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संपादकीय

चुनाव महोत्सव का समापन

आज लम्बे चुनावों का अन्तिम दिन है और 23 मई को जनता का निर्णय सामने आ जायेगा। 17वीं लोकसभा की राजनैतिक संरचना क्या होगी इसके बारे में जिस तरह प्रमुख प्रतिद्वन्दी भाजपा व कांग्रेस ने अपनी-अपनी उम्मीद जाहिर की है उससे यह तो स्पष्ट होता है कि लड़ाई बहुत कांटे की है और पांसा किसी भी तरफ पड़ सकता है मगर एक तथ्य इन चुनावों में सबसे ऊपर उभर कर यह आया है कि आम जनता के मुद्दे हाशिये पर ही रहे हैं और राजनैतिक दल ऐसे विवादों में उलझे रहे जिनका सम्बन्ध उन्हीं से रहा है। इन चुनावों में दवाई, कमाई और पढ़ाई की बात इस तरह हुई जैसे चलते-चलते किसी मेहमान से ‘चाय-पानी’ के लिए पूछ लिया जाता है। चुनाव घोषणापत्र जिस तरह औपचारिक कागज का टुकड़ा बने रहे उससे यही आभास होता है कि राजनैतिक दल जानबूझ कर गफलत का माहौल बनाये रखना चाहते हैं परन्तु यह भी सच है कि विपक्ष लगातार सत्ता से उन सवालों का जवाब मांगता रहा जो सामान्य व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं जबकि सत्ता की तरफ से राष्ट्रवाद की चादर में सभी सवालों को समाहित करने का भरसक प्रयास किया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारत की आम जनता के लिए राष्ट्रवाद विशेषकर सेना के शौर्य का विशेष महत्व रहा है।

विशेष रूप से पाकिस्तान के सन्दर्भ में, परन्तु इसके साथ यह भी हकीकत है कि पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जिसे भारत की सेनाओं ने हर मौका पड़ने पर तूफानी शिकस्त दी है। जिस देश का निर्माण ही भारत विरोध के आधार पर हुआ हो उसकी मुर्दारी की कोई दूसरी कैफियत हो भी नहीं सकती लेकिन इसके बावजूद भारत के लोगों ने अपनी मेहनत और लगन से दुनिया में अपना स्थान बनाने में कामयाबी हासिल की और सत्तर साल से अब तक की सभी सरकारों ने इसमें अपना योगदान दिया। सवाल भारत को इसी नजरिये से देखने का है और इसकी विविधता की ताकत को परखने का है। इसकी यही विविधता इसकी राजनीति को भी निर्देशित करती रही है और इसी के चलते इसका संसदीय लोकतन्त्र फला-फूला है परन्तु इन चुनावों में जिस तरह संसदीय लोकतन्त्र का स्वरूप राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली में तब्दील होते लगा है उससे 543 चुनाव क्षेत्रों से खड़े प्रत्याशियों की महत्ता निश्चित रूप से कम हुई है। इसका कारण विशुद्ध रूप से राजनैतिक दलों की आन्तरिक व्यवस्था है। यही वजह रही कि पूरे चुनाव में मौजूदा सरकार के कुल 70 मन्त्रियों में से किसी एक के भी मन्त्रालय के कार्यकलाप के बारे में कोई टीका-टिप्पणी नहीं हुई और न ही विपक्ष की तरफ से यह सवाल उठाया गया कि रेल मन्त्रालय अथवा कपड़ा या विदेश मन्त्रालय की क्या उपलब्धियां पिछले पांच साल के दौरान रहीं।

उलटा यह जरूर हुआ कि हर मन्त्री बालाकोट कार्रवाई और आतंकवाद के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में ही चर्चा करने में अपनी बेहतरी समझता रहा। जिस नोटबन्दी से पूरे देश में कालेधन के खिलाफ लगाम लगने की उम्मीद आम जनता ने बांधी थी उसके बारे में कांग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी ने यह जरूर नुक्ताचीनी कर डाली कि जब प्रधानमन्त्री ने यह फैसला किया था तो अपने सभी मंत्रियों को एक कमरे में बन्द जैसा कर दिया था। कांग्रेस को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि वह आम जनता का ध्यान उसी के मूल मुद्दों पर खींच कर लाने में असफल रही बेशक बेरोजगारी के प्रश्न पर इसने युवा वर्ग को आन्दोलित किया और केन्द्र सरकार की खाली पड़ी 24 लाख नौकरियों को मुद्दा बनाने में सफलता प्राप्त की मगर इसी युवा वर्ग का एक बहुत बड़ा तबका भाजपा द्वारा दिये गये राष्ट्रवाद के एजेंडे से भी प्रभावित रहा। इस मामले में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की राजनैतिक तीक्ष्णता की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि उन्होंने समूचे विपक्ष को अपने खड़े किये गये विमर्श में उलझाये रखा और बहुत चतुराई से अपनी सरकार की खामियों को अपनी सफलताओं के आवरण में छिपा दिया।

बेशक चुनावी प्रचार गड़े मुर्दे उखाड़ कर उनसे जुड़े सवालों पर भी केन्द्रित करने की कोशिश की गई किन्तु अन्तिम चरण के आते-आते प. बंगाल में इसने जो उल्टा रुख पकड़ा और प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने जिस तरह शहीद हेमन्त करकरे को ‘देशद्रोही’ और बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘राष्ट्रभक्त’ बताया उससे राष्ट्रवाद की सम्पूर्ण अवधारणा की कलई खुल गई परन्तु इन चुनावों में व्यक्तिगत आलोचना ने एक नया आयाम लेकर राष्ट्रीय चुनावों को किसी ‘म्युनिसपलटी’ के चुनावों में तब्दील होते भी देखा जिससे यह सिद्ध हो गया कि वैचारिक स्तर पर राजनीति करने की शर्त को बड़े आराम से बरतरफ भी किया जा सकता है।

पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा उपेक्षा कृषि, शिक्षा व ग्रामीण क्षेत्र की हुई। हालांकि कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में पृथक किसान बजट लाने और शिक्षा पर सकल उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने का वादा किया परन्तु इन मुद्दों से जुड़ी समस्याओं को वह केन्द्र में लाने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी जबकि सत्तारूढ़ दल ने शिक्षा के क्षेत्र पर जुबान बन्द रखना ही उचित समझा और कृषि के क्षेत्र में छोटे किसानों को छह हजार रुपये साल में देकर उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढा।

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस तरह छूमन्तर का खेल खेला गया उससे तो स्वर्ग में बैठे श्री राजीव गांधी को ही पुनः जवाब तलब कर लिया गया जबकि भारत की न्यायप्रणाली ने ऐलान कर दिया था कि बोफोर्स मामले में उन पर रत्ती भर भी शक की गुंजाइश नहीं है। कुल मिलाकर देखा जाये तो ये चुनाव पूरी तरह हवाबाजी में लड़े गये हैं मगर भारत के मतदाता इसीलिए बुद्धिमान माने जाते हैं कि वे हवा में उड़ते पंछी के परों में भी हल्दी लगाने की कला जानते हैं। अतः हम सभी को इन चुनावों के परिणामों का बेसब्री से इंतजार रहेगा मगर खबरिया टीवी चैनल भी इस दौरान एक्जिट पोलों से अपना रंग बिखेरेंगे और तथाकथित चुनाव विश्लेषकों की रोजी-रोटी का इन्तजाम करेंगे। इसलिए 23 मई तक हवाबाजी को क्यों न और देखा जाये?