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करतारपुर साहिब के बहाने साजिश

करतारपुर साहिब कारीडोर​ (उपमार्ग) को लेकर पाकिस्तान शुरू से ही जिस तरह की राजनीति कर रहा है उससे उसकी खुद की खस्ता हालत का पता भी चलता है। एक तरफ जहां वह भारत से जाने वाले तीर्थ यात्रियों से ‘जजिया’ वसूलने की जिद पर अड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ अपनी छवि को बहुत उदार दिखाने के लिए इसने पासपोर्ट लाने की शर्त हटाने की घोषणा बड़े ही तैश में की और वह भी किसी और ने नहीं बल्कि खुद इसके वजीर-ए-आजम इमरान खान ने ट्वीटर पर की। 

पाकिस्तान की सहृदयता पर भारत को कोई आश्चर्य नहीं हुआ और विदेश मन्त्रालय ने कहा कि भारत अपने यात्रियों के लिए पासपोर्ट की शर्त को नहीं हटायेगा। दरअसल क्या इमरान खान अपने देश की सीमाओं में प्रवेश करने वाले भारतीयों के लिए नियमों को ढीला करके का नाटक कर रहे थे ? इसके पीछे पाकिस्तान की सेना की क्या कोई खास मंशा छिपी हुई थी? इसका खुलासा भारत की गुप्तचर एजेंसियों की इस रिपोर्ट से हो गया जो उन्होंने पाकिस्तान करतारपुर साहिब के बहाने आतंकवादियों की घुसपैठ कराने की योजना बना रहा है। 

पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का इस मामले में शुरू से ही स्पष्ट मत रहा है कि पाकिस्तान की नीयत पर आंख मीच पर किसी भी हालत में भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने करतारपुर साहिब गलियारे के निर्माण के समय से ही लगातार चेतावनी दी है कि पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई इसका उपयोग  पंजाब में आतंकवाद  बढ़ाने के लिए कर सकती है। अतः हमें बहुत चौकन्ना रहने की जरूरत है और सुरक्षा प्रणाली में किसी भी प्रकार की ढील नहीं दी जानी चाहिए। 

यह सोचने वाली बात है कि जो पाकिस्तान भारत के लाख कहने के बावजूद यात्रियों से जजिया रूप में 20 डालर प्रति व्यक्ति शुल्क वसूलना नहीं छोड़ना चाहता, उसी का  वजीर-ए-आजम खुद ऐलान करता है कि यात्रियों को पासपोर्ट लाने की जरूरत नहीं है और वे अपना कोई भी अन्य पहचान पत्र लाकर यात्रा कर सकते हैं। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का विदेश मन्त्रालय और रक्षा मन्त्रालय पर्दे के पीछे से इसकी फौज के जनरल संभालते हैं और अपनी सहूलियत के हिसाब से वे अपने प्रधानमन्त्री से यथानुरूप घोषणाएं करवाते रहते हैं। 

पासपोर्ट की शर्त को हटाने का फैसला पाकिस्तान की फौज का ही था जिसका तुरन्त जवाब भारत की तरफ से दे दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि जिस पाकिस्तान ने अपनी जेल में जासूस बता कर कैद किये गये भारतीय कुलभूषण जाधव की पत्नी के वहां जाने पर उसकी  बिन्दी से लेकर सैंडिलों तक की जांच की हो वह किस प्रकार करतारपुर साहिब के यात्रियों के लिए इतनी फराखदिली दिखा रहा है? उसकी इस मंशा का पर्दाफाश भी हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने समय रहते कर दिया और बताया कि किस प्रकार करतारपुर साहिब के निकट ही आतंकवादी दस्ते के लोग खालिस्तान समर्थकों के साथ देखे गये। 

इमरान खान ने तो यह घोषणा भी की कि 9 नवम्बर और 12 नवम्बर को दरबारपुर साहिब गुरुद्वारे आने वाले भारतीयों से 20 डालर की फीस भी नहीं वसूली जायेगी। इस दरियादिली का क्या मलतलब हो सकता है जब यह टैक्स बाकायदा लागू रहेगा। इसके साथ ही यह भी एेलान किया गया था कि दरबार साहब आने के लिए दस दिन पहले से ही पंजीकरण कराना जरूरी नहीं होगा। जाहिर यह कार्य भारत की सरकार और इसके विदेश मन्त्रालय का है कि वह अपने नागरिकों के लिए किस प्रकार के यात्रा नियमों को लागू करता है जिससे पाकिस्तान जाने औऱ आने वाले लोगों का पूरा हिसाब बिना किसी भूल-चूक के रखा जा सके। 

करतारपुर में दरबार साहिब गुरुद्वारा अन्तर्राष्ट्रीय भारत-पाक सीमा से केवल चार किलोमीटर दूर है। अतः भारत के सुरक्षा सैनिकों को जरूरत से ज्यादा चौकन्ना रहना पड़ेगा। मगर यह हकीकत एक तीर सा हर भारतीय के सीने में चुभोती रहती है कि 1947 में यह कैसा बंटवारा हुआ जिसने गुरु नानकदेव जी महाराज के पंजाब को इस तरह बांटा कि उनके जन्म स्थान से लेकर उनके निर्वाण स्थान पाकिस्तान के कब्जे में चले गये। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि जिन शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेज सल्तनत को अपने पैरों पर झुका कर आगरा से लेकर काबुल तक शासन किया उन्हीं की सल्तनत को भारत से जाते-जाते अंग्रेज दो मुल्कों में तकसीम करके चले गये। 

लाहौर स्थित महाराजा साहब का किला इस बात की गवाही देता है कि पाकिस्तान के नाम से 72 साल पहले जो मुल्क तामीर किया गया वह किराये की जमीन पर ही खड़ा हुआ है जिसे उसकी नामुराद फौज मजहब के नाम पर महफूज रखना चाहती है। मगर सितम यह है कि हमारे पंजाब में ही आज का पाकिस्तान फिर से खालिस्तानी आन्दोलन को पनपाना चाहता है और इसकी मुहीम लन्दन में बैठे चन्द पाकिस्तानियों की मार्फत छेड़ना चाहता है। हम जानते हैं कि कश्मीर में पाकिस्तान क्या खेल खेल रहा है और वहां उसने जन्नत की वादी को जहन्नुम में बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 

अतः जज्बाती होने की जरा भी जरूरत नहीं है और हकीकत की जमीन पर उतर कर ही चीजों को देखना होगा। यहां की सरकार ने जिस तरह करतारपुर साहिब कारीडोर के उद्घाटन समारोह में पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह को शिरकत करने की दावत दी थी उसी से इसकी नीयत पर शक हो गया था क्योंकि लगातार दस साल तक भारत का प्रधानमन्त्री रहने के बावजूद पाकिस्तान के हुक्मरानों ने उन्हें उस पाकिस्तान में अपने जन्म स्थान का दौरा तक नहीं करने दिया था अतः पाकिस्तान की करतारपुर साहिब के बहाने रची जाने वाली साजिश से हमें सावधान रहना होगा।