लोकतन्त्र तभी परीक्षा पर खरा उतरता है जब संसद में सड़क की आवाज सुनाई दे और सड़क पर संसद की प्रतिध्वनि गूंजे। इस दुतरफा संवाद को इकतरफा बनाने की कोई भी कोशिश इसलिए कामयाब नहीं हो सकती क्योंकि संसद को ताकत सड़क (आम लोग) देते हैं और लोगों को शक्ति संसद देती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में कमजोर आय वर्ग के लोगों के लिए किया गया दस प्रतिशत आरक्षण है। इस बाबत जो संविधान संशोधन सरकार ने संसद के दोनों सदनों में बहुमत से पारित किया उसमें यह अधिकार कानूनी रूप से देने का नुक्ता हटा कर किया।

इस संशोधन के बाद सरकार शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आदेश जारी करके आरक्षण को लागू करेगी। अब देखना है कि यह किस तरह लागू होगा और इसके क्या प​िरणाम निकलते हैं क्योंकि संविधान में केवल सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के लिए ही विशेष प्रावधान करने का अधिकार है। जाहिर तौर पर जब 1990 में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण किया गया था तो सरकार ने संविधान की अनुसूचि 15 व 16 से अधिकार लेते हुए अधिसूचना जारी कर दी थी। इन दोनों संवैधानिक सूचियों के अनुसार आरक्षण की वजह नौकरियों में इन वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व न होना रहा।

कमजोर आय वर्ग को आरक्षण देने के लिए सरकार ने इन्हीं दोनों अनुसूचियों में संशोधन किया है और कमजोर आय वर्ग को इसमें जोड़ दिया है। इसके जुड़ते ही पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए यह शर्त समाप्त हो जायेगी कि उनका नौकरियों में समुचित आरक्षण न होने की वजह से आरक्षण दिया गया था। नया संविधान संशोधन उन्हें कमजोर आय वर्ग के लोगों के बराबर लाकर खड़ा कर देगा जिसमें वार्षिक आय मुख्य पैमाना होगा। कमजोर आय वर्गों के लिए आरक्षण का फैसला सरकार ने दो दिन पहले लिया और उसे संसद के दोनों सदनों में दो दिन में ही पारित भी करा लिया।

जिस दिन लोकसभा में 8 जनवरी को यह संशोधन पारित किया गया उसी दिन संसद में सरकार ने प्रश्नकाल में पूछे गये इस सवाल का यह जवाब दिया था कि सरकार का कमजोर आय वर्ग के आधार पर आरक्षण लागू करने का कोई इरादा नहीं है। यह मुद्दा राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता श्री अहमद पटेल ने 9 जनवरी को इसी संशोधन विधेयक पर चल रही चर्चा के दौरान उठाया था। प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि कांग्रेस पार्टी ने क्या सोच कर 2014 के अपने घोषणापत्र में कमजोर आय वर्ग के लोगों को आरक्षण देने का वादा किया था? इस पार्टी के दिमाग में कौन सा फार्मूला था जिससे यह कमजोर आय वर्ग के लोगों को आरक्षण प्रदान करती? यदि गौर से देखा जाये तो इन सब पहेलीनुमा सवालों का जवाब समाजवादी चिन्तक डा. राम मनोहर लोहिया के उस फलसफे में छिपा हुआ है जिसे वह अपनी हर जनसभा में जोर देकर कहते थे कि ‘‘राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो सन्तान-टाटा या बिड़ला का छौना सबकी शिक्षा एक समान।”

एक समय ऐसा भी आया था जब 1964 के शुरू में डा. लोहिया और पं. जवाहर लाल नेहरू के बीच इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श भी हुआ था परन्तु डा. लोहिया स्वयं इस मत के थे कि सबसे पहले पिछड़ी जातियों के बच्चों को आर्थिक मदद देकर शिक्षा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए और उनका प्रतिनिधित्व संवैधानिक पदों तक पर बढ़ाया जाना चाहिए, खासकर संसद व विधानसभाओं में इन जातियों के लोगों को अधिकाधिक पहुंचाने के प्रयास किये जाने चाहिएं परन्तु मई 1964 में नेहरू जी की मृत्यु हो जाने पर देश की राजनीति में ऐसी उथल-पुथल हुई कि पाकिस्तान से भारत को युद्ध करना पड़ा और उसके बाद आये आर्थिक संकट से इन्दिरा जी को जूझना पड़ा और इसके बाद अपनी ही पार्टी कांग्रेस में विघटन का बिगुल बजाना पड़ा और इसके तत्काल बाद फिर से बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में सहयोग करना पड़ा। इसके बाद इन्दिरा जी को हटाने के लिए समग्र क्रान्ति के नाम पर जेपी आन्दोलन चला और इमरजेंसी लगी और 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने पर दो साल में ही बिखर गई मगर इसी तेज घटनाक्रम के चलते जनसंघ के नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने नारा दिया था कि ‘‘वोट हमारा, राज तुम्हारा-नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।’’

वास्तव में यह और कुछ नहीं बल्कि समाज के जाति बन्धन को तोड़ते हुए कमजोर वर्गों की शासन में उनकी आबादी के अनुसार हिस्सेदारी की मांग थी। यह आवाज सड़क से उठी मगर वह संसद तक प्रभावी रूप में नहीं पहुंची जिसकी जिम्मेदार स्वयं तत्कालीन राजनैतिक पार्टियां भी थीं और देश जेपी के समग्र क्रान्ति आन्दोलन में उलझ कर रह गया जबकि इसका लक्ष्य मात्र कांग्रेस के एकछत्र राज को तोड़ना था जबकि इसकी चिंगारी गुजरात के छात्र आन्दोलन से ही उठी थी और हकीकत यह भी है कि यदि इमरजेंसी उठने के बाद 1977 में स्व. जगजीवन राम इन्दिरा जी की सरकार छोड़कर स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा के साथ न आते तो इस साल हुए लोकसभा चुनावों में उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया भी न हुआ होता। तब पहली बार दलितों ने कांग्रेस का साथ छोड़ा था, जबकि समूचे दक्षिण भारत में इसका जनाधार मजबूती से अपनी जगह खड़ा रहा था।

इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि 1986 से शुरू हुए राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन का मुकाबला करने के लिए 1990 में लागू मंडल आयोग ने जहां आर्थिक आधार की तार्किकता को समाप्त किया वहीं 1991 से स्व. पी.वी. नरसिम्हा राव द्वारा चलाये गये आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया ने इसे सतह पर लाकर रखना शुरू किया कि इसके तहत शिक्षा का निजीकरण जमकर इस तरह हुआ कि स्तरीय प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा पर केवल अमीर लोगों का ही एकाधिकार होता चला गया। पिछड़ों को मिले आरक्षण का लाभ भी केवल इस वर्ग के सम्पन्न लोगों को ही मिलने लगा। यह ऐसी विषम परिस्थिति है जिसका हल निकालने के लिए हमें सबसे पहले ‘कमजोर आय वर्ग आयोग’ का गठन करके समस्या की जड़ तक पहुंचना चाहिए था। संसद में कामकाज तो सड़क की हकीकत को रखकर ही लोकतन्त्र में होता है।