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भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग

लोकतन्त्र की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि जब भी सत्ता के सिंहनाद में उसे प्रतिशोध के स्वर सुनाई पड़ते हैं तो सर्वप्रथम आम जनता ही उसकी प्रतिध्वनि बनकर न्याय की आवाज बुलन्द करती है। भारत की राजनीति में बदले की भावना से सत्ता के दुरुपयोग की जरा भी गुंजाइश इसलिए नहीं है क्योंकि स्वतन्त्र न्यायपालिका ऐसे किसी भी कारनामें को हवा में उड़ाने की क्षमता रखती है। मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा 2014 के लोकसभा चुनावों में बुरी तरह छाया हुआ था और लोगों का जनादेश भी इसके विरुद्ध था मगर यह भी सत्य है कि पिछली सरकार के दौरान जितने भी घोटाले हुए उन सभी की तसदीक न्यायपालिका के रास्ते से ही हुई। लोकतन्त्र में दूध का दूध और पानी का पानी करने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास ही है अत: मोदी सरकार जिस प्रकार एक के बाद एक विपक्षी नेताओं पर सीबीआई छापे डलवा रही है उन्हें अन्तत: न्यायपालिका की चौखट पर ही जाना होगा। बेशक राजनीतिक रूप से कांग्रेस या विपक्षी पार्टियों के नेता यह आरोप लगा सकते हैं कि भाजपा की सरकार बदले की भावना से पुरानी सरकार के प्रमुख नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रही है मगर कानून की नजर में उन्हें पाक-साफ होकर निकलना ही होगा। मोदी सरकार यदि भ्रष्टाचार से लडऩे की इच्छाशक्ति दिखा रही है तो लोकतन्त्र में इसकी मनाही नहीं की जा सकती परन्तु इस लड़ाई में निरपेक्ष भाव का होना बहुत जरूरी है। जिन 'पनामा पेपर' में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं व अन्य लोगों के खिलाफ कालाधन इकट्ठा करने के आरोप हैं उन पर भी त्वरित गति से कार्रवाई इसी इच्छाशक्ति के साथ नजर आनी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि पनामा पेपर में भाजपा के नेताओं के नाम हैं या कांग्रेस के बल्कि सवाल यह है कि भ्रष्टाचार करके धन किसने कमाया है।

जब हिमाचल प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्ति का मामला चल रहा है तो महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की भाजपा सरकारों में हुए भ्रष्टाचार के मामलों से आंखें कैसे फेरी जा सकती हैं। मनमोहन सरकार की पूर्व पर्यावरण मन्त्री श्रीमती जयन्ती नटराजन के खिलाफ सीबीआई छापे से सन्देश गया है कि मोदी सरकार भ्रष्टाचार के पुराने मामलों पर भी सख्त है परन्तु विपक्षी दल सवाल खड़ा कर रहे हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में डेढ़ वर्ष का समय रह जाने पर ही ऐसी कार्रवाई क्यों हो रही है। यदि सरकार के पास वन भूमि के खनन का पट्टा दिये जाने में अनियमितता बरतने के प्रमाण थे तो कार्रवाई में इतनी देर क्यों की गई और क्यों नहीं 2004 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद की तरह पूर्व भाजपा की वाजपेयी सरकार पर लगे आरोपों की भांति उनकी जांच तुरत-फुरत तरीके से की गई। 2004 के लोकसभा चुनावों में तहलका कांड के आरोप वाजपेयी सरकार पर इस तरह लगे थे कि उसे 'शहीदों के कफन' में दलाली तक खाने का जिम्मेदार बताया गया था मगर 2004 में मनमोहन सरकार के रक्षामन्त्री बनने पर पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने जब इससे जुड़ी फाइलों की जांच की तो ऐलान किया कि वाजपेयी सरकार के रक्षामन्त्री रहे जार्ज फर्नांडीज के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है अत: इसकी जांच की कोई जरूरत नहीं है। यह ध्यान रखना चाहिए कि देश की जनता ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की नीयत पर तब भी कोई शक नहीं किया जब उन्होंने रातोंरात नोटबन्दी करने का औचक फैसला किया।

लोगों को लगा कि एक ईमानदार नेता कालेधन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है, उसका साथ दिया जाना चाहिए जबकि 70 प्रतिशत गरीब आदमियों को इस फैसले से भारी कष्ट हुआ था मगर आज उन्हें निराशा इस बात को लेकर हो रही है कि नये नोट आ जाने के बावजूद उनकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं आया और जिस स्तर पर जिस दफ्तर में पहले भ्रष्टाचार था आज भी उतना ही है। पर्यावरण मन्त्रालय की नीतियों में परिवर्तन यह आया है कि वनवासियों और आदिवासियों की जमीनों पर उद्योगपतियों के लिए कब्जा करना आसान हो गया है। हम अपना विकास चीन की तर्ज पर किसी भी तरीके से नहीं कर सकते जहां आदमी को मशीन बनाकर उत्पादन बढ़ाया गया है बल्कि हमें भारत में आदमी की कार्य उत्पादकता बढ़ाने के लिए पूंजी का आनुपातिक बंटवारा करने के उपाय ढूंढने होंगे। बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में सरकारों की ही यह जिम्मेदारी होती है। यह प्रणाली हर कदम पर जोखिम भरी है क्योंकि सरकार इसमें लगभग मूकदर्शक बनकर बाजार के उतार-चढ़ाव को देखती रहती है जिसकी वजह से भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है क्योंकि सरकार के पास सिवाय सरकारी सम्पत्ति को बेचने के दूसरा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें सुसंगठित और सुनियोजित भ्रष्टाचार जिस तरह का होता है उसका उदाहरण वाजपेयी सरकार के विनिवेश मन्त्री रहे अरुण शौरी ने पेश किया था। उन्होंने सरकारी होटल बेचने के लिए बैंकों का एक समूह बनवाया और फिर उससे एक निजी पार्टी को ऋण दिलवाया। उस ऋण से उस निजी पार्टी ने होटल खरीदा और बाद में उसने वह होटल किसी दूसरी पार्टी को ऊंचे दामों पर बेच दिया, क्या गजब का फार्मूला था।