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कांग्रेस की दुविधा और भारत!

हाल के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की भारी पराजय के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि देश के सबसे पुराने इस राजनैतिक दल का भविष्य क्या होगा? यह प्रश्न पार्टी के नेतृत्व से भी जुड़ा हुआ है। लगातार पांच वर्ष विपक्ष में रहने के बावजूद यदि इस पार्टी का नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली प्रदर्शन करने में विफल रहा है तो उस पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है। इसे देखते हुए श्री राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश हैरान करने वाली नहीं है। वह उत्तर प्रदेश के अमेठी क्षेत्र से चुनाव हार गये परन्तु केरल के वायनाड से विजयी रहे। 

उनका यह फैसला बुिद्धमत्तापूर्ण कहा जायेगा। देश के 18 राज्यों से कांग्रेस पार्टी का यदि एक भी प्रत्याशी जीत कर लोकसभा में नहीं आ सका तो इसका सीधा मतलब यह निकाला जा सकता है कि कांग्रेस की वह विरासत लुप्त हो रही है जो इस देश की मिट्टी में स्वतःस्फूर्त रूप से एेतिहासिक कारणों से घुली हुई है और पार्टी इस ‘विरासत’ को जीवन्त रखने के लिए उस ‘नेहरू-गांधी’ परिवार की ‘विरासत’ का छाता ताने रखती थी जिसका योगदान न केवल आजादी की लड़ाई में बल्कि स्वतन्त्र भारत के विकास में भी महत्वपूर्ण रहा है। 

दरअसल भारत का 20वीं सदी का पूरा इतिहास कांग्रेस का इतिहास ही रहा है परन्तु 21वीं सदी का भारत दुनिया का सबसे युवा भारत माना जाता है जिसमें आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी भी अब बूढ़ी हो चली है। इस युवा भारत में कांग्रेस की विरासत को जीवन्त रखने का दायित्व एक परिवार पर छोड़कर पार्टी स्वयं को तब तक जीवन्त नहीं बना सकती जब तक कि वह युवा भारत की बदलती अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को आत्मसात न करे। यह आकांक्षा ‘पारिवारिक विरासत’ की जगह ‘वैचारिक विरासत’ की है।

बेशक कांग्रेस पार्टी एक ‘विचार’ है मगर श्री राहुल गांधी क्या इस विचार को जमीन पर उतारने में सफल हो सके हैं? उलटे उन्होंने तात्कालिक राजनैतिक लाभ के लिए जनसंघ या भाजपा के विचार को ही अपना लिया जिसे राजनैतिक पंडित ‘उदार हिन्दुत्व’ कहते हैं। इसे यदि हम राजनैतिक अवसरवाद न भी कहें तो भी ‘नतमस्तकवाद’ कहेंगे जिसके अपनाते ही कांग्रेस का ‘विचार’ क्षीण पड़ जाता है परन्तु इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी को लोकसभा चुनावों में कुल 61 करोड़ मतदाताओं में से 12 करोड़ से अधिक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त हुआ है जो लगभग 25 प्रतिशत के करीब बैठता है। अर्थात प्रत्येक चार मतदाताओं में एक ने कांग्रेस को वोट दिया है, जबकि भाजपा को 37 प्रतिशत के करीब मत मिले हैं अर्थात प्रत्येक चार मतदाताओं में भाजपा को लगभग डेढ़ मतदाता ने वोट दिया है। यह बदलते भारत की स्पष्ट तस्वीर है कि भाजपा वह स्थान ले रही है जो कांग्रेस का था।

 

1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को इतने ही प्रतिशत मत मिले थे और वह लोकसभा में पूर्ण बहुमत से 20 सीटें ज्यादा जीत पाई थी। वह कांग्रेस का पराभव काल था और 2019 भाजपा का उद्भव काल है। इसके बाद 1971 के चुनावों में वह कमाल न हो पाता यदि स्व. इन्दिरा गांधी अपनी पार्टी का जड़ से कायाकल्प न करतीं और स्वयं को पं. नेहरू के ऊर्जावान वारिस के रूप में स्थापित न करतीं। 2019 के चुनाव श्री राहुल गांधी के समक्ष स्वर्ण अवसर के रूप में आये थे क्योंकि इससे पहले उत्तर भारत के तीन प्रमुख राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में उनकी पार्टी को सम्मानजनक विजय मिली थी परन्तु इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में वह राष्ट्रीय अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी पार्टी की राजनैतिक दिशा तय नहीं कर सके और शुरूआत में ही कांग्रेस के सशक्त विकल्प बनने की संभावनाओं के साथ तब समझौता कर गये जब भाजपा का साथ छोड़ने वाली तेलगू देशम पार्टी के साथ उन्होंने गठबन्धन किया। 

प्रादेशिक राजनैतिक समीकरणों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाकर कांग्रेस पार्टी ने अपने विशाल कद को स्वयं ही इस तरह बौना कर लिया कि लगभग सभी क्षेत्रीय दलों ने इसे अपना द्वारपाल समझा। चुनाव लोकसभा के हो रहे थे न कि राज्य विधानसभाओं के जिनमें क्षेत्रीय आकांक्षाओं का विशिष्ट महत्व होता है। इन चुनावों में समीकरण भाजपा के विरोध में कांग्रेस के साथ खड़े होने का चाहिए था न कि कांग्रेस का क्षेत्रीय दलों के साथ खड़े होने का। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी को 25 प्रतिशत मत मिलने का अर्थ है कि देश में मतदाताओं की इच्छा किसी ठोस विकल्प की है।

 

यह विकल्प श्री राहुल गांधी का नेतृत्व देने में यदि सक्षम नहीं हो पा रहा है तो पार्टी को अपना आत्मावलोचन करना चाहिए। यह राजनैतिक अवधारणा युवा भारत में पैठ बना चुकी है कि कांग्रेस केवल नेहरू-गांधी परिवार की पार्टी है जबकि चुनावों में पार्टी को मिला समर्थन इसकी गवाही नहीं देता है। केरल और तमिलनाडु में कांग्रेस को जो समर्थन मिला है वह परिवार की वजह से नहीं बल्कि इस पार्टी की मूल विचारधारा की वजह से मिला है। यही स्थिति पंजाब में भी रही जहां कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने भाजपा का विचारधारा के स्तर पर ही मुकाबला किया परन्तु शेष भारत में यह कार्य क्यों नहीं हो सका? विशेषकर जहां भाजपा ने अपनी विचारधारा के बूते पर ही कांग्रेस को अपना पिछलग्गू साबित कर दिया। 

चुनावों में राजनैतिक नेतृत्व की सफलता विरोधी विमर्श के समानान्तर धारदार विमर्श खड़ा करने पर निर्भर करती है और जनता के दिल में उठने वाले सवालों की प्रतिध्वनि से निर्देशित होती है। इसे समझने में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी का कोई मुकाबला फिलहाल नजर नहीं आता है। यही वजह रही कि उन्होंने कांग्रेस के हर विमर्श को उठने से पहले ही उसका तोड़ पेश कर दिया और हर सीट पर खड़े भाजपा प्रत्याशी के चेहरे पर अपना चेहरा लगा कर गरीबों के कल्याण को अपना विमर्श बना डाला। जाहिर है कि निहत्थी हुई कांग्रेस को चुनावों में यदि 25 प्रतिशत मत मिले हैं तो इसका कारण राहुल का नेतृत्व या परिवार का आकर्षण नहीं है बल्कि कमजोर पड़ती इस पार्टी की बची-खुची पुरानी साख है। अतः इस साख को मजबूत बनाने के लिए परिवार की नहीं बल्कि जनता की ही जरूरत है।