संसद सत्र को लेकर विवाद ?


गुजरात चुनावों की वजह से संसद का शीतकालीन सत्र टाल कर केन्द्र की भाजपा सरकार ने स्वयं ही आलोचना को निमन्त्रण दिया है। इसे विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी सत्ताधारी दल की कमजोरी के रूप में दिखाने का प्रयास कर रही है। हमने जिस लोकतान्त्रिक प्रणाली को अपनाया है उसमें संसद के सर्वोच्च होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं होना चाहिए क्योंकि केवल इसी में सत्ता पर काबिज सरकार की जवाब-तलबी की जा सकती है। यह जवाबदेही जनता के उन चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति होती है जिन्हें आम जनता अपने वोट की ताकत पर चुनकर लोकसभा में भेजती है। यह बेवजह नहीं है कि हमारे संविधान में केवल लोकसभा को ही किसी सरकार को बनाने या हटाने का अधिकार दिया गया है जबकि दूसरे सदन राज्यसभा, जिसे उच्च सदन कहा जाता है, को केवल सरकार की नीतियों की समालोचना करने का अधिकार ही प्राप्त है। अतः किसी भी चुनी हुई सरकार का यह पहला कर्तव्य बनता है कि वह लोकसभा को अपने कामकाज का पूरा हिसाब-किताब दे।

सवाल यह नहीं होता है कि सरकार में विपक्ष की आलाेचना सहने की क्षमता है या नहीं बल्कि असली सवाल यह होता है कि उसमें पांच वर्ष बाद होने वाले चुनावों से पूर्व ही बीच-बीच में जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कूव्वत है या नहीं। यह कार्य संसद का सामना किये बिना किसी भी बड़ी से बड़ी जनसभा का आयोजन करके नहीं किया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि संसद में सरकार की तरफ से जो भी जवाब दिया जायेगा वह पुख्ता तौर पर विश्वसनीय होगा, उसमें थोड़ा भी घालमेल होने पर सरकार के खिलाफ देश को गुमराह करने के लिए मानहानि का प्रस्ताव आ जायेगा जबकि जनसभाओं में किसी भी पार्टी का कोई भी नेता तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है। विपक्ष का मुख्य आरोप है कि सरकार नोटबन्दी और जीएसटी लागू होने से हुए परिणामों के डर से संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने से भाग रही है। जाहिर है कि नोटबन्दी के परिणामों की सबूतों के साथ तसदीक केवल संसद के पटल पर ही हो सकती है क्योंकि सरकार जो भी आंकड़े पेश करेगी वे पुख्ता सबूतों के साथ ही होंगे। यह तर्क लोकतन्त्र में वाजिब कहा जायेगा कि जब पिछले वर्ष 8 नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा प्रधानमन्त्री ने की थी तो उसके एक सप्ताह बाद ही आयोजित संसद के सत्र में इस मुद्दे पर उनके बयान की मांग की गई थी मगर काफी शोर-शराबे के बाद ही यह काम हो सका था।

संसद में नोटबन्दी के बाद अपने नोट बदलवाने के लिए लाइनों में लगे 100 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए विपक्षी दल शोक प्रस्ताव भी लाना चाहते थे, यह भी संभव नहीं हो पाया था। इसके साथ ही जीएसटी लागू करने के लिए जब सरकार ने संसद में आधी रात को एक भव्य समारोह का आयोजन किया था तो भी कांग्रेस पार्टी ने इसका बहिष्कार किया था। दोनों ही मुद्दों पर विपक्ष आरोप लगा रहा है कि सरकार के इन कदमों से देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है और सकल विकास वृद्धि दर में दो प्रतिशत की कमी आने के साथ ही 15 लाख लोग बेरोजगार हो गये हैं।

ये आंकड़े सिर्फ मोटे–मोटे आकलन पर ही हवा में तैर रहे हैं जिसकी वजह से आम आदमी गफलत में है। सरकार विपक्ष के इन आराेपों का मुकाबला अपने गोल-मोल विज्ञापन अभियान से देने की कोशिश कर रही है मगर इससे भ्रम का वातावरण ही बन रहा है परन्तु आर्थिक मोर्चे पर उभरे इन सवालों को दरकिनार करने के लिए सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने एक फिल्म ‘पद्मावती’ पर अनावश्यक विवाद को तूल दे दिया है और इस पार्टी द्वारा शासित विभिन्न राज्यों के मुख्यमन्त्रियों ने इसके खिलाफ मोर्चा जैसा खोल दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने तो पद्मावती को ‘राष्ट्रमाता’ तक की उपाधि से अलंकृत कर डाला है परन्तु गुजरात चुनावों को देखते हुए ही विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी अपने शासन के पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को भी इस विवाद में उतार दिया है और उन्होंने भी फिल्म की आलोचना कर डाली है मगर इससे इतना स्पष्ट हो ही गया है कि पद्मावती और गुजरात चुनाव गुत्थमगुत्था हो गये हैं। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि पद्मावती विवाद संसद का सत्र चालू रहते भी उठाया जा सकता था? मगर यह फर्क जरूर रहता कि उस परिस्थिति में सरकार को अपनी नीति के बारे मे दो-टूक घोषणा करनी पड़ती।

चुनाव केन्द्रित लोकतन्त्र में एेसा होना कोई नई बात नहीं कही जा सकती। कांग्रेस शासन के दौरान भी एेसे वाकये कई बार हुए हैं। संसद के सत्र के चलते पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने अपनी पहली सरकार के दौरान तो विदेश यात्राओं का नया रिकार्ड बना डाला था। 2008 में अमरीका के साथ परमाणु समझौता करने का फैसला तो उन्होंने विमान में उड़ते हुए ही प्रारम्भिक स्तर पर तब लिया था जब वह फ्रांस जा रहे थे परन्तु एक हिम्मत जरूर दिखाई थी कि अपने इस फैसले पर संसद की मुहर लगाने के लिए उन्होंने जुलाई महीने में लोकसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया था। इसका संज्ञान आम जनता ने न लिया हो एेसा नहीं है। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मतदाताओं ने खुलकर समर्थन दिया। अतः यह सोच लेना कि संसद की उपेक्षा करके लोकतन्त्र में लोकरंजक शासन चलाया जा सकता है, असंभव है क्योंकि लोकतन्त्र में कोई भी चुनाव अन्तिम चुनाव नहीं हो सकता। क्या यह भूला जा सकता है कि इन्दिरा गांधी जैसी शक्तिशाली और लोकप्रिय प्रधानमन्त्री के रहते ही आन्ध्र प्रदेश में जब 1983 में विधानसभा चुनाव हुए थे तो स्व. एनटी रामाराव की पार्टी तेलगू देशम की धुआं उड़ाती विजय हुई थी मगर उसके बाद कई बार कांग्रेस इस राज्य में विजयी हुई।