग्री पर ही रहता है जहां तक औद्योगिक, पूंजीगत माल व टिकाऊ उपभोक्ता सामग्री या मोटर वाहन उद्योग का सम्बन्ध है उसका सीधा वास्ता सामान्य व्यक्ति की क्रय क्षमता से है और इसमें बैंकिंग व्यवसाय की भूमिका केन्द्र में रहती है क्योंकि कुछ को छोड़ कर अधिकतम उत्पादों का वित्तीय पोषण इसी की मार्फत होता है। 

अतः जाहिर तौर पर बैंकिंग व्यवसाय में भी मन्दी के दौर से इन्कार नहीं किया जा सकता है। भारत में अब ‘बाइसिकिल’ की जगह ‘दोपहिया मोटर वाहनों’ ने ले ली है। छोटे से छोटे गांव से लेकर कस्बे व शहर में दोपहिया वाहनों की कतारें लग चुकी हैं। इनकी बिक्री में लगातार पिछले कई महीनों से कमी दर्ज होते हुए अगस्त महीने में उत्पादन  24 प्रतिशत तक गिर जाता है तो चिन्ता होना वाजिब है, इसी प्रकार व्यावसायिक वाहनों में पचास प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट वाणिज्य जगत की खस्ता हालत की गवाही देती है। बेशक वित्त मन्त्रालय ने पिछले दिनों ही कार्पोरेट जगत को शुल्क मद में भारी छूट देकर निवेश व उत्पादन की गति को बल देने की कोशिश की है। 

इस मद में सरकार ने एक लाख करोड़ से अधिक की छूट दी है और जीएसटी दरों को भी नरम बनाया है परन्तु असली सवाल यह है कि पिछले दो साल से अर्थव्यवस्था में जिस गिरावट का दौर शुरू हुआ है वह थमने का नाम क्यों नहीं ले रहा है? आखिरकार असली मर्ज को हम पकड़ क्यों नहीं पा रहे हैं? क्या वजह है कि सोने की कीमतें, डालर की कीमतें और शेयर बाजार की कीमतें समानान्तर रूप से बढ़ रही हैं? यह किस आर्थिक मानक का व्याकरण है? इसकी वजह कहीं यह तो नहीं है कि सम्पत्ति का ध्रुवीकरण (पोलेराइजेशन) केवल कुछ प्रतिशत सम्पन्न या संभ्रान्त कहे जाने वाले लोगों के हाथों में सिमटता जा रहा है? यह बहुत ज्वलन्त प्रश्न है जो राष्ट्रव्यापी आर्थिक मन्दी के दौर से ही उपजा है। 

बेशक मोदी सरकार ने अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करके गरीब समझे जाने वाले लोगों को आर्थिक रूप से समर्पित करने की विभिन्न स्कीमें चला रखी हैं परन्तु इनके माध्यम से वितरण किये जाने वाले धन की मिकदार बाजार की सकल पूंजीवत्ता के मुकाबले 1 प्रतिशत भी नहीं बैठेगी। इसका ताजा उदाहरण पीएमसी बैंक घोटाला है जिसमें चार हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि दो या तीन आदमी मिल कर ही डकार गये। जाहिर है राष्ट्रीय वित्तीय स्रोतों के समानुपाती वितरण में संस्थागत खामी पैदा हो चुकी है जिसे दूर करना मौजूदा सरकार की प्रथम वरीयता होनी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद हमने बेशक तीन से साढ़े तीन प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि की हो मगर सम्पत्ति के समानुपाती वितरण में हमने दुनिया को तब चौका डाला था जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा मध्यम दर्जे का उपभोक्ता बाजार बन कर 1980 से पहले ही उभर गया था। 

इस वर्ग की अपेक्षाओं की आपूर्ति संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था के तहत करनी इसलिए असंभव था क्योंकि भौतिक सुखों की आपूर्ति होना ही ‘विकास’ का पर्याय होता है और विकास का पैमाना ‘अलगाव’ में सुख प्राप्ति की अनुभूति नहीं बल्कि सापेक्ष प्रतियोगी परिस्थितियों में सुविधा सम्पन्न होने का होता है। अतः 1991 में डा. मनमोहन सिंह ने जिस बाजारवादी अर्थव्यवस्था की नींव भारत में डाली थी वह भारत के आर्थिक विकास का ही तत्कालीन विश्व आर्थिक परिस्थितियों में स्वाभाविक पड़ाव था और यही वजह थी कि कम्युनिस्ट चीन ने भी इसके बाद ही माओवादी क्रान्ति की विचारधारा को खूंटी पर टांग कर पूंजीवादी आर्थिक सम्पन्नता के रास्ते को पकड़ा और अपनी जनता को मशीन बना कर अधिकाधिक उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया। 

जाहिर है भारत का रास्ता यह कभी नहीं हो सकता क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था सदियों से विकेन्द्रित इस प्रकार रही है कि गांवों और कस्बों की आर्थिक शक्ति के बूते पर बड़े औद्योगिक घरानों का अस्तित्व पनपा है। अतः समस्या की जड़ देखने की जरूरत है और यह समस्या भारत के असंगठित क्षेत्र की क्षय होती आर्थिक ताकत की है। हमने योजना आयोग का विघटन तो कर दिया मगर नीति आयोग ने इस तरफ क्या किया? नीति आयोग यदि रेलवे के निजीकरण के लिए अपनी स्कीम को लागू करना चाहता है तो इसमें ‘जनभागीदारी’ का कौन सा ‘माडल’ सामने आयेगा। बात समझ में आती है जब प्रधानमन्त्री कहते हैं कि ‘आयुष्मान योजना’ के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र में रेलवे से भी अधिक संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता है परन्तु यह भी देखा जाना जरूरी होगा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजी एकाधिकार न होने पाये। 

राष्ट्रीय सम्पत्ति के समुच्यीकरण या ध्रुवीकरण को रोकने के लिए एकाधिकार को रोकना ही पहली शर्त है क्योंकि इससे आर्थिक क्रय क्षमता सीधे प्रभावित होती है जिसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रह सकता और कार्पोरेट क्षेत्र इसमें हमारी कोई मदद किस प्रकार कर सकता है जबकि वह स्वयं ही इसका कारण होता है। यह कोई कम्युनिस्ट फलसफा नहीं है बल्कि राष्ट्रवादी फलसफा है जिसमें राष्ट्र की मजबूती का अर्थ केवल लोगों की सांस्कृतिक मजबूती से ही नहीं बल्कि आर्थिक मजबूती से इस प्रकार होता है कि वे किसी भी मुसीबत के समय अपने राष्ट्र की आय को कम न होने दें और ‘भामाशाह’ बन कर मदद करें।