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संपादकीय

तीन राज्यों की कांग्रेस सरकारें

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हाल ही में उत्तर भारत के जिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे उन सभी में कांग्रेस पार्टी की सरकारों का गठन हो चुका है। आज मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में यहां के मुख्यमन्त्रियों क्रमशः सर्वश्री कमलनाथ व भूपेश बघेल ने अपनी-अपनी मन्त्रिपरिषद का गठन भी कर लिया और नये मन्त्रियों को राज्यपाल श्रीमती आनन्दीबेन पटेल ने पद व गोपनीयता की शपथ दिला दी। राजस्थान में यह कार्य दो दिन पहले हो चुका था मगर इन तीनों शपथ ग्रहण समारोहों में एक बात सामान्य रही कि आम कांग्रेसी कार्यकर्ता अपने-अपने अंचल के नेताओं के हक में व्यग्रता दिखाते नजर आये। लोकतन्त्र में इसे असामान्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि किसी भी राजनैतिक दल के संगठनात्मक ढांचे में हर क्षेत्र में लोकप्रिय नेताओं का उभरना उस पार्टी के आन्तरिक लोकतन्त्र की ताकत ही कहा जायेगा किन्तु जब पूरे राज्य की बागडोर मुख्यमन्त्री के रूप में किसी नेता को दे दी जाती है तो वह समूचे अंचलों की शक्ति के समुच्य के रूप में इस प्रकार स्थापित होती है ​िक उसके साये में सभी उप शक्तियां स्वयं को समाहित करके पार्टी की एकल ताकत के रूप में उभरें।

राजस्थान की राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप इस राज्य में कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने उपमुख्यमन्त्री का पद सृजित करना जरूरी समझा। इसकी वजह यह कही जा सकती है कि युवा नेता श्री सचिन पायलट ने इस राज्य में बुरी तरह निराशा से भरी कांग्रेस पार्टी के संगठन को पुनः अपने पैरों पर खड़ा किया और लगभग हर उपचुनाव जीतते हुए भाजपा की राज्य सरकार को हारने के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया परन्तु सत्ता मंे आने पर जिम्मेदारियों का दायरा पूरी तरह बदल जाता है जिसकी वजह से जोशीले श्री सचिन पायलट को फिलहाल उपमुख्यमन्त्री पद ही दिया गया और उन्हें जोश के साथ हुकूमत चलाने वाले श्री अशोक गहलोत की शागिर्दी में काम करने की छूट दी गई परन्तु मध्य प्रदेश में हालात पूरी तरह बदले हुए थे। इस राज्य के प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर जब श्री कमलनाथ के हाथ में दी गई थी तो यह पता ही नहीं चल रहा था कि इस राज्य में कौन से कांग्रेसी गुट के हाथ में भाजपा को परास्त करने की जिम्मेदारी दी जाये।

समस्या यह आ रही थी कि ज्योतिरादित्य सिन्धिया के गुट से लेकर सुभाष यादव व दिग्विजय सिंह के खेमों में बंटी कांग्रेस को किस तरह इकट्ठा करके एक संगठित शक्ति के रूप में खड़ा किया जाये जिससे वह भाजपा की शिवराज सिंह सरकार को कड़ी चुनौती दे सके। अतः इन उलझे हुए सवालों के जवाब में श्री कमलनाथ को पेश किया गया जिनकी छवि किसी निर्गुट नेता की थी और उनका कद भी शिवराज सिंह से बहुत ऊंचा था। उनके प्रदेश अध्यक्ष बनते ही श्री दिग्विजय सिंह ने इसका स्वागत किया और लगातार दस वर्ष तक मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री का अनुभव श्री कमलनाथ से सांझा करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। इसकी असली वजह यह थी कि श्री सिंह ने राघोगढ़ नगर पालिका से अपना राजनीतिक जीवन शुरू करके जमीनी राजनीति के बदलते मौसमों को जमकर झेला था और वह समझ गये थे कि मध्य प्रदेश के वर्तमान मौसम में केवल कमलनाथ का कमल ही खिल सकता है क्योंकि उनमें सबको साथ लेकर चलने की फनकारी बेमिसाल है परन्तु यही बात ग्वालियर रियासत के पूर्व महाराज के वंशज ज्योतिरादित्य सिन्धिया नहीं समझ सके और वह राज्य में कांग्रेस के चुनाव जीतने के बाद मुख्यमन्त्री बनने का सपना महज इसलिए पाल बैठे कि वह युवा हैं और उनकी पूर्व रियासत की विधानसभा सीटों पर उनका दबदबा आज भी चलता है।

इसका मतलब यही निकलता है कि इस क्षेत्र के पूर्व शासक होने की वजह से वह नेता हैं जिसका कारण यहां की जनता के मन से दास भाव का अभी तक समाप्त न होना है। यह तथ्य पूरी तरह लोकतन्त्र विरोधी है और इसके आधार पर वह स्वयं को सत्ता का समानान्तर केन्द्र बनाने की भूल नहीं कर सकते। एेसा होते ही कांग्रेस पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लोकतन्त्र की मर्यादाओं का पालन करना कांग्रेस पार्टी का आधारभूत सिद्धान्त इस तरह रहा है कि पं. जवाहर लाल नेहरू तक ने अपनी पार्टी कांग्रेस को मठाधीश बन बैठे लोगों से बचाने के लिए स्व. कामराज जैसे जन अपेक्षाओं के प्रतीक बने नेता की शरण ली थी। पार्टी के आन्तरिक लोकतन्त्र में कोलाहल की छूट दी जा सकती है परन्तु सार्वजनिक स्तर पर पूरी पार्टी एक मजबूत संगठन के रूप में ही दिखाई देनी चाहिए।

जब काेई विधायक मन्त्री बनता है तो वह मुख्यमन्त्री की पसन्द होता है और उसकी पसन्द अपनी पार्टी के आलाकमान द्वारा दिये गये निर्देशों के तहत होती है। राज्य का शासन चलाने के लिए मुख्यमन्त्री का चयन उसकी पार्टी का आलाकमान चुने गये विधायकों की राय लेकर जब करता है तो स्पष्ट सन्देश देता है कि शेष सभी मठाधीश होश में आ जायें। राहुल गांधी ने तीनों राज्यों के बारे में इसी रणनीति के तहत फैसला किया है। यह फैसला आने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए न किया गया हो इसकी कोई वजह नहीं है क्योंकि इन चुनावों के लिये बचे तीन महीनों के भीतर नये मुख्यमन्त्रियों को अपनी पार्टी के प्रति लोगों में वह विश्वास पैदा करना है जिससे यह जाहिर हो सके कि मुल्क की मुसीबतों को भी खत्म करने का फार्मूला उसके पास है। इसी वजह से राजनीति को विज्ञान कहा जाता है और कोई नहीं जानता कि इन तीन महीनों में कैसे-कैसे तीरों की बारिश भाजपा और कांग्रेस के बीच होगी और कौन-कौन सी पार्टियां इन तीरों की बौछार से बचने के नये-नये ठिकाने खोजेंगी?