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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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कोरोना : संयम से समाप्त कर देंगे

कोरोना वायरस ने जिस तरह धरती ग्रह की समूची मानव जाति को अपनी गिरफ्त में लिया है उसके मद्देनजर सम्पूर्ण भारत का एकजुट होकर इसका मुकाबला करना परम धर्म है और इस युद्ध को लड़ने के लिए प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में समस्त राजनैतिक जगत को सभी मतभेद समाप्त करके गोलबन्द हो जाना चाहिए। 

यह लड़ाई मानव जाति का अस्तित्व बचाने से कमतर इसलिए नहीं है क्योंकि इस वायरस से ग्रस्त एक व्यक्ति कम से कम एक लाख लोगों को संक्रमण युक्त बनाने की क्षमता रखता है। अतः इस युद्ध में हमारा एक ही सिपहसालार है जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है। 

रविवार को जनता कर्फ्यू सफल रहा है और आम जनता ने कोरोना की भयावहता को पहचाना है। यह ऐसा छिपा हुआ दुश्मन है जो सामान्य नागरिकों पर हमला करके रक्तबीज की तरह बीमार लोगों की संख्या बढ़ा देता है। अतः इस लड़ाई में प्रत्येक नागरिक ही योद्धा है और उसे अपनी सुरक्षा के साथ ही पूरे समाज की सुरक्षा भी करनी है। यह सुरक्षा वह स्वयं को एकान्तवास में रख कर ही कर सकता है जिसे सामाजिक दूरी बनाना या ‘सोशल डिसटेंसिंग’  कहा जा रहा है। 

ऐसा करने के लिए जाहिर तौर पर प्रशासनिक कदमों की भी जरूरत होगी अर्थात सामाजिक गतिविधियों को नियन्त्रित करने के लिए जरूरी कदम उठाने पड़ेंगे जिनमें सबसे प्रमुख ‘आवागमन’ गतिविधियों को जाम जैसा कर देना है। इसका प्रभाव आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ना लाजिमी होगा जिनकी तरफ सरकार को अभी से आपातकाल कार्य योजना बनानी पड़ेगी क्योंकि केवल एक दिन के जनता कर्फ्यू से वायरस पर नियन्त्रण पाना मुमकिन नहीं है। 

इसी वजह से भारत के कई राज्यों में लाक डाउन (हरकत बन्द) लागू कर दिया गया है जिनमें पंजाब से लेकर राजस्थान व ओडिशा आदि हैं। इन राज्यों की पहल का अनुसरण दूसरे राज्यों को भी जल्दी करना पड़ सकता है, खासकर उन राज्यों को जहां कोरोना वायरस से ग्रस्त व्यक्ति पाये गये हैं। अतः आज से यात्री रेलगाडि़यों को रद्द करके रेलवे मन्त्रालय ने सन्देश दे दिया है कि फिलहाल भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाली आबादी को उन्हीं राज्यों तक महदूद करने की जरूरत है मगर यह लड़ाई ऐसी नहीं है जिसे सरकार अपने स्तर पर लड़ सके। 

इसके लिए सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों के सरपराहों को भी आगे आना पड़ेगा। इसकी पहल योग गुरु बाबा राम देव ने कर दी है और उन्होंने कोरोना वायरस के खिलाफ शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के कई गुर आम जनता को दिये हैं विशेष कर बुजुर्गों के लिए उन्होंने एकान्त के समय में साधारण योग क्रियाएं करके अपने फेफड़े मजबूत बनाने के नुस्खे दिये हैं परन्तु इसके साथ ही उन्होंने कम से कम एक महीने तक एकान्तवास को आवश्यक बताया है, प्रधानमन्त्री ने आह्वान किया था कि हमें ‘घबराने’ की जरूरत नहीं है बल्कि ‘सावधान’ रहने की जरूरत है और ‘संकल्प’ करके ‘संयम’ बरतने की आवश्यकता है। यह संकल्प सामाजिक विलगाव का है। 

यही वजह है कि सरकार ने रेलगाड़ियां बन्द कर दी हैं और बसों का आवागमन भी थम सा गया है। इस युद्ध की त्रासदी यह है कि कोरोना का वायरस दूसरे देशों से ‘आदमी’ के माध्यम से भारत आकर अन्य ‘आदमियों’ को अपना शिकार बना रहा है और विडम्बना यह है कि सिर्फ ‘आदमी’ ही इसका ‘तोड़’ है जिसे वह दूसरे ‘आदमी’ से दूरी बना कर पैदा कर सकता है। अतः यह लड़ाई संकल्प व संयम से ही लड़ी जा सकती है। 

इसलिए जरूरी है कि संयम को एक जन आन्दोलन में बदला जाये जिसमें धार्मिक नेताओं की भी अहम भूमिका है, जरूरी यह है कि सभी धर्मों के गुरुओं को आगे आकर लोगों से संयम बरतने की अपील करनी चाहिए और इस मुहीम को ही कौमी अन्दाज बख्शना चाहिए लेकिन इसके साथ ही जरूरी है कि यह मुहीम जिला स्तर पर पहुंचे जिससे लोगों में सब्र का इजाफा होता रहे और वे सामाजिक विलगाव को अपनी दिनचर्या  इस वायरस के समाप्त होने तक बना सकें। इसका असर आर्थिक मोर्चे पर जिस तरह होगा उससे निपटने की योजना भी बना ली जानी चाहिए। 

यह कार्य सरकार को ही करना होगा क्योंकि आगामी दो सप्ताह में ‘लाक डाउन’ जैसी स्थिति रहेगी। कमजोर आय वर्ग व दैनिक मजदूरी करने वालों के साथ ही लघु व छोटे उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों की आर्थिक मदद के लिए आवश्यक धन मुहैया करना सरकार का कर्त्तव्य बनता है। यह अजीब संकट का समय है जबकि निम्न आय वर्ग के लोगों को खुद को बचाने के लिए घरों में बैठना पड़ेगा। 

उनके परिवारों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी राज्य व केन्द्र सरकारों को लेनी होगी। अतः एक आर्थिक मदद के पैकेज की तैयारी हो जानी चाहिए मगर इस मुद्दे पर भी कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए और अपेक्षा की जानी चाहिए कि भारत का ‘लोक कल्याणकारी राज’ इस पर तवज्जो देगा और महसूस करेगा कि असामान्य समस्याओं का हल भी असामान्य तरीके से निकाला जाता है परन्तु समाज का धनवान तबका उन लोगों के हितों का ध्यान रखेगा जो उनके शहरी जीवन को सरल व सुगम्य बनाते हैं। (इसकी अपील प्रधानमन्त्री ने भी की थी) इस हल्की गर्मी के मौसम में भी आइसक्रीम खाने के शौकीन समृद्ध वर्ग के लोगों को यह विचार करना होगा कि सड़क पर अपना आइसक्रीम का ठेला न लगाने वाले व्यक्ति की हालत  कैसी होगी? लेकिन यह दरख्वास्त उन लोगों से भी है जो नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन आदि कर रहे हैं। 

उन्हें सबसे पहले यह सोचना होगा कि कोरोना उनके प्रदर्शन स्थलों को छोड़ कर आगे नहीं निकल जायेगा? उनका सैद्धान्तिक विरोध अपनी जगह हो सकता है मगर कोरोना से विरोध तो उन्हें भी बचाने के लिए है और इसका विरोध उन्हें भी करना पड़ेगा। कोरोना की दवा जब ‘अलहदगी’ है तो किस तरह किसी भी आन्दोलन या प्रदर्शन में आदमियों को इकट्ठा किया जा सकता है क्योंकि वक्त ने ‘अलहदगी’ को ही एक ‘आन्दोलन’ बना दिया है। यह अलहदगी दिलों की नहीं बल्कि जिस्मों की है और वह भी फौरी तौर पर दिलों से तो पूरे हिन्दोस्तानी एक ही रहेंगे। 

बस संयम से हमें फिर से घुलने-मिलने के लिए अलहदगी में रहना है और वह भी कुछ वक्त के लिए अपने-अपने घरों में, इसी वजह से शहरों के लोग शहरों में ही रुकें और गांव के लोग गांवों में ही।